श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ३७० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूर्यकोटिप्रतीकाशैर्विमानैः सार्वकामिकैः ।<br>रुद्रकन्यासमाकीर्णैर्गेयनाट्यसमन्वितैः ॥ ४ ॥<br><br>शिववत्क्रीडते योगी यावदाभूतसम्प्लवम् ।<br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् विमानैः सार्वकामिकैः ॥ ५ ॥<br><br>औमं कौमारमैशानं वैष्णवं ब्राह्ममेव च ।<br>प्राजापत्यं महातेजा जनलोकं महस्तथा ॥ ६ ॥<br><br>ऐन्द्रमासाद्य चैन्द्रत्वं कृत्वा वर्षायुतं पुनः ।<br>भुक्त्वा चैव भुवर्लोके भोगान् दिव्यान् सुशोभनान् ॥ ७ ॥<br><br>मेरुमासाद्य देवानां भवनेषु प्रमोदेत । | वह योगी करोड़ों सूर्योंके समान तेजवाले, सभी अभीष्ट वस्तुओंसे सम्पन्न, रुद्रकन्याओंसे युक्त, गान-नृत्य आदिसे परिपूर्ण विमानोंमें [भगवान्] शिवकी भाँति प्रलयपर्यन्त विहार करता है। वहाँ महान् सुखोंका उपभोग करके वह महातेजस्वी [योगी] सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले विमानोंसे [क्रमशः] उमालोक, कुमारलोक, ईशानलोक, विष्णुलोक, ब्रह्मलोक, प्रजापतिलोक, जनलोक तथा महर्लोक पहुँच जाता है; पुनः इन्द्रलोकमें पहुँचकर वहाँ दस हजार वर्षोंतक इन्द्रपदका भोग करनेके अनन्तर भुवर्लोकमें दिव्य तथा परम सुन्दर सुखोंको भोगकर मेरु पर्वतपर पहुँचकर देवताओंके भवनोंमें आनन्द प्राप्त करता है॥ ४-७ १/२॥ |
| एकपादं चतुर्बाहुं त्रिनेत्रं शूलसंयुतम् ॥ ८ ॥<br><br>सृष्ट्वा स्थितं हरिं वामे दक्षिणे चतुराननम् ।<br>अष्टाविंशतिरुद्राणां कोटिः सर्वाङ्गसुप्रभम् ॥ ९ ॥<br><br>पञ्चविंशतिकं साक्षात्पुरुषं हृदयात्तथा ।<br>प्रकृतिं वामतश्चैव बुद्धिं वै बुद्धिदेशतः ॥ १० ॥<br><br>अहङ्कारमहङ्कारात्तन्मात्राणि तु तत्र वै ।<br>इन्द्रियाणीन्द्रियादेव लीलया परमेश्वरम् ॥ ११ ॥<br><br>पृथिवीं पादमूलात्तु गुह्यदेशाज्जलं तथा ।<br>नाभिदेशातथा वह्निं हृदयाद्भास्करं तथा ॥ १२ ॥<br><br>कण्ठात्सोमं तथात्मानं भ्रूमध्यान्मस्तकाद्दिवम् ।<br>सृष्ट्वैवं संस्थितं साक्षाज्जगत्सर्वं चराचरम् ॥ १३ ॥<br><br>सर्वज्ञं सर्वगं देवं कृत्वा विद्याविधानतः ।<br>प्रतिष्ठाप्य यथान्यायं शिवसायुज्यमाप्नुयात् ॥ १४ ॥ | जो एक पैर, चार भुजाओं, तीन नेत्रों तथा त्रिशूलसे युक्त हैं; जो अपने वाम भागसे विष्णु तथा दक्षिण भागसे ब्रह्माको उत्पन्न करके विराजमान हैं; जिनसे अट्ठाईस करोड़ रुद्र उत्पन्न हुए हैं; जो सभी अंगोंसे अत्यन्त प्रभाववाले तथा पचीस तत्त्वोंवाले जीवात्मा साक्षात् पुरुषको हृदयसे, अपने बायें भागसे प्रकृतिको, बुद्धिदेशसे बुद्धिको, अपने अहंकारसे अहंकारको, तन्मात्राओंसे तन्मात्राओंको, अपनी इन्द्रियोंसे लीलापूर्वक इन्द्रियोंको, पैरके मूलभागसे पृथ्वीको, गुह्यदेशसे जलको, नाभिस्थलसे अग्निको, हृदयदेशसे सूर्यको, कण्ठसे चन्द्रमाको, भौहोंके मध्यभागसे आत्मा (रुद्र)-को, मस्तकसे स्वर्गको—इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर जगत्को उत्पन्न करके साक्षात् विराजमान हैं, उन सर्वज्ञ तथा सर्वव्यापी परमेश्वरकी मूर्तिको विद्याविधानके अनुसार बनाकर विधिपूर्वक उनकी प्रतिष्ठा करके मनुष्य शिवसायुज्य प्राप्त करता है॥ ८-१४॥ |
| त्रिपादं सप्तहस्तं च चतुःशृङ्गं द्विशीर्षकम् ।<br>कृत्वा यज्ञेशमीशानं विष्णुलोके महीयते ॥ १५ ॥<br><br>तत्र भुक्त्वा महाभोगान् कल्पलक्षं सुखी नरः ।<br>क्रमादागत्य लोकेऽस्मिन् सर्वयज्ञान्तगो भवेत् ॥ १६ ॥ | तीन पैरोंवाले, सात हाथोंवाले, चार शृंगोंवाले तथा दो सिरोंवाले यज्ञेश्वर अग्निरूप ईशानको स्थापित करके मनुष्य विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। वहाँ एक लाख कल्पतक महान् भोगोंको भोगकर मनुष्य सुखी रहता है और [पुनः] क्रमसे इस लोकमें आकर समस्त यज्ञोंको सम्पन्न करता है॥ १५-१६॥ |