भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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| ३६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्योमैकमपि दृष्टं हि शरावं प्रति सुव्रताः ।<br>पृथक्त्वञ्चापृथक्त्वं च शङ्करस्येति चापरे ॥ २४<br><br>प्रत्ययार्थं हि जगतामेकस्थोऽपि दिवाकरः ।<br>एकोऽपि बहुधा दृष्टो जलाधारेषु सुव्रताः ॥ २५आकाशके एक होते हुए भी जैसे वह शराव (मिट्टीका कसोरा)-[आदि उपाधियोंके भेदसे] अनेक रूपोंमें प्रतीत होता है, वैसे ही भगवान् शिवके एक होनेपर भी उनकी एकता तथा अनेकता दिखायी देती है—ऐसा दूसरे लोग कहते हैं। हे सुव्रतो! एक स्थानपर स्थित होते हुए तथा एक होनेपर भी सूर्य जलके आश्रयभूत विभिन्न पात्रोंमें अनेक रूपोंमें दिखायी देते हैं—यह दृष्टान्त लोगोंको ज्ञान करानेके लिये है॥ २०-२५॥
जन्तवो दिवि भूमौ च सर्वे वै पाञ्चभौतिकाः ।<br>तथापि बहुला दृष्टा जातिव्यक्तिविभेदतः ॥ २६<br><br>दृश्यते श्रूयते यद्यत्तत्तद्विद्धि शिवात्मकम् ।<br>भेदो जनानां लोकेऽस्मिन् प्रतिभासो विचारतः ॥ २७स्वर्ग तथा पृथ्वीके सभी प्राणी पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश)-से निर्मित हैं; तथापि जाति तथा व्यक्तिके भेदसे वे अनेक रूपोंमें दिखायी देते हैं। जो कुछ भी दिखायी देता है अथवा सुनायी पड़ता है, उसे शिवमयं जानिये; विचार करनेपर इस लोकमें लोगोंका भेद तो प्रतिभास (भ्रम)-मात्र है॥ २६-२७॥
स्वप्ने च विपुलान् भोगान् भुक्त्वा मर्त्यः सुखी भवेत् ।<br>दुःखी च भोगं दुःखं च नानुभूतं विचारतः ॥ २८<br><br>एवमाहुस्तथान्ये च सर्वे वेदार्थतत्त्वगाः ।<br>हृदि संसारिणां साक्षात्सकलः परमेश्वरः ॥ २९स्वप्नमें बहुत-से सुखोंका उपभोग करके मनुष्य सुखी तथा दुःखी हो जाता है; विचार करनेसे देखा जाय, तो वास्तवमें सुख-दुःखका अनुभव नहीं होता। इसी प्रकार अन्य सभी वेदार्थतत्त्वज्ञ बन्धन तथा मोक्षको भी स्वप्नकी भाँति बताते हैं। परमेश्वर [शिव] संसारी लोगोंके हृदयमें साक्षात् सकल (सगुण)-रूपसे विराजमान रहते हैं और वे ही जगन्मय देव योगियों तथा ज्ञानियोंके हृदयमें निष्कल (निर्गुण)-रूपसे विराजमान रहते हैं॥ २८-२९ १/२॥
योगिनां निष्कलो देवो ज्ञानिनां च जगन्मयः ।<br>त्रिविधं परमेशस्य वपुर्लोके प्रशस्यते ॥ ३०<br><br>निष्कलं प्रथमं चैकं ततः सकलनिष्कलम् ।<br>तृतीयं सकलं चैव नान्यथेति द्विजोत्तमाः ॥ ३१परमेश्वरका तीन प्रकारका विग्रह लोकमें पूजित होता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! पहला निष्कल (निर्गुण), दूसरा सकल-निष्कल (सगुण-निर्गुण) और तीसरा सकल (सगुण); इसमें सन्देह नहीं है॥ ३०-३१॥
अर्चयन्ति मुहुः केचित्सदा सकलनिष्कलम् ।<br>सर्वज्ञं हृदये केचिच्छिवलिङ्गे विभावसौ ॥ ३२<br><br>सकलं मुनयः केचित्सदा संसारवर्तिनः ।<br>एवमभ्यर्चयन्त्येव सदाराः ससुता नराः ॥ ३३कुछ लोग सदा सकल-निष्कल रूपकी पूजा करते हैं; कुछ लोग उन सर्वज्ञकी पूजा हृदयमें, शिवलिङ्गमें तथा अग्निमें करते हैं और हे मुनियो! संसारमें रहनेवाले कुछ मनुष्य स्त्री-पुत्रोंसहित सकल (सगुण) रूपकी सर्वदा पूजा करते हैं॥ ३२-३३॥
यथा शिवस्तथा देवी यथा देवी तथा शिवः ।<br>तस्माद्भेदबुद्धयैव सप्तविंशत्प्रभेदतः ॥ ३४<br><br>यजन्ति देहे बाह्ये च चतुष्कोणे षडस्रके ।<br>दशारे द्वादशारे च षोडशारे त्रिरस्रके ॥ ३५जैसे शिव हैं, वैसे ही देवी हैं और जैसे देवी हैं, वैसे ही शिव हैं; अतः लोग सत्ताईस प्रभेदसे अभेद बुद्धिसे शरीरमें तथा शरीरके बाहर चतुष्कोण (मूलाधार)-में,