श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३५२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| समावृत्य महादेवं देवदेवं महेश्वरम्।<br>दग्धुं पुरत्रयं जग्मुः कोटिकोटिगणैर्वृताः ॥ ८४<br><br>त्रयस्त्रिंशत्सुराश्चैव त्रयश्च त्रिशतास्तथा।<br>त्रयश्च त्रिसहस्त्राणि जग्मुर्देवाः समन्ततः ॥ ८५ | अपने गणसमुदायोंके साथ उन शिवजीको घेरकर चले। इसी प्रकार [अपने] करोड़ों-करोड़ गणोंसे घिरे हुए हजारों-हजार रुद्र तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये महादेव देवदेव महेश्वरको घेरकर चले ॥ ७६-८४॥<br><br>[वसु, रुद्र, आदित्य आदि] तैंतीस देवता; ब्रह्मा, विष्णु, महेश—ये तीनों देवता और उनके भेदरूप तीन सौ तथा तीन हजार तीन अन्य देवता सभी ओरसे वहाँ गये ॥ ८५॥ |
| मातरः सर्वलोकानां गणानां चैव मातरः।<br>भूतानां मातरश्चैव जग्मुर्देवस्य पृष्ठतः ॥ ८६ | सभी लोकोंकी माताएँ, गणोंकी माताएँ तथा भूतोंकी माताएँ शिवजीके पीछे-पीछे चलीं ॥ ८६॥ |
| भाति मध्ये गणानां च रथमध्ये गणेश्वरः।<br>नभस्यमलनक्षत्रे तारामध्ये इवोडुराट् ॥ ८७ | रथके मध्य [विराजमान] गणेश्वर गणोंके बीच उसी तरह प्रतीत हो रहे थे, जैसे निर्मल नक्षत्रोंवाले आकाशमें ताराओंके बीच चन्द्रमा ॥ ८७॥ |
| रराज देवी देवस्य गिरिजा पार्श्वसंस्थिता।<br>तदा प्रभावतो गौरी भवस्येव जगन्मयी ॥ ८८<br><br>शुभावती तदा देवी पार्श्वसंस्था विभाति सा।<br>चामरासक्तहस्ताग्रा सा हेमाम्बुजवर्णिका ॥ ८९ | उस समय शिवके प्रभाव (सामर्थ्य)-के कारण ही जगन्मयी पार्वती देवी [उन] शिवके वामभागमें स्थित होकर सुशोभित हो रही थीं। उस समय सुवर्णकमलके समान वर्णवाली देवी शुभावती (पार्वतीकी सखी) हाथके अग्रभागमें चँवर लिये हुए उनके बगलमें स्थित होकर सुशोभित हो रही थीं ॥ ८८-८९॥ |
| अथ विभाति विभोर्विशदं वपु-<br>र्भसितभासितमम्बिकया तया।<br>सितमिवाभ्रमहो इह विद्युता<br>नभसि देवपतेः परमेष्ठिनः ॥ ९० | सर्वव्यापी देवेश्वर शिवका भस्मसे दीप्यमान अतिस्वच्छ विग्रह उन पार्वतीके साथ उसी प्रकार प्रतीत हो रहा था, जैसे आकाशमें विद्युत्के साथ श्वेत बादल ॥ ९०॥ |
| भातीन्द्रधनुषाकाशं मेरुणा च यथा जगत्।<br>हिरण्यधनुषा सौम्यं वपुः शम्भोः शशिद्युति ॥ ९१ | सुवर्णमय धनुषसे युक्त तथा चन्द्रमाकी प्रभावाला शंकरजीका सौम्य शरीर इन्द्रधनुषसे युक्त आकाश अथवा मेरुपर्वतसे युक्त जगत्की भाँति प्रतीत हो रहा था ॥ ९१॥ |
| सितातपत्रं रत्नांशुमिश्रितं परमेष्ठिनः।<br>यथोदये शशाङ्कस्य भात्यखण्डं हि मण्डलम् ॥ ९२ | रत्नोंकी किरणोंसे मिश्रित शिवजीका श्वेत छत्र उदयकालमें चन्द्रमाके पूर्णमण्डलके समान प्रतीत हो रहा था ॥ ९२॥ |
| सदुकूला शिवे रक्ता लम्बिता भाति मालिका।<br>छत्रान्ता रत्नजाकाशात्पतन्तीव सरिद्वरा ॥ ९३ | शिवजीके गलेमें रेशमी वस्त्रसहित लटकती हुई रत्नमयी मोतियोंकी माला उनके छत्रके पास आकाशसे गिरती हुई गंगाके समान प्रतीत हो रही थी ॥ ९३॥ |
| अथ महेन्द्रविरिञ्चिविभावसु-<br>प्रभृतिभिर्नतपादसरोरुहः ।<br>सह तदा च जगाम तयाम्बया<br>सकललोकहिताय पुरत्रयम् ॥ ९४ | इस प्रकार महेन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि आदिके द्वारा वन्दित चरणकमलवाले शिवजीने समस्त संसारके हितके लिये उन पार्वतीके साथ त्रिपुरके लिये प्रस्थान किया ॥ ९४॥ |