श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| तीक्ष्णदंष्ट्रं गदाहस्तं कपालोद्यतपाणिणम्।<br>हुंफट्कारे महाशब्दशब्दिताखिलदिङ्मुखम्॥ ३१<br>पुण्डरीकाजिनं दोर्भ्यां बिभ्रन्तं कम्बुकं तथा।<br>हसन्तं च नदन्तं च पिबन्तं कृष्णसागरम्॥ ३२<br>नृत्यन्तं भूतसङ्घैश्च गणसङ्घैस्त्वलङ्कृतम्।<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य यथाविभवविस्तरम्॥ ३३<br>सर्वविघ्नानतिक्रम्य शिवलोके महीयते।<br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् यावदाभूतसम्प्लवम्॥ ३४<br>ज्ञानं विचारतो लब्ध्वा रुद्रेभ्यस्तत्र मुच्यते। | नागटंक धारण करनेवाले, व्याघ्रचर्मको उत्तरीयके रूपमें लपेटे हुए, मृगचर्मको वस्त्ररूपमें धारण किये हुए, तीक्ष्ण दाँतोंवाले, हाथमें गदा लिये हुए, हाथमें कपाल लिये हुए, हुं-फट् महाशब्दसे सभी दिशाओंको गुंजित करते हुए, दोनों हाथोंमें व्याघ्रचर्म तथा कमण्डलु धारण किये हुए, हँसते हुए, गरजते हुए, काले समुद्रको पीते हुए, भूतसमूहोंके साथ नृत्य करते हुए और गणसमुदायोंसे सुशोभित होते हुए देवेश्वर प्रभु शिवको [मूर्तिरूपमें] अपने सामर्थ्यके अनुसार बनाकर तथा प्रतिष्ठा करके [मनुष्य] सभी विघ्नोंसे रहित होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है और वहाँ प्रलयपर्यन्त महान् सुखोंको भोगकर रुद्रोंसे विचारपूर्वक ज्ञान प्राप्त करके मुक्त हो जाता है॥ २९–३४ १/२॥ | | अर्धनारीश्वरं देवं चतुर्भुजमनुत्तमम्॥ ३५<br>वरदाभयहस्तं च शूलपद्मधरं प्रभुम्।<br>स्त्रीपुम्भावेन संस्थानं सर्वाभरणभूषितम्॥ ३६<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य शिवलोके महीयते।<br>तत्र भुक्त्वा महाभोगानणिमादिगुणैर्युतः॥ ३७<br>आचन्द्रतारकं ज्ञानं ततो लब्ध्वा विमुच्यते। | अर्धनारीश्वर, चार भुजाओंवाले, वर तथा अभय मुद्रायुक्त हाथवाले, त्रिशूल तथा पद्म धारण किये हुए, स्त्री तथा पुरुष भावमें स्थित और समस्त आभूषणोंसे सुशोभित अत्युत्तम प्रभु महादेवको [मूर्तिरूपमें] बनाकर भक्तिपूर्वक प्रतिष्ठा करके वह शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है और वहाँ चन्द्रमा तथा तारोंकी स्थितिपर्यन्त महान् सुखोंको भोगकर अणिमा आदि गुणोंसे युक्त होकर ज्ञान प्राप्त करके वह मुक्त हो जाता है॥ ३५–३७ १/२॥ | | यः कुर्याद्देवदेवेशं सर्वज्ञं लकुलीश्वरम्॥ ३८<br>वृतं शिष्यप्रशिष्यैश्च व्याख्यानोद्यतपाणिणम्।<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य शिवलोकं स गच्छति॥ ३९<br>भुक्त्वा तु विपुलांस्तत्र भोगान् युगशतं नरः।<br>ज्ञानयोगं समासाद्य तत्रैव च विमुच्यते॥ ४० | जो [मनुष्य] शिष्य-प्रशिष्योंसे घिरे हुए, उपदेशकी मुद्रामें उठे हुए हाथवाले, देवदेवेश तथा सर्वज्ञ लकुलीश्वरको [मूर्तिरूपमें] बनाकर और पुनः भक्तिपूर्वक उन्हें स्थापित करके शिवलोकको जाता है। वह मनुष्य सौ युगोंतक वहाँ महान् सुखोंको भोगकर [पुनः] ज्ञानयोग प्राप्त करके वहींपर मुक्त हो जाता है, जो पूर्वदेवों तथा अमरोंका सर्वाभीष्ट स्थान है॥ ३८–४० १/२॥ | | पूर्वदेवामराणां च यत्स्थानं सकलेप्सितम्।<br>कृतमुद्रस्य देवस्य चिताभस्मानुलेपिनः॥ ४१<br>त्रिपुण्ड्रधारिणस्तेषां शिरोमालाधरस्य च।<br>ब्रह्मणः केशकेनैकमुपवीतं च बिभ्रतः॥ ४२<br>बिभ्रतो वामहस्तेन कपालं ब्रह्मणो वरम्।<br>विष्णोः कलेवरं चैव बिभ्रतः परमेष्ठिनः॥ ४३<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य मुच्यते भवसागरात्।<br>ओं नमो नीलकण्ठाय इति पुण्याक्षराष्टकम्॥ ४४ | ध्यानमुद्रामें स्थित, चिताकी भस्म लगाये हुए, त्रिपुण्ड्र धारण किये हुए, मुण्डमाला धारण किये हुए, ब्रह्माके केशसे निर्मित एक यज्ञोपवीत धारण किये हुए, बाएँ हाथमें ब्रह्माका श्रेष्ठ कपाल धारण किये हुए और भगवान् विष्णुका शरीर धारण किये हुए महादेव शिवकी मूर्ति बनाकर तथा भक्तिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके मनुष्य भवसागरसे पार हो |