श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७६ ] विविध शिवस्वरूपोंकी प्रतिष्ठा एवं उपासनाका फल ३७१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वृषारूढं तु यः कुर्यात्सोमं सोमार्धभूषणम्।<br>हयमेधायुतं कृत्वा यत्पुण्यं तदवाप्य सः॥ १७<br>काञ्चनेन विमानेन किङ्किणीजालमालिना।<br>गत्वा शिवपुरं दिव्यं तत्रैव स विमुच्यते॥ १८ | जो मनुष्य उमासहित वृषपर आरूढ अर्धचन्द्रधारी शिवकी मूर्तिको स्थापित करता है, वह दस हजार अश्वमेध यज्ञोंको करनेसे जो पुण्य होता है, उसे प्राप्तकर किंकिणीजालोंसे युक्त स्वर्ण-विमानसे दिव्य शिवलोकमें जाकर वहींपर मुक्त हो जाता है॥ १७-१८॥ |
| नन्दिना सहितं देवं साम्बं सर्वगणैर्वृतम्।<br>कृत्वा यत्फलमाप्नोति वक्ष्ये तद्वै यथाश्रुतम्॥ १९<br>सूर्यमण्डलसङ्काशैर्विमानैर्वृषसंयुतैः ।<br>अप्सरोगणसङ्कीर्णैर्देवदानवदुर्लभैः ॥ २०<br>नृत्यद्भिरप्सरःसङ्घैः सर्वतः सर्वशोभितैः।<br>गत्वा शिवपुरं दिव्यं गाणपत्यमवाप्नुयात्॥ २१ | नन्दी तथा उमासहित और सभी गणोंसे घिरे हुए महादेवकी प्रतिष्ठा करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, जैसा मैंने सुना है, उसे बता रहा हूँ। वह सूर्यमण्डलके समान देदीप्यमान वृषभोंसे जुते हुए, अप्सराओंसे भरे हुए, देव-दानवोंके लिये दुर्लभ और नृत्य करती हुई अप्सराओंसे चारों ओरसे पूर्णतः सुशोभित विमानोंसे दिव्य शिवलोकमें जाकर गणाधिपति पदको प्राप्त करता है॥ १९-२१॥ |
| नृत्यन्तं देवदेवेशं शैलजासहितं प्रभुम्।<br>सहस्रबाहुं सर्वज्ञं चतुर्बाहुमथापि वा॥ २२<br>भृग्वाद्यैर्भूतसङ्घैश्च संवृतं परमेश्वरम्।<br>शैलजासहितं साक्षाद् वृषभध्वजमीश्वरम्॥ २३<br>ब्रह्मेन्द्रविष्णुसोमाद्यैः सदा सर्वैर्नमस्कृतम्।<br>मातृभिर्मुनिभिश्चैव संवृतं परमेश्वरम्॥ २४<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य यत्फलं तद्वदाम्यहम्।<br>सर्वयज्ञतपोदानतीर्थदेवेषु यत् फलम्॥ २५<br>तत्फलं कोटिगुणितं लब्ध्वा याति शिवं पदम्।<br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् यावदाभूतसम्प्लवम्॥ २६<br>सृष्ट्यन्तरे पुनः प्राप्ते मानवं पदमाप्नुयात्। | पार्वतीसहित नृत्य करते हुए, हजार भुजाओंवाले अथवा चार भुजाओंवाले, भृगु आदि तथा भूतसमूहोंसे घिरे हुए, पार्वतीके साथ, ब्रह्मा-विष्णु-इन्द्र-चन्द्र आदि सभी देवताओंसे सदा नमस्कृत और मातृकाओं तथा मुनियोंसे घिरे हुए देवदेवेश्वर-प्रभु-सर्वज्ञ-परमेश्वर-वृषभध्वज शिवकी मूर्ति बनाकर भक्तिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके [मनुष्य] जो फल प्राप्त करता है, उसे मैं बताता हूँ—सभी यज्ञ, तप, दान, तीर्थ तथा देवदर्शन करनेमें जो फल होता है, उसका करोड़ों गुना फल प्राप्त करके वह शिवलोकको जाता है और वहाँ प्रलयपर्यन्त महान् सुखोंको भोगकर पुनः दूसरी सृष्टिका प्रारम्भ होनेपर मनु-पद प्राप्त करता है॥ २२-२६ १/२ ॥ |
| नग्नं चतुर्भुजं श्वेतं त्रिनेत्रं सर्पमेखलम्॥ २७<br>कपालहस्तं देवेशं कृष्णकुञ्चितमूर्धजम्।<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य शिवसायुज्यमाप्नुयात्॥ २८ | दिगम्बर, चार भुजाओंवाले, श्वेतवर्णवाले, तीन नेत्रोंवाले, सर्पकी मेखलावाले, हाथमें कपाल धारण किये हुए और काले तथा घुँघराले केशवाले देवेश्वरको [मूर्तिरूपमें] बनाकर भक्तिपूर्वक प्रतिष्ठा करके मनुष्य शिव-सायुज्य प्राप्त करता है॥ २७-२८॥ |
| इभेन्द्रदारकं देवं साम्बं सिद्धार्थदं प्रभुम्।<br>सुधूम्रवर्णं रक्ताक्षं त्रिनेत्रं चन्द्रभूषणम्॥ २९<br>काकपक्षरं मूर्ध्ना नागतङ्कधरं हरम्।<br>सिंहाजिनोत्तरीयं च मृगचर्माम्बरं प्रभुम्॥ ३० | गजासुरको विदीर्ण करनेवाले, उमासहित, सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले, कृष्ण वर्णवाले, लाल नेत्रोंवाले, तीन नेत्रोंवाले, चन्द्रको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले, सिरपर काकपक्ष धारण करनेवाले, |