भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 353

अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३५१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दुर्गारूढमृगाधिपा दुरतिगा दोर्दण्डवृन्दैः शिवा<br>बिभ्राणाङ्कुशशूलपाशपरशुं चक्रासिशङ्खायुधम् ।<br>प्रौढादित्यसहस्रवह्निसदृशैर्नेत्रैर्दहन्ती पथं<br>बाला बालपराक्रमा भगवती दैत्यान् प्रहर्तुं ययौ ॥ ७०बालरूपा होते हुए भी अमित पराक्रमवाली तथा [सबके द्वारा] अनतिक्रमणीय भगवती दुर्गा सिंहपर सवार होकर [अपनी] भुजाओंमें अंकुश, शूल, पाश, परशु, चक्र, खड्ग, शंख आदि आयुध धारण किये हुए और मध्याह्नकालीन सूर्य तथा हजार अग्नियोंके समान [देदीप्यमान] नेत्रोंसे मार्गको जलाती हुई [उन] दैत्योंपर प्रहार करनेके लिये चलीं ॥ ७० ॥
तं देवमीशं त्रिपुरं निहन्तुं<br>तदा तु देवेन्द्ररविप्रकाशाः ।<br>गजैर्हयैः सिंहवरैरथैश्च<br>वृषैर्ययुस्ते गणराजमुख्याः ॥ ७१उस समय इन्द्र तथा सूर्यके समान कान्तिवाले मुख्य गणेश्वर त्रिपुरका नाश करनेके लिये हाथियों, घोड़ों, उत्तम सिंहों, रथों तथा वृषभोंपर सवार होकर उन भगवान् शिवके पीछे चले ॥ ७१ ॥
हलैश्च फालैर्मुसलैर्भुशुण्डै-<br>र्गिरीन्द्रकूटैर्गिरिसन्निभास्ते ।<br>ययुः पुरस्ताद्धि महेश्वरस्य<br>सुरेश्वरा भूतगणेश्वराश्च ॥ ७२हलों, फालों, मुसलों, लोहनिर्मित गदाओं तथा पर्वतशिखरोंको धारण किये हुए गिरिसदृश वे सुरेश्वर, भूत तथा गणेश्वर महेश्वरके आगे-आगे चले ॥ ७२ ॥
तथेन्द्रपद्मोद्भवविष्णुमुख्याः<br>सुरा गणेशाश्च गणेशमीशम् ।<br>जयेति वाग्भिर्भगवन्तमूचुः<br>किरीटदत्ताञ्जलयः समन्तात् ॥ ७३इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता और [सभी] गणेश्वर अपने मुकुटोंको अंजलिपर टिकाकर [प्रणाम करते हुए] चारों ओरसे वाणीद्वारा ईश भगवान् गणेशकी जय बोल रहे थे ॥ ७३ ॥
ननृतुर्मुनयः सर्वे दण्डहस्ता जटाधराः ।<br>ववृषुः पुष्पवर्षाणि खेचराः सिद्धचारणाः ।<br>पुरत्रयं च विप्रेन्द्राः प्राणदत्सर्वतस्तथा ॥ ७४हाथमें दण्ड लिये हुए जटाधारी सभी मुनियोंने नृत्य किया और आकाशचारी सिद्धों तथा चारणोंने पुष्पवर्षा की। हे विप्रेन्द्रो! त्रिपुर चारों ओरसे गूँज उठा ॥ ७४ ॥
गणेश्वरैर्देवगणैश्च भृङ्गी<br>समावृतः सर्वगणेन्द्रवर्यः ।<br>जगाम योगी त्रिपुरं निहन्तुं<br>विमानमारुह्य यथा महेन्द्रः ॥ ७५सभी गणेश्वरोंमें श्रेष्ठ योगपरायण भृंगी देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति गणेश्वरोंसे घिरे होकर विमानपर चढ़कर त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले ॥ ७५ ॥
केशो विगतवासाश्च महाकेशो महाज्वरः ।<br>सोमवल्ली सवर्णश्च सोमपः सेनकस्तथा ॥ ७६<br>सोमधृक् सूर्यवाचश्च सूर्यपेषणकस्तथा ।<br>सूर्याक्षः सूरिनामा च सुरः सुन्दर एव च ॥ ७७<br>प्रकुदः ककुदन्तश्च कम्पनश्च प्रकम्पनः ।<br>इन्द्रश्चेन्द्रजयश्चैव महाभीर्भीमकस्तथा ॥ ७८<br>शताक्षश्चैव पञ्चाक्षः सहस्राक्षो महोदरः ।<br>यमजिह्वः शताश्वश्च कण्ठनः कण्ठपूजनः ॥ ७९<br>द्विशिखस्त्रिशिखश्चैव तथा पञ्चशिखो द्विजाः ।<br>मुण्डोऽर्धमुण्डो दीर्घश्च पिशाचास्यः पिनाकधृक् ॥ ८०<br>पिप्पलायतनश्चैव तथा ह्यङ्गारकाशनः ।<br>शिथिलः शिथिलास्यश्च अक्षपादो ह्यजः कुजः ॥ ८१<br>अजवक्त्रो हयवक्त्रो गजवक्त्रोर्ध्ववक्त्रकः ।<br>इत्याद्याः परिवायेशं लक्ष्यलक्षणवर्जिताः ॥ ८२<br>वृन्दशतं समावृत्य जग्मुः सोमं गणैर्वृताः ।<br>सहस्राणां सहस्राणि रुद्राणामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ८३हे द्विजो! केश, विगतवास, महाकेश, महाज्वर, सोमवल्ली, सवर्ण, सोमप, सेनक, सोमधृक्, सूर्यवाच, सूर्यपेषण, सूर्याक्ष, सूरिनामा, सुर, सुन्दर, प्रकुद, ककुदन्त, कम्पन, प्रकम्पन, इन्द्र, इन्द्रजय, महाभी, भीमक, शताक्ष, पंचाक्ष, सहस्राक्ष, महोदर, यमजिह्व, शताश्व, कण्ठन, कण्ठपूजन, द्विशिख, त्रिशिख, पंचशिख, मुण्ड, अर्धमुण्ड, दीर्घ, पिशाचास्य, पिनाकधृक्, पिप्पलायतन, अंगारकाशन, शिथिल, शिथिलास्य, अक्षपाद, अज, कुज, अजवक्त्र, हयवक्त्र, गजवक्त्र, ऊर्ध्ववक्त्र तथा अन्य लक्ष्यलक्षण-वर्जित गणेश्वर एक साथ मिलकर