भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 376
३७४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| गङ्गया सहितं चैव वामोत्सङ्गेऽम्बिकान्वितम्।<br>विनायकं तथा स्कन्दं ज्येष्ठं दुर्गां सुशोभनाम्॥ ५६<br>भास्करं च तथा सोमं ब्रह्माणीं च महेश्वरीम्।<br>कौमारीं वैष्णवीं देवीं वाराहीं वरदां तथा॥ ५७<br>इन्द्राणीं चैव चामुण्डां वीरभद्रसमन्विताम्।<br>विघ्नेशेने च यो धीमान् शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ ५८ | चन्द्रमाको सिरपर धारण किये हुए; गंगासहित; बाएँ गोदमें पार्वतीको बैठाये हुए और विनायक, ज्येष्ठ कार्तिकेय, सुन्दरी दुर्गा, सूर्य, चन्द्रमा, ब्रह्माणी, महेश्वरी, कौमारी, वैष्णवीदेवी, वरदायिनी वाराही, इन्द्राणी, चामुण्डा, वीरभद्र तथा विघ्नेशसहित शिवको [मूर्तिरूपमें] जो बुद्धिमान् स्थापित करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है॥ ५५-५८॥ | | लिङ्गमूर्तिं महाज्वालामालासांवृतमव्ययम्।<br>लिङ्गस्य मध्ये वै कृत्वा चन्द्रशेखरमीश्वरम्॥ ५९<br>व्योम्नि कुर्यात्तथा लिङ्गं ब्रह्माणं हंसरूपिणम्।<br>विष्णुं वराहरूपेण लिङ्गस्याधस्त्वधोमुखम्॥ ६०<br>ब्रह्माणं दक्षिणे तस्य कृताञ्जलिपुटं स्थितम्।<br>मध्ये लिङ्गं महाघोरं महाम्भसि च संस्थितम्॥ ६१<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य शिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>क्षेत्रसंरक्षकं देवं तथा पाशुपतं प्रभुम्॥ ६२<br>कृत्वा भक्त्या यथान्यायं शिवलोके महीयते॥ ६३ | ऐसी मूर्ति जिसमें अव्यय शिवजी लिङ्गके रूपमें हों, बड़ी-बड़ी ज्वालाओंके समूहोंसे घिरे हुए हों, लिङ्गके मध्यमें चन्द्रमाको धारण किये हुए स्थित हों, हंसरूपधारी ब्रह्मा उनके दाहिने भागमें हाथ जोड़े हुए विराजमान हों, वाराहरूपधारी विष्णु नीचेकी ओर मुख किये हुए लिङ्गके अधोभागमें स्थित हों, अघोर महान् लिङ्ग अत्यधिक जलके मध्यमें स्थित हो—उसे बनाकर तथा भक्तिपूर्वक स्थापित करके भक्त शिवसायुज्य प्राप्त करता है। क्षेत्रकी रक्षा करनेवाले क्षेत्रपाल तथा प्रभु पशुपति शिवको [मूर्तिरूपमें] बनाकर भक्तिपूर्वक विधानके अनुसार उनको स्थापित करके भक्त शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥ ५९-६३॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवमूर्तिप्रतिष्ठाफलकथनं नाम षट्सप्ततितमोऽध्यायः॥ ७६॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवमूर्तिप्रतिष्ठाफलकथन' नामक छिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७६॥


सतहत्तरवाँ अध्याय

शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल, शिवक्षेत्रों तथा शिवतीर्थोंके सेवनकी महिमा, शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले—
लिङ्गप्रतिष्ठापुण्यं च लिङ्गस्थापनमेव च।<br>लिङ्गानां चैव भेदाश्च श्रुतं तव मुखादिह॥ १<br>मृदादिरत्नपर्यन्तैर्द्रव्यैः कृत्वा शिवालयम्।<br>यत्फलं लभते मर्त्यस्तत्फलं वक्तुमर्हसि॥ २[हे सूतजी!] हमलोगोंने आपके मुखसे लिङ्गकी स्थापना, लिङ्गप्रतिष्ठाके फल तथा लिङ्गोंके भेदोंको सुना; अब आप मिट्टीसे लेकर रत्नोंतक द्रव्योंसे शिवालयका निर्माण करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, उस फलको कृपापूर्वक बतायें॥ १-२॥
सूत उवाचसूतजी बोले—
यस्य भक्तोऽपि लोकेऽस्मिन् पुत्रदारगृहादिभिः।<br>बाध्यते ज्ञानयुक्तश्चेन्न च तस्य गृहैस्तु किम्॥ ३[हे ऋषियो!] जिन शिवका ज्ञानसम्पन्न भक्त इस लोकमें पुत्र, स्त्री, घर आदिसे बन्धनको प्राप्त नहीं होता, उसे गृहोंसे क्या प्रयोजन?