श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ७६ ] विविध शिवस्वरूपोंकी प्रतिष्ठा एवं उपासनाका फल [ ३६१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स स्वेच्छया शिवः साक्षाद्देव्या सार्धं स्थितः प्रभुः।<br>सन्तारणार्थं च शिवः सदसद्व्यक्तिवर्जितः॥ ३६ | षडस्र (स्वाधिष्ठान)-में, दस अरों (मूर्धा)-में, बारह अरों (हृदय)-में, सोलह अरों (कण्ठ)-में तथा तीन अरों (भ्रूमध्य)-में उनकी पूजा करते हैं॥ ३४-३५॥<br><br>सत्-असत्से रहित अर्थात् विलक्षण वे प्रभु शिव जगत्के उद्धारके लिये अपनी इच्छासे साक्षात् देवीके साथ स्थित हैं॥ ३६॥ |
| तमेकमाहुर्द्विगुणं च केचित्<br>केचित्तमाहुस्त्रिगुणात्मकं च।<br>ऊचुस्तथा तं च शिवं तथान्ये<br>संसारिणं वेदविदो वदन्ति॥ ३७ | कुछ लोग उन अद्वितीय शिवको द्विगुण (प्रकृति-पुरुषरूप) कहते हैं, कुछ लोग त्रिगुणात्मक (ब्रह्मा-विष्णु-रुद्ररूप) कहते हैं और अन्य वेदज्ञ लोग उन्हें संसारका कारण बताते हैं॥ ३७॥ |
| भक्त्या च योगेन शुभेन युक्ता<br>विप्राः सदा धर्मरता विशिष्टाः।<br>यजन्ति योगेशमशेषमूर्तिं<br>षडस्रमध्ये भगवन्तमेव॥ ३८ | भक्ति तथा शुभ योगसे समन्वित, धर्मपरायण तथा विशिष्ट ब्राह्मण [उन] योगेश्वर, अशेषमूर्ति भगवान्का पूजन षडस्रमें करते हैं॥ ३८॥ |
| ये तत्र पश्यन्ति शिवं त्रिरस्रे<br>त्रितत्त्वमध्ये त्रिगुणं त्रियक्षम्।<br>ते यान्ति चैनं न च योगिनोऽन्ये<br>तया च देव्या पुरुषं पुराणम्॥ ३९ | जो लोग त्रिस्र (भ्रूमध्य)-में, तीन तत्त्वोंके मध्यमें त्रिगुण तथा त्रिनेत्र शिवका दर्शन करते हैं, वे ही उन देवीके साथ इन पुरातन पुरुष [शिव]-को प्राप्त करते हैं; अन्य योगी नहीं॥ ३९॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवाद्वैतकथनं नाम पञ्चसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७५॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवाद्वैतकथन' नामक पचहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७५॥
छिहत्तरवाँ अध्याय
विविध शिवस्वरूपोंकी प्रतिष्ठा एवं उपासनाका फल
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>अतः परं प्रवक्ष्यामि स्वेच्छाविग्रहसम्भवम्।<br>प्रतिष्ठायाः फलं सर्वं सर्वलोकहिताय वै॥ १ | सूतजी बोले—[हे विप्रो!] इसके आगे मैं सभी लोकोंके कल्याणके लिये अपनी इच्छासे उनके विग्रहकी उत्पत्ति तथा [मूर्ति] प्रतिष्ठाके सम्पूर्ण फलका वर्णन करूँगा॥ १॥ |
| स्कन्दोमासहितं देवमासीनं परमासने।<br>कृत्वा भक्त्या प्रतिष्ठाप्य सर्वान् कामानवाप्नुयात्॥ २ | स्कन्द (कार्तिकेय) तथा उमासहित महादेवकी मूर्ति बनाकर उन्हें उत्तम आसनपर विराजमान करके भक्तिपूर्वक [उस मूर्तिकी] प्रतिष्ठाकर सभी कामनाओंको प्राप्त करना चाहिये॥ २॥ |
| स्कन्दोमासहितं देवं सम्पूज्य विधिना सकृत्।<br>यत्फलं लभते मर्त्यस्तद्वदामि यथाश्रुतम्॥ ३ | कार्तिकेय तथा उमासहित शिवकी विधिपूर्वक एक बार भी पूजा करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, उसे जैसा मैंने सुना है; वैसा बताता हूँ॥ ३॥ |