भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 375

अध्याय ७६ ] विविध शिवस्वरूपोंकी प्रतिष्ठा एवं उपासनाका फल ३७३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
मन्त्रमाह सकृद्वा यः पातकैः स विमुच्यते।<br>मन्त्रेणानेन गन्धाद्यैर्भक्त्या वित्तानुसारतः॥ ४५<br>सम्पूज्य देवदेवेशं शिवलोके महीयते।जाता है। जो एक बार भी 'ओम् नमो नीलकण्ठाय'—इस पुण्यदायक अष्टाक्षर मन्त्रका उच्चारण करता है, वह पापोंसे छूट जाता है; और अपने सामर्थ्यके अनुसार गन्ध आदि [उपचारों]-से इस मन्त्रके द्वारा भक्तिपूर्वक देवदेवेश्वरकी विधिवत् पूजा करके शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ४१—४५ १/२॥
जालन्धरान्तकं देवं सुदर्शनधरं प्रभुम्॥ ४६<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य द्विधाभूतं जलन्धरम्।<br>प्रयाति शिवसायुज्यं नात्र कार्या विचारणा॥ ४७<br>सुदर्शनप्रदं देवं साक्षात्पूर्वोक्तलक्षणम्।<br><br>(चित्र)<br><br>अर्चमानेन देवेन चार्चितं नेत्रपूजया॥ ४८<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य शिवलोके महीयते।सुदर्शन चक्र धारण किये हुए तथा जलन्धरको दो टुकड़ोंमें किये हुए स्वरूपमें जलन्धर-विनाशक प्रभु महादेवको [मूर्तिरूपमें] बनाकर भक्तिपूर्वक [उनकी] प्रतिष्ठा करके मनुष्य शिवसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये। पूर्वकथित लक्षणोंवाले, सुदर्शन चक्रके दाता तथा पूज्यमान विष्णुके द्वारा नेत्रदानरूपी पूजासे अर्चित देवेश्वरको [मूर्तिरूपमें] बनाकर तथा भक्तिपूर्वक उन्हें स्थापित करके मनुष्य शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ ४६—४८ १/२॥
तिष्ठतोऽथ निकुम्भस्य पृष्ठतश्चरणाम्बुजम्॥ ४९<br>वामेतरं सुविन्यस्य वामे चालिङ्ग्य चाद्रिजाम्।<br>शूलाग्रे कूर्परं स्थाप्य किङ्किणीकृतपन्नगम्॥ ५०<br>सम्प्रेक्ष्य चान्धकं पार्श्वे कृताञ्जलिपुटं स्थितम्।<br>रूपं कृत्वा यथान्यायं शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ ५१निकुम्भकी पीठपर स्थित, [अपना] दाहिना चरणकमल उसकी पीठपर टिकाये हुए, वामभागमें पार्वतीको बैठाये हुए, सर्परूपी किंकिणीसे वेष्टित कुहनीको [अपने] त्रिशूलके अग्रभागपर टिकाये हुए और पासमें हाथ जोड़कर खड़े अन्धककी ओर देखते हुए स्वरूप (मूर्ति)-को विधिके अनुसार बनाकर उसकी प्रतिष्ठा करनेसे मनुष्य शिवसायुज्य प्राप्त करता है॥ ४९—५१॥
यः कुर्याद्देवदेवेशं त्रिपुरान्तकमीश्वरम्।<br>धनुर्बाणसमायुक्तं सोमं सोमार्धभूषणम्॥ ५२<br>रथे सुसंस्थितं देवं चतुराननसारथिम्।<br>तदाकारतया सोऽपि गत्वा शिवपुरं सुखी॥ ५३<br>क्रीडते नात्र सन्देहो द्वितीय इव शङ्करः।<br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् यावदिच्छा द्विजोत्तमाः॥ ५४<br>ज्ञानं विचारितं लब्ध्वा तत्रैव स विमुच्यते।जो [भक्त] त्रिपुराका विनाश करनेवाले देवदेवेश ईश्वरको इस स्वरूपमें स्थापित करता है—जिसमें वे धनुषबाण लिये हुए हों, अर्धचन्द्रको आभूषणके रूपमें धारण किये हुए हों, उमाके साथ रथपर बैठे हुए हों, ब्रह्माजी [उनके] सारथि हों; वह भी उसी स्वरूपसे शिवलोकमें जाकर आनन्दपूर्वक दूसरे शिवकी भाँति क्रीड़ा करता है; इसमें सन्देह नहीं है। हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! वहाँ अपनी इच्छाके अनुसार महान् सुखोंको भोगकर उत्तम ज्ञान प्राप्त करके वह वहींपर मुक्त हो जाता है॥ ५२—५४ १/२॥
गङ्गाधरं सुखासीनं चन्द्रशेखरमेव च॥ ५५गंगाको धारण किये हुए; सुखसे बैठे हुए;
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