श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ३५० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| प्रणेमुरालोक्य सहस्रनेत्रं<br>सलीलमम्बा तनयं यथेन्द्रम् ॥ ५९ | स्वामी तथा हजार नेत्रोंवाले इन्द्रको देखकर लीलापूर्वक उसी प्रकार प्रणाम किया, जैसे माता पार्वती पुत्र कार्तिकेयको प्रणाम करती हैं ॥ ५९ ॥ |
| यमपावकवित्तेशा वायुर्निर्ऋतिरेव च।<br>अपां पतिस्तथेशानो भवं चानुसमागताः ॥ ६० | यम, अग्नि, कुबेर, वायु, निर्ऋति, वरुण तथा ईशान भी शिवजीके पीछे-पीछे चले ॥ ६० ॥ |
| वीरभद्रो रणे भद्रो नैर्ऋत्यां वै रथस्य तु।<br>वृषभेन्द्रं समारुह्य रोमजैश्र्च समावृतः ॥ ६१<br>सेवां चक्रे पुरं हन्तुं देवदेवं त्रियम्बकम्।<br>महाकालो महातेजा महादेव इवापरः ॥ ६२<br>वायव्यां सगणैः सार्धं सेवां चक्रे रथस्य तु ॥ ६३ | युद्धमें प्रवीण वीरभद्र वृषभेन्द्रपर आरूढ़ होकर रथके नैर्ऋत्यकोण (दक्षिण-पश्चिम)-में होकर त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले; अपने रोमजसंज्ञक बाणोंसे घिरे हुए वे देवदेव त्रियम्बककी सेवा कर रहे थे। दूसरे महादेवके समान प्रतीत होनेवाले महातेजस्वी महाकाल रथके वायव्यकोण (उत्तर-पश्चिम)-में होकर गणोंके साथ रथकी सेवा कर रहे थे ॥ ६१-६३ ॥ |
| षण्मुखोऽपि सह सिद्धचारणैः<br>सेनया च गिरिराजसन्निभः।<br>देवनाथगणवृन्दसंवृतो<br>वारणेन च तथाग्निसम्भवः ॥ ६४ | गिरिराजके समान प्रतीत होनेवाले तथा अग्निसे उत्पन्न षडानन भी सिद्धों, चारणों एवं देवसेनाके साथ शिवके गणोंसे आवृत होकरके हाथीपर सवार होकर चले ॥ ६४ ॥ |
| विघ्नं गणेशोऽप्यसुरेश्वराणां<br>कृत्वा सुराणां भगवानविघ्नम्।<br>विघ्नेश्वरो विघ्नगणैश्च सार्धं<br>तं देशमीशानपदं जगाम ॥ ६५ | विघ्नेश्वर भगवान् गणेश भी असुरेश्वरोंका विघ्न करके तथा देवताओंका अविघ्न करके विघ्नगणोंके साथ उस देश (त्रिपुर)-की ओर शिवजीके पीछे-पीछे चले ॥ ६५ ॥ |
| काली तदा कालनिशाप्रकाशां<br>शूलं कपालाभरणा करेण।<br>प्रकम्पयन्ती च तदा सुरेन्द्रान्<br>महासुरासृङ्मधुपानमत्ता ॥ ६६<br>मत्तेभगामी मदलोलनेत्रा<br>मत्तैः पिशाचैश्च गणैश्च मत्तैः।<br>मत्तेभचर्माम्बरवेष्टिताङ्गी<br>ययौ पुरस्ताच्च गणेश्वरस्य ॥ ६७ | उस समय हाथमें कालरात्रिके समान प्रकाशमान त्रिशूल धारण किये, कपालके आभूषणवाली, बड़े-बड़े असुरोंके रक्तरूपी मधुके पानसे मत्त, मतवाले हाथीके समान चालवाली, मदसे चंचल नेत्रोंवाली, मतवाले हाथियोंके चर्मरूपी वस्त्रसे वेष्टित अंगोंवाली काली देवताओंको कम्पित करती हुई मत्तपिशाचों तथा मतवाले गणोंके साथ गणेशजीके आगे-आगे चलीं ॥ ६६-६७ ॥ |
| तां सिद्धगन्धर्वपिशाचयक्ष-<br>विद्याधराहीन्द्रसुरेन्द्रमुख्याः।<br>प्रणेमुरुच्चैरभितुष्टुवुश्च<br>जयेति देवीं हिमशैलपुत्रीम् ॥ ६८ | सिद्धों, गन्धर्वों, पिशाचों, यक्षों, विद्याधरों, सर्पों तथा प्रमुख देवताओंने उन देवी पार्वतीको प्रणाम किया, उच्च स्वरसे उनकी स्तुति की तथा उनका जयकार किया ॥ ६८ ॥ |
| मातरः सुरवरारिसूधनाः<br>सादरं सुरगणैः सुपूजिताः।<br>मातरं ययुरथ स्ववाहनैः<br>स्वैर्गणैरूर्ध्वजधरैः समन्ततः ॥ ६९ | इसी प्रकार देवशत्रुओंका संहार करनेवाली तथा देवताओंके द्वारा आदरपूर्वक पूजित देवमाताएँ सभी ओर ध्वज धारण किये हुए अपने-अपने गणोंके साथ अपने-अपने वाहनोंसे माताके पीछे-पीछे चलीं ॥ ६९ ॥ |