भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 351

अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३४९


ईश्वरोंके नायक पूजनीय विनायककी पूजा करके तीनों पुरोंको जलानेके लिये गणेश्वरोंके साथ चल पड़े ॥ ५० ॥
तं देवदेवं सुरसिद्धसङ्घा<br>महेश्वरं भूतगणाश्च सर्वे।<br>गणेश्वरा नन्दिमुखास्तदानीं<br>स्ववाहनैरन्वय्युरीशमीशाः ॥ ५१उस समय सभी देवता, सिद्ध, भूतगण, नन्दी आदि गणेश्वर तथा अन्य ईश्वर अपने-अपने वाहनोंसे उन देवदेव ईश महेश्वरके पीछे-पीछे चले ॥ ५१ ॥
अग्रे सुराणां च गणेश्वराणां<br>तदाथ नन्दी गिरिराजकल्पम्।<br>विमानमारुह्य पुरं प्रहर्तुं<br>जगाम मृत्युं भगवानिवेशः॥ ५२हिमालयसदृश विमानपर चढ़कर नन्दी [सभी] देवताओं तथा गणेश्वरोंके आगे होकर त्रिपुरपर प्रहार करनेके लिये चले, मानो भगवान् शिव मृत्युपर प्रहारहेतु चले हों ॥ ५२ ॥
यान्तं तदानीं तु शिलादपुत्र-<br>मारुह्य नागेन्द्रवृषाश्ववर्यान्।<br>देवास्तदानीं गणपाश्च सर्वे<br>गणा ययुः स्वायुधचिह्नहस्ताः ॥ ५३उस समय जाते हुए शिलादपुत्र [नन्दी]-के पीछे सभी देवता, गणेश्वर तथा गणलोग विशाल हाथियों, बैलों और घोड़ोंपर आरूढ़ होकर हाथोंमें अपने शस्त्र तथा चिह्न धारण किये हुए चले ॥ ५३ ॥
खगेन्द्रमारुह्य नगेन्द्रकल्पं<br>खगध्वजो वामत एव शम्भोः।<br>जगाम तूर्णं जगतां हिताय<br>पुरत्रयं दग्धमुलुप्तशक्तिः ॥ ५४महाशक्तिशाली गरुड़ध्वज [विष्णु] गिरीन्द्रसदृश पक्षिराज [गरुड़]-पर आरूढ़ होकर लोकोंके हितार्थ तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये शिवजीके बायें होकर शीघ्रतापूर्वक चले ॥ ५४ ॥
तं सर्वदेवाः सुरलोकनाथं<br>समन्ततश्चान्वयुरप्रमेयम् ।<br>सुरासुरेशं शितशक्तिटङ्क-<br>गदात्रिशूलासिवरायुधैश्च ॥ ५५सभी देवता तीक्ष्ण शक्ति (बर्छी), टंक, गदा, त्रिशूल, खड्ग आदि उत्तम आयुधोंसे युक्त होकर देवलोकके नाथ, देवताओं तथा असुरोंके स्वामी और अप्रमेय उन शिवके पीछे-पीछे सभी ओरसे चले ॥ ५५ ॥
रराज मध्ये भगवान् सुराणां<br>विवाहनो वारिजपत्रवर्णः।<br>यथा सुमेरोः शिखराधिरूढः<br>सहस्ररश्मिर्भगवान् सुतीक्ष्णः ॥ ५६कमलपत्रके समान वर्णवाले गरुड़वाहन भगवान् विष्णु देवताओंके मध्य ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो सुमेरु [पर्वत]-के शिखरपर आरूढ़ हजार किरणोंवाले भगवान् सूर्य हों ॥ ५६ ॥
सहस्रनेत्रः प्रथमः सुराणां<br>गजेन्द्रमारुह्य च दक्षिणेऽस्य।<br>जगाम रुद्रस्य पुरं निहन्तुं<br>यथोरगांस्तत्र तु वैनतेयः ॥ ५७गजेन्द्र (ऐरावत)-पर आरूढ़ होकर देवताओंके प्रमुख सहस्र नेत्रवाले [इन्द्र] रुद्रके दाहिनी ओर होकर त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले; मानो गरुड़ सर्पोंका नाश करनेके लिये चल दिये हों ॥ ५७ ॥
तं सिद्धगन्धर्वसुरेन्द्रवीराः<br>सुरेन्द्रवृन्दाधिपमिन्द्रमीशम् ।<br>समन्ततस्तुष्टुवुरिष्टदं ते<br>जयेति शक्रं वरपुष्पवृष्ट्या ॥ ५८सिद्ध, गन्धर्व, श्रेष्ठ देवता तथा अन्य वीर देवताओंके स्वामी प्रभु उन इन्द्रकी स्तुति कर रहे थे और वे श्रेष्ठ पुष्पवृष्टिके साथ कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले इन्द्रकी जय-जयकार कर रहे थे ॥ ५८ ॥
तदा ह्यहल्योपपतिं सुरेशं<br>जगत्पतिं देवपतिं दिविष्ठाः।उस समय स्वर्गमें स्थित देवताओंने अहल्याके उपपति, देवताओंके ईश, जगत्के स्वामी, देवताओंके