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श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३४९


ईश्वरोंके नायक पूजनीय विनायककी पूजा करके तीनों पुरोंको जलानेके लिये गणेश्वरोंके साथ चल पड़े ॥ ५० ॥
तं देवदेवं सुरसिद्धसङ्घा<br>महेश्वरं भूतगणाश्च सर्वे।<br>गणेश्वरा नन्दिमुखास्तदानीं<br>स्ववाहनैरन्वय्युरीशमीशाः ॥ ५१उस समय सभी देवता, सिद्ध, भूतगण, नन्दी आदि गणेश्वर तथा अन्य ईश्वर अपने-अपने वाहनोंसे उन देवदेव ईश महेश्वरके पीछे-पीछे चले ॥ ५१ ॥
अग्रे सुराणां च गणेश्वराणां<br>तदाथ नन्दी गिरिराजकल्पम्।<br>विमानमारुह्य पुरं प्रहर्तुं<br>जगाम मृत्युं भगवानिवेशः॥ ५२हिमालयसदृश विमानपर चढ़कर नन्दी [सभी] देवताओं तथा गणेश्वरोंके आगे होकर त्रिपुरपर प्रहार करनेके लिये चले, मानो भगवान् शिव मृत्युपर प्रहारहेतु चले हों ॥ ५२ ॥
यान्तं तदानीं तु शिलादपुत्र-<br>मारुह्य नागेन्द्रवृषाश्ववर्यान्।<br>देवास्तदानीं गणपाश्च सर्वे<br>गणा ययुः स्वायुधचिह्नहस्ताः ॥ ५३उस समय जाते हुए शिलादपुत्र [नन्दी]-के पीछे सभी देवता, गणेश्वर तथा गणलोग विशाल हाथियों, बैलों और घोड़ोंपर आरूढ़ होकर हाथोंमें अपने शस्त्र तथा चिह्न धारण किये हुए चले ॥ ५३ ॥
खगेन्द्रमारुह्य नगेन्द्रकल्पं<br>खगध्वजो वामत एव शम्भोः।<br>जगाम तूर्णं जगतां हिताय<br>पुरत्रयं दग्धमुलुप्तशक्तिः ॥ ५४महाशक्तिशाली गरुड़ध्वज [विष्णु] गिरीन्द्रसदृश पक्षिराज [गरुड़]-पर आरूढ़ होकर लोकोंके हितार्थ तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये शिवजीके बायें होकर शीघ्रतापूर्वक चले ॥ ५४ ॥
तं सर्वदेवाः सुरलोकनाथं<br>समन्ततश्चान्वयुरप्रमेयम् ।<br>सुरासुरेशं शितशक्तिटङ्क-<br>गदात्रिशूलासिवरायुधैश्च ॥ ५५सभी देवता तीक्ष्ण शक्ति (बर्छी), टंक, गदा, त्रिशूल, खड्ग आदि उत्तम आयुधोंसे युक्त होकर देवलोकके नाथ, देवताओं तथा असुरोंके स्वामी और अप्रमेय उन शिवके पीछे-पीछे सभी ओरसे चले ॥ ५५ ॥
रराज मध्ये भगवान् सुराणां<br>विवाहनो वारिजपत्रवर्णः।<br>यथा सुमेरोः शिखराधिरूढः<br>सहस्ररश्मिर्भगवान् सुतीक्ष्णः ॥ ५६कमलपत्रके समान वर्णवाले गरुड़वाहन भगवान् विष्णु देवताओंके मध्य ऐसे सुशोभित हो रहे थे, मानो सुमेरु [पर्वत]-के शिखरपर आरूढ़ हजार किरणोंवाले भगवान् सूर्य हों ॥ ५६ ॥
सहस्रनेत्रः प्रथमः सुराणां<br>गजेन्द्रमारुह्य च दक्षिणेऽस्य।<br>जगाम रुद्रस्य पुरं निहन्तुं<br>यथोरगांस्तत्र तु वैनतेयः ॥ ५७गजेन्द्र (ऐरावत)-पर आरूढ़ होकर देवताओंके प्रमुख सहस्र नेत्रवाले [इन्द्र] रुद्रके दाहिनी ओर होकर त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले; मानो गरुड़ सर्पोंका नाश करनेके लिये चल दिये हों ॥ ५७ ॥
तं सिद्धगन्धर्वसुरेन्द्रवीराः<br>सुरेन्द्रवृन्दाधिपमिन्द्रमीशम् ।<br>समन्ततस्तुष्टुवुरिष्टदं ते<br>जयेति शक्रं वरपुष्पवृष्ट्या ॥ ५८सिद्ध, गन्धर्व, श्रेष्ठ देवता तथा अन्य वीर देवताओंके स्वामी प्रभु उन इन्द्रकी स्तुति कर रहे थे और वे श्रेष्ठ पुष्पवृष्टिके साथ कामनाओंकी पूर्ति करनेवाले इन्द्रकी जय-जयकार कर रहे थे ॥ ५८ ॥
तदा ह्यहल्योपपतिं सुरेशं<br>जगत्पतिं देवपतिं दिविष्ठाः।उस समय स्वर्गमें स्थित देवताओंने अहल्याके उपपति, देवताओंके ईश, जगत्के स्वामी, देवताओंके

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संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
प्रणेमुरालोक्य सहस्रनेत्रं<br>सलीलमम्बा तनयं यथेन्द्रम् ॥ ५९स्वामी तथा हजार नेत्रोंवाले इन्द्रको देखकर लीलापूर्वक उसी प्रकार प्रणाम किया, जैसे माता पार्वती पुत्र कार्तिकेयको प्रणाम करती हैं ॥ ५९ ॥
यमपावकवित्तेशा वायुर्निर्ऋतिरेव च।<br>अपां पतिस्तथेशानो भवं चानुसमागताः ॥ ६०यम, अग्नि, कुबेर, वायु, निर्ऋति, वरुण तथा ईशान भी शिवजीके पीछे-पीछे चले ॥ ६० ॥
वीरभद्रो रणे भद्रो नैर्ऋत्यां वै रथस्य तु।<br>वृषभेन्द्रं समारुह्य रोमजैश्र्च समावृतः ॥ ६१<br>सेवां चक्रे पुरं हन्तुं देवदेवं त्रियम्बकम्।<br>महाकालो महातेजा महादेव इवापरः ॥ ६२<br>वायव्यां सगणैः सार्धं सेवां चक्रे रथस्य तु ॥ ६३युद्धमें प्रवीण वीरभद्र वृषभेन्द्रपर आरूढ़ होकर रथके नैर्ऋत्यकोण (दक्षिण-पश्चिम)-में होकर त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले; अपने रोमजसंज्ञक बाणोंसे घिरे हुए वे देवदेव त्रियम्बककी सेवा कर रहे थे। दूसरे महादेवके समान प्रतीत होनेवाले महातेजस्वी महाकाल रथके वायव्यकोण (उत्तर-पश्चिम)-में होकर गणोंके साथ रथकी सेवा कर रहे थे ॥ ६१-६३ ॥
षण्मुखोऽपि सह सिद्धचारणैः<br>सेनया च गिरिराजसन्निभः।<br>देवनाथगणवृन्दसंवृतो<br>वारणेन च तथाग्निसम्भवः ॥ ६४गिरिराजके समान प्रतीत होनेवाले तथा अग्निसे उत्पन्न षडानन भी सिद्धों, चारणों एवं देवसेनाके साथ शिवके गणोंसे आवृत होकरके हाथीपर सवार होकर चले ॥ ६४ ॥
विघ्नं गणेशोऽप्यसुरेश्वराणां<br>कृत्वा सुराणां भगवानविघ्नम्।<br>विघ्नेश्वरो विघ्नगणैश्च सार्धं<br>तं देशमीशानपदं जगाम ॥ ६५विघ्नेश्वर भगवान् गणेश भी असुरेश्वरोंका विघ्न करके तथा देवताओंका अविघ्न करके विघ्नगणोंके साथ उस देश (त्रिपुर)-की ओर शिवजीके पीछे-पीछे चले ॥ ६५ ॥
काली तदा कालनिशाप्रकाशां<br>शूलं कपालाभरणा करेण।<br>प्रकम्पयन्ती च तदा सुरेन्द्रान्<br>महासुरासृङ्मधुपानमत्ता ॥ ६६<br>मत्तेभगामी मदलोलनेत्रा<br>मत्तैः पिशाचैश्च गणैश्च मत्तैः।<br>मत्तेभचर्माम्बरवेष्टिताङ्गी<br>ययौ पुरस्ताच्च गणेश्वरस्य ॥ ६७उस समय हाथमें कालरात्रिके समान प्रकाशमान त्रिशूल धारण किये, कपालके आभूषणवाली, बड़े-बड़े असुरोंके रक्तरूपी मधुके पानसे मत्त, मतवाले हाथीके समान चालवाली, मदसे चंचल नेत्रोंवाली, मतवाले हाथियोंके चर्मरूपी वस्त्रसे वेष्टित अंगोंवाली काली देवताओंको कम्पित करती हुई मत्तपिशाचों तथा मतवाले गणोंके साथ गणेशजीके आगे-आगे चलीं ॥ ६६-६७ ॥
तां सिद्धगन्धर्वपिशाचयक्ष-<br>विद्याधराहीन्द्रसुरेन्द्रमुख्याः।<br>प्रणेमुरुच्चैरभितुष्टुवुश्च<br>जयेति देवीं हिमशैलपुत्रीम् ॥ ६८सिद्धों, गन्धर्वों, पिशाचों, यक्षों, विद्याधरों, सर्पों तथा प्रमुख देवताओंने उन देवी पार्वतीको प्रणाम किया, उच्च स्वरसे उनकी स्तुति की तथा उनका जयकार किया ॥ ६८ ॥
मातरः सुरवरारिसूधनाः<br>सादरं सुरगणैः सुपूजिताः।<br>मातरं ययुरथ स्ववाहनैः<br>स्वैर्गणैरूर्ध्वजधरैः समन्ततः ॥ ६९इसी प्रकार देवशत्रुओंका संहार करनेवाली तथा देवताओंके द्वारा आदरपूर्वक पूजित देवमाताएँ सभी ओर ध्वज धारण किये हुए अपने-अपने गणोंके साथ अपने-अपने वाहनोंसे माताके पीछे-पीछे चलीं ॥ ६९ ॥

अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३५१


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दुर्गारूढमृगाधिपा दुरतिगा दोर्दण्डवृन्दैः शिवा<br>बिभ्राणाङ्कुशशूलपाशपरशुं चक्रासिशङ्खायुधम् ।<br>प्रौढादित्यसहस्रवह्निसदृशैर्नेत्रैर्दहन्ती पथं<br>बाला बालपराक्रमा भगवती दैत्यान् प्रहर्तुं ययौ ॥ ७०बालरूपा होते हुए भी अमित पराक्रमवाली तथा [सबके द्वारा] अनतिक्रमणीय भगवती दुर्गा सिंहपर सवार होकर [अपनी] भुजाओंमें अंकुश, शूल, पाश, परशु, चक्र, खड्ग, शंख आदि आयुध धारण किये हुए और मध्याह्नकालीन सूर्य तथा हजार अग्नियोंके समान [देदीप्यमान] नेत्रोंसे मार्गको जलाती हुई [उन] दैत्योंपर प्रहार करनेके लिये चलीं ॥ ७० ॥
तं देवमीशं त्रिपुरं निहन्तुं<br>तदा तु देवेन्द्ररविप्रकाशाः ।<br>गजैर्हयैः सिंहवरैरथैश्च<br>वृषैर्ययुस्ते गणराजमुख्याः ॥ ७१उस समय इन्द्र तथा सूर्यके समान कान्तिवाले मुख्य गणेश्वर त्रिपुरका नाश करनेके लिये हाथियों, घोड़ों, उत्तम सिंहों, रथों तथा वृषभोंपर सवार होकर उन भगवान् शिवके पीछे चले ॥ ७१ ॥
हलैश्च फालैर्मुसलैर्भुशुण्डै-<br>र्गिरीन्द्रकूटैर्गिरिसन्निभास्ते ।<br>ययुः पुरस्ताद्धि महेश्वरस्य<br>सुरेश्वरा भूतगणेश्वराश्च ॥ ७२हलों, फालों, मुसलों, लोहनिर्मित गदाओं तथा पर्वतशिखरोंको धारण किये हुए गिरिसदृश वे सुरेश्वर, भूत तथा गणेश्वर महेश्वरके आगे-आगे चले ॥ ७२ ॥
तथेन्द्रपद्मोद्भवविष्णुमुख्याः<br>सुरा गणेशाश्च गणेशमीशम् ।<br>जयेति वाग्भिर्भगवन्तमूचुः<br>किरीटदत्ताञ्जलयः समन्तात् ॥ ७३इन्द्र, ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता और [सभी] गणेश्वर अपने मुकुटोंको अंजलिपर टिकाकर [प्रणाम करते हुए] चारों ओरसे वाणीद्वारा ईश भगवान् गणेशकी जय बोल रहे थे ॥ ७३ ॥
ननृतुर्मुनयः सर्वे दण्डहस्ता जटाधराः ।<br>ववृषुः पुष्पवर्षाणि खेचराः सिद्धचारणाः ।<br>पुरत्रयं च विप्रेन्द्राः प्राणदत्सर्वतस्तथा ॥ ७४हाथमें दण्ड लिये हुए जटाधारी सभी मुनियोंने नृत्य किया और आकाशचारी सिद्धों तथा चारणोंने पुष्पवर्षा की। हे विप्रेन्द्रो! त्रिपुर चारों ओरसे गूँज उठा ॥ ७४ ॥
गणेश्वरैर्देवगणैश्च भृङ्गी<br>समावृतः सर्वगणेन्द्रवर्यः ।<br>जगाम योगी त्रिपुरं निहन्तुं<br>विमानमारुह्य यथा महेन्द्रः ॥ ७५सभी गणेश्वरोंमें श्रेष्ठ योगपरायण भृंगी देवताओंसे घिरे हुए इन्द्रकी भाँति गणेश्वरोंसे घिरे होकर विमानपर चढ़कर त्रिपुरका नाश करनेके लिये चले ॥ ७५ ॥
केशो विगतवासाश्च महाकेशो महाज्वरः ।<br>सोमवल्ली सवर्णश्च सोमपः सेनकस्तथा ॥ ७६<br>सोमधृक् सूर्यवाचश्च सूर्यपेषणकस्तथा ।<br>सूर्याक्षः सूरिनामा च सुरः सुन्दर एव च ॥ ७७<br>प्रकुदः ककुदन्तश्च कम्पनश्च प्रकम्पनः ।<br>इन्द्रश्चेन्द्रजयश्चैव महाभीर्भीमकस्तथा ॥ ७८<br>शताक्षश्चैव पञ्चाक्षः सहस्राक्षो महोदरः ।<br>यमजिह्वः शताश्वश्च कण्ठनः कण्ठपूजनः ॥ ७९<br>द्विशिखस्त्रिशिखश्चैव तथा पञ्चशिखो द्विजाः ।<br>मुण्डोऽर्धमुण्डो दीर्घश्च पिशाचास्यः पिनाकधृक् ॥ ८०<br>पिप्पलायतनश्चैव तथा ह्यङ्गारकाशनः ।<br>शिथिलः शिथिलास्यश्च अक्षपादो ह्यजः कुजः ॥ ८१<br>अजवक्त्रो हयवक्त्रो गजवक्त्रोर्ध्ववक्त्रकः ।<br>इत्याद्याः परिवायेशं लक्ष्यलक्षणवर्जिताः ॥ ८२<br>वृन्दशतं समावृत्य जग्मुः सोमं गणैर्वृताः ।<br>सहस्राणां सहस्राणि रुद्राणामूर्ध्वरेतसाम् ॥ ८३हे द्विजो! केश, विगतवास, महाकेश, महाज्वर, सोमवल्ली, सवर्ण, सोमप, सेनक, सोमधृक्, सूर्यवाच, सूर्यपेषण, सूर्याक्ष, सूरिनामा, सुर, सुन्दर, प्रकुद, ककुदन्त, कम्पन, प्रकम्पन, इन्द्र, इन्द्रजय, महाभी, भीमक, शताक्ष, पंचाक्ष, सहस्राक्ष, महोदर, यमजिह्व, शताश्व, कण्ठन, कण्ठपूजन, द्विशिख, त्रिशिख, पंचशिख, मुण्ड, अर्धमुण्ड, दीर्घ, पिशाचास्य, पिनाकधृक्, पिप्पलायतन, अंगारकाशन, शिथिल, शिथिलास्य, अक्षपाद, अज, कुज, अजवक्त्र, हयवक्त्र, गजवक्त्र, ऊर्ध्ववक्त्र तथा अन्य लक्ष्यलक्षण-वर्जित गणेश्वर एक साथ मिलकर
३५२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
समावृत्य महादेवं देवदेवं महेश्वरम्।<br>दग्धुं पुरत्रयं जग्मुः कोटिकोटिगणैर्वृताः ॥ ८४<br><br>त्रयस्त्रिंशत्सुराश्चैव त्रयश्च त्रिशतास्तथा।<br>त्रयश्च त्रिसहस्त्राणि जग्मुर्देवाः समन्ततः ॥ ८५अपने गणसमुदायोंके साथ उन शिवजीको घेरकर चले। इसी प्रकार [अपने] करोड़ों-करोड़ गणोंसे घिरे हुए हजारों-हजार रुद्र तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये महादेव देवदेव महेश्वरको घेरकर चले ॥ ७६-८४॥<br><br>[वसु, रुद्र, आदित्य आदि] तैंतीस देवता; ब्रह्मा, विष्णु, महेश—ये तीनों देवता और उनके भेदरूप तीन सौ तथा तीन हजार तीन अन्य देवता सभी ओरसे वहाँ गये ॥ ८५॥
मातरः सर्वलोकानां गणानां चैव मातरः।<br>भूतानां मातरश्चैव जग्मुर्देवस्य पृष्ठतः ॥ ८६सभी लोकोंकी माताएँ, गणोंकी माताएँ तथा भूतोंकी माताएँ शिवजीके पीछे-पीछे चलीं ॥ ८६॥
भाति मध्ये गणानां च रथमध्ये गणेश्वरः।<br>नभस्यमलनक्षत्रे तारामध्ये इवोडुराट् ॥ ८७रथके मध्य [विराजमान] गणेश्वर गणोंके बीच उसी तरह प्रतीत हो रहे थे, जैसे निर्मल नक्षत्रोंवाले आकाशमें ताराओंके बीच चन्द्रमा ॥ ८७॥
रराज देवी देवस्य गिरिजा पार्श्वसंस्थिता।<br>तदा प्रभावतो गौरी भवस्येव जगन्मयी ॥ ८८<br><br>शुभावती तदा देवी पार्श्वसंस्था विभाति सा।<br>चामरासक्तहस्ताग्रा सा हेमाम्बुजवर्णिका ॥ ८९उस समय शिवके प्रभाव (सामर्थ्य)-के कारण ही जगन्मयी पार्वती देवी [उन] शिवके वामभागमें स्थित होकर सुशोभित हो रही थीं। उस समय सुवर्णकमलके समान वर्णवाली देवी शुभावती (पार्वतीकी सखी) हाथके अग्रभागमें चँवर लिये हुए उनके बगलमें स्थित होकर सुशोभित हो रही थीं ॥ ८८-८९॥
अथ विभाति विभोर्विशदं वपु-<br>र्भसितभासितमम्बिकया तया।<br>सितमिवाभ्रमहो इह विद्युता<br>नभसि देवपतेः परमेष्ठिनः ॥ ९०सर्वव्यापी देवेश्वर शिवका भस्मसे दीप्यमान अतिस्वच्छ विग्रह उन पार्वतीके साथ उसी प्रकार प्रतीत हो रहा था, जैसे आकाशमें विद्युत्के साथ श्वेत बादल ॥ ९०॥
भातीन्द्रधनुषाकाशं मेरुणा च यथा जगत्।<br>हिरण्यधनुषा सौम्यं वपुः शम्भोः शशिद्युति ॥ ९१सुवर्णमय धनुषसे युक्त तथा चन्द्रमाकी प्रभावाला शंकरजीका सौम्य शरीर इन्द्रधनुषसे युक्त आकाश अथवा मेरुपर्वतसे युक्त जगत्की भाँति प्रतीत हो रहा था ॥ ९१॥
सितातपत्रं रत्नांशुमिश्रितं परमेष्ठिनः।<br>यथोदये शशाङ्कस्य भात्यखण्डं हि मण्डलम् ॥ ९२रत्नोंकी किरणोंसे मिश्रित शिवजीका श्वेत छत्र उदयकालमें चन्द्रमाके पूर्णमण्डलके समान प्रतीत हो रहा था ॥ ९२॥
सदुकूला शिवे रक्ता लम्बिता भाति मालिका।<br>छत्रान्ता रत्नजाकाशात्पतन्तीव सरिद्वरा ॥ ९३शिवजीके गलेमें रेशमी वस्त्रसहित लटकती हुई रत्नमयी मोतियोंकी माला उनके छत्रके पास आकाशसे गिरती हुई गंगाके समान प्रतीत हो रही थी ॥ ९३॥
अथ महेन्द्रविरिञ्चिविभावसु-<br>प्रभृतिभिर्नतपादसरोरुहः ।<br>सह तदा च जगाम तयाम्बया<br>सकललोकहिताय पुरत्रयम् ॥ ९४इस प्रकार महेन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि आदिके द्वारा वन्दित चरणकमलवाले शिवजीने समस्त संसारके हितके लिये उन पार्वतीके साथ त्रिपुरके लिये प्रस्थान किया ॥ ९४॥

अध्याय ७२] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३५३


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
दग्धुं समर्थो मनसा क्षणेन<br>चराचरं सर्वमिदं त्रिशूली।<br>किमत्र दग्धुं त्रिपुरं पिनाकी<br>स्वयं गतश्चात्र गणैश्च सार्धम्॥ ९५॥<br><br>रथेन किं चेषुवरेण तस्य<br>गणैश्च किं देवगणैश्च शम्भोः।<br>पुरत्रयं दग्धुमलुप्तशक्तेः<br>किमेतदित्याहुरजेन्द्रमुख्याः ॥ ९६॥<br><br>मन्वाम नूनं भगवान् पिनाकी<br>लीलार्थमेतत्सकलं प्रवृर्तुम्।<br>व्यवस्थितश्चेति तथान्यथा चे-<br>दाडम्बरेणास्य फलं किमन्यत्॥ ९७॥त्रिशूलधारी पिनाकी (शिव) मनसे ही क्षणभरमें इस सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को दग्ध करनेमें समर्थ हैं, तो फिर वे त्रिपुरको जलानेके लिये गणोंके साथ वहाँ क्यों जा रहे हैं? तीनों पुरोंको जलानेके लिये उन अलुप्त शक्तिवाले शम्भुको रथसे, उत्तम बाणसे, गणोंसे तथा देवताओंसे क्या प्रयोजन है—ब्रह्मा, इन्द्र आदि प्रमुख देवोंने ऐसा कहा। हमलोग तो समझते हैं कि पिनाकधारी भगवान् [शिव]-लीलाके लिये यह सब करनेके लिये प्रवृत्त हैं; अन्यथा [इस] आडम्बरसे इन्हें दूसरा कौन-सा लाभ है?॥ ९५–९७॥
पुरत्रयस्यास्य समीपवर्ती<br>सुरेशवैरैर्नन्दिमुखैश्च नन्दी।<br>गणैर्गणेशस्तु रराज देव्या<br>जगद्रथो मेरुरिवाष्टशृङ्गैः॥ ९८॥इस त्रिपुरके समीपस्थित नन्दी, नन्दिकेश्वर आदि सुरेश्वरोंके साथ, गणेशजी गणोंके साथ तथा मेरुपर्वत आठ शिखरोंके साथ जिस प्रकार सुशोभित हो रहे थे, उसी प्रकार जगद्रथ (शिव) देवी [पार्वती]-के साथ शोभायमान थे॥ ९८॥
अथ निरीक्ष्य सुरेश्वरमीश्वरं<br>सगणमद्रिसुतासहितं तदा।<br>त्रिपुररङ्गतलोपरि संस्थितः<br>सुरगणोऽनुजगाम स्वयं तथा॥ ९९॥इसके बाद गणों तथा पार्वतीसहित सुरेश्वर शिवको देखकर त्रिपुरके युद्धक्षेत्रमें उपस्थित देवसमूहने स्वयं उनका अनुगमन किया॥ ९९॥
जगत्त्रयं सर्वमिवापरं तत्<br>पुरत्रयं तत्र विभाति सम्यक्।<br>नरेश्वरैश्चैव गणैश्च देवैः<br>सुरेतरैश्च त्रिविधैर्मुनीन्द्राः॥ १००॥हे मुनीश्वरो ! युद्धकालमें तीन प्रकारके दैत्योंसे युक्त वे तीनों पुर राजाओं, [सिद्ध आदि] गणों तथा देवताओंसे युक्त तीनों लोकके समान प्रतीत हो रहे थे॥ १००॥
अथ सज्यं धनुः कृत्वा शर्वः संधाय तं शरम्।<br>युक्त्वा पाशुपतास्त्रेण त्रिपुरं समचिन्तयत्॥ १०१॥इसके बाद धनुषपर डोरी चढ़ाकर उसपर बाण रखकर उसे पाशुपत-अस्त्रसे युक्त करके शिवजीने त्रिपुरका चिन्तन किया॥ १०१॥
तस्मिंस्थिते महादेवे रुद्रे विततकार्मुके।<br>पुराणि तेन कालेन जग्मुरेकत्वमाशु वै॥ १०२॥<br><br>एकीभावं गते चैव त्रिपुरे समुपगते।<br>बभूव तुमलो हर्षो देवतानां महात्मनाम्॥ १०३॥धनुष ताने हुए उन महादेवके खड़े होनेपर उसी समय तीनों पुर शीघ्र ही आपसमें जुड़ गये। तीनों पुरोंके एकमें मिल जानेपर तथा समीपमें आ जानेपर महान् आत्मावाले [इन्द्र आदि] देवताओंको परम हर्ष हुआ॥ १०२-१०३॥
ततो देवगणाः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः।<br>जयेति वाचो मुमुचुः संस्तुवन्तोऽष्टमूर्तिनम्॥ १०४॥तदनन्तर सभी देवगण, सिद्ध तथा महर्षिगण अष्टमूर्ति [शिव]-की स्तुति करते हुए उनकी जय बोलने लगे॥ १०४॥
अथाह भगवान् ब्रह्मा भगनेत्रनिपातनम्।<br>पुष्ययोगेऽपि सम्प्राप्ते लीलावशमुमापतिम्॥ १०५॥<br><br>स्थाने तव महादेव चेष्टेयं परमेश्वर।<br>पूर्वदेवाश्च देवाश्च समास्तव यतः प्रभो॥ १०६॥<br><br>तथापि देवा धर्मिष्ठाः पूर्वदेवाश्च पापिनः।<br>यतस्तस्माज्जगन्नाथ लीलां त्यक्तुमिहार्हसि॥ १०७॥इसके बाद पुष्य नक्षत्रका योग प्राप्त होनेपर भगवान् ब्रह्माने भगके नेत्रका विनाश करनेवाले लीलासक्त उमापतिसे कहा—हे महादेव ! हे परमेश्वर ! हे प्रभो ! इस स्थानपर आपकी यह भावना है कि दैत्य तथा देवता आपके लिये समान हैं, फिर भी देवता धर्मनिष्ठ हैं और दैत्य पापी हैं; अतः हे जगन्नाथ!
३५४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
किं रथेन ध्वजेनेश तव दग्धुं पुरत्रयम्।<br>इषुणा भूतसङ्घैश्च विष्णुना च मया प्रभो ॥ १०८<br>पुष्ययोगे त्वनुप्राप्ते पुरं दग्धुमिहार्हसि।<br>यावन्न यान्ति देवेश वियोगं तावदेव तु ॥ १०९<br>दग्धुमर्हसि शीघ्रं त्वं त्रीण्येतानि पुराणि वै।आप यहाँ अपनी लीलाका त्याग करें। हे ईश! हे प्रभो! तीनों पुरोंको दग्ध करनेके लिये आपको रथ, ध्वज, बाण, भूतगणों, विष्णु तथा मुझ [ब्रह्मा]-से क्या प्रयोजन है? पुष्ययोग प्राप्त होनेपर आप कृपा करके त्रिपुरको दग्ध कर दीजिये। हे देवेश! जबतक ये तीनों पुर अलग-अलग न हो जायँ, तबतक आप इन्हें जला दीजिये॥ १०५-१०९ १/२॥
अथ देवो महादेवः सर्वज्ञस्तदवैक्षत ॥ ११०<br><br>पुरत्रयं विरूपाक्षस्तत्क्षणाद्भस्म वै कृतम्।<br>सोमश्च भगवान् विष्णुः कालाग्निर्वायुरेव च ॥ १११<br>शरे व्यवस्थिताः सर्वे देवमूचुः प्रणम्य तम्।<br>दग्धमप्यथ देवेश वीक्षणेन पुरत्रयम् ॥ ११२<br>अस्मद्धितार्थं देवेश शरं मोक्तुमिहार्हसि।तदनन्तर सब कुछ जाननेवाले तथा विरूपाक्ष (त्रिलोचन) भगवान् महादेवने त्रिपुरकी ओर देखा और उसी क्षण उसे भस्म कर दिया। तब उनके बाणमें स्थित चन्द्र, भगवान् विष्णु, कालाग्नि तथा वायु-इन सभीने उन शिवजीको प्रणाम करके कहा-हे देवेश! आपके देखनेमात्रसे त्रिपुर दग्ध हो गया, फिर भी हे देवेश! हमलोगोंके हितके लिये आप बाणको छोड़ दीजिये॥ ११०-११२ १/२॥
अथ सम्मृज्य धनुषो ज्यां हसन् त्रिपुरार्दनः ॥ ११३<br>मुमोच बाणं विप्रेन्द्रा व्याकृष्याकर्णमीश्वरः।<br>तत्क्षणात् त्रिपुरं दग्ध्वा त्रिपुरान्तकरः शरः ॥ ११४<br>देवदेवं समासाद्य नमस्कृत्य व्यवस्थितः।हे विप्रेन्द्रो! इसके बाद धनुषकी डोरी चढ़ाकर उसे कानतक खींचकर त्रिपुरका नाश करनेवाले शिवने हँसते हुए बाण छोड़ दिया। त्रिपुरका नाश करनेवाला वह बाण उसी क्षण त्रिपुरको जलाकर देवदेवके पास आकर उन्हें प्रणाम करके व्यवस्थित हो गया॥ ११३-११४ १/२॥
रेजे पुरत्रयं दग्धं दैत्यकोटिशतैर्वृतम् ॥ ११५<br>इषुणा तेन कल्पान्ते रुद्रेणेव जगत्त्रयम्।<br>ये पूजयन्ति तत्रापि दैत्या रुद्रं सबान्धवाः ॥ ११६<br>गाणपत्यं तदा शम्भोर्ययुः पूजाविधेर्बलात्।उस बाणके द्वारा सैकड़ों-करोड़ दैत्योंसहित दग्ध किया गया वह त्रिपुर कल्पके अन्तमें रुद्रके द्वारा दग्ध किये गये त्रिलोकके समान प्रतीत हो रहा था। वहाँ [त्रिपुरमें] भी जिन दैत्योंने बान्धवोंके साथ रुद्रका पूजन किया, उन्होंने शम्भुकी पूजाविधिके प्रभावसे गाणपत्य (गणपतिपद) प्राप्त किया॥ ११५-११६ १/२॥
न किञ्चिदब्रुवन् देवाः सेन्द्रोपेन्द्रा गणेश्वराः ॥ ११७<br>भयाद्देवं निरीक्ष्यैव देवीं हिमवतः सुताम्।<br>दृष्ट्वा भीतं तदानीकं देवानां देवपुङ्गवः ॥ ११८<br>किं चेत्याह तदा देवान् प्रणेमुस्तं समन्ततः ॥ ११९इन्द्र-विष्णुसहित सभी देवता तथा गणेश्वर शिव तथा हिमालयपुत्री देवी [पार्वती]-की ओर देखकर भयवश कुछ नहीं बोले। तब देवताओंकी सेनाको भयभीत देखकर देवश्रेष्ठ [शिव]-ने देवताओंसे कहा- 'क्या बात है?' इसपर वे सभी ओरसे उन्हें केवल
अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति३५५

| ववन्दिरे नन्दिनमिन्दुभूषणं<br>  ववन्दिरे पर्वतराजसम्भवाम्।<br>ववन्दिरे चाद्रिसुतासुतं प्रभुं<br>  ववन्दिरे देवगणा महेश्वरम्॥ १२०<br>तुष्टाव हृदये ब्रह्मा देवैः सह समाहितः।<br>विष्णुना च भवं देवं त्रिपुरारातिमीश्वरम्॥ १२१ | प्रणाम करते रहे। देवताओंने इन्दुभूषण नन्दीको प्रणाम किया, पर्वतराजकी पुत्री [पार्वती]-को प्रणाम किया, पार्वतीपुत्र [गणेश]-को प्रणाम किया और प्रभु महेश्वरको प्रणाम किया। इसके बाद ब्रह्माजी एकाग्रचित्त होकर देवताओं तथा विष्णुके साथ त्रिपुरशत्रु भगवान् भव ईश्वरकी हृदयसे स्तुति करने लगे॥ ११७-१२१॥ | | श्रीपितामह उवाच<br>प्रसीद देवदेवेश प्रसीद परमेश्वर।<br>प्रसीद जगतां नाथ प्रसीदानन्ददाव्यय॥ १२२<br>पञ्चास्य रुद्ररुद्राय पञ्चाशत्कोटिमूर्तये।<br>आत्मत्रयोपविष्टाय विद्यातत्त्वाय ते नमः॥ १२३<br>शिवाय शिवतत्त्वाय अघोराय नमो नमः।<br>अघोराष्टकतत्त्वाय द्वादशात्मस्वरूपिणे॥ १२४ | श्रीपितामह बोले— हे देवदेवेश! प्रसन्न हो जाइये। हे परमेश्वर! प्रसन्न हो जाइये। हे जगन्नाथ! प्रसन्न हो जाइये। हे आनन्ददाता! हे अव्यय! हे पंचमुख! प्रसन्न हो जाइये। [यम आदि] रुद्रोंको भी रुलानेवाले, पचास करोड़ मूर्तिवाले, [विश्व-प्राज्ञ-तैजस] तीन रूपोंमें स्थित रहनेवाले तथा विद्याओंमें मुख्य कारणस्वरूप आपको नमस्कार है। शिव, शिवतत्त्व, अघोर, भैरवाष्टकके कारणरूप तथा द्वादश आत्मास्वरूपीको बार-बार नमस्कार है॥ १२२-१२४॥ | | विद्युत्कोटिप्रतीकाशमष्टकाशं सुशोभनम्।<br>रूपमास्थाय लोकेऽस्मिन् संस्थिताय शिवात्मने॥ १२५ | करोड़ों विद्युत्के समान तथा पृथिवी आदिमें प्रकाशमान अत्यन्त सुन्दर रूप धारण करके इस लोकमें विराजमान शिवस्वरूपको नमस्कार है॥ १२५॥ | | अग्निवर्णाय रौद्राय अम्बिकार्धशरीरिणे।<br>धवलश्यामरक्तानां मुक्तिदायामराय च॥ १२६<br>ज्येष्ठाय रुद्ररूपाय सोमाय वरदाय च।<br>त्रिलोकाय त्रिदेवाय वषट्काराय वै नमः॥ १२७ | अग्निके समान वर्णवाले, भयानक, अम्बिकाको अपने आधे शरीरमें धारण करनेवाले (अर्धनारीश्वर), रुद्र-विष्णु-ब्रह्माको मुक्ति देनेवाले, मृत्युरहित, ज्येष्ठ, भयंकर रूपवाले, सोमस्वरूप, वर प्रदान करनेवाले, त्रिलोकस्वरूप, त्रिदेवस्वरूप तथा वषट्कारस्वरूप शिवको नमस्कार है॥ १२६-१२७॥ | | मध्ये गगनरूपाय गगनस्थाय ते नमः।<br>अष्टक्षेत्राष्टरूपाय अष्टतत्त्वाय ते नमः॥ १२८<br>चतुर्धा च चतुर्धा च चतुर्धा संस्थिताय च।<br>पञ्चधा पञ्चधा चैव पञ्चमन्त्रशरीरिणे॥ १२९ | हृदयकमलके मध्य गगनसदृशरूपवाले तथा गगनमें स्थित आपको नमस्कार है। [सूर्य आदि] आठ स्थानोंमें [रुद्र आदि] आठ रूपोंवाले तथा पृथ्वी आदि आठ तत्त्वोंवाले आपको नमस्कार है। चारों वेदरूपसे, चारों आश्रमरूपसे तथा चतुर्व्यूहरूपसे अवस्थित, आकाश आदि पंचभूत प्रकारसे, सद्योजात आदि पाँच रूपसे अवस्थित, सद्योजात आदि पंचमन्त्ररूप शरीरवाले शिवको नमस्कार है॥ १२८-१२९॥ | | चतुःषष्टिप्रकाराय अकाराय नमो नमः।<br>द्वात्रिंशत्तत्त्वरूपाय उकाराय नमो नमः॥ १३०<br>षोडशात्मस्वरूपाय मकाराय नमो नमः।<br>अष्टधात्मस्वरूपाय अर्धमात्रात्मने नमः॥ १३१ | चौंसठ प्रकारके शिक्षोक्त वर्णरूपवाले अकारको बार-बार नमस्कार है। बत्तीस मातृकारूपवाले उकारको बार-बार नमस्कार है। सोलह तत्त्व रूपवाले मकारको |

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३५६ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग ]


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ओङ्काराय नमस्तुभ्यं चतुर्धा संस्थिताय च।<br>गगनेशाय देवाय स्वर्गेशाय नमो नमः॥ १३२बार-बार नमस्कार है। आठ प्रकारके आत्मस्वरूपवाले अर्धमात्रात्मक नादरूपको नमस्कार है। [अकार, उकार, मकार, अर्धमात्रात्मक नादरूप] चार प्रकारसे स्थित आप ओंकार (प्रणवरूप)-को नमस्कार है। आकाशके स्वामी तथा स्वर्गके स्वामी शिवको बार-बार नमस्कार है॥ १३०-१३२॥
सप्तलोकाय पातालनरकेशाय वै नमः।<br>अष्टक्षेत्राष्टरूपाय परात्परतराय च॥ १३३सात लोकस्वरूप, पाताल तथा नरकके स्वामी, [पृथ्‍वी आदि] आठ क्षेत्रोंके रूपमें आठ स्वरूपोंवाले तथा परात्परतर (सर्वोत्कृष्ट) शिवको नमस्कार है॥ १३३॥
सहस्रशिरसे तुभ्यं सहस्राय च ते नमः।<br>सहस्रपादयुक्ताय शर्वाय परमेष्ठिने॥ १३४<br><br>नवात्मतत्त्वरूपाय नवाष्टात्मात्मशक्तये।<br>पुनरष्टप्रकाशाय तथाष्टाष्टकमूर्तये॥ १३५<br><br>चतुःषष्ट्यात्मतत्त्वाय पुनरष्टविधाय ते।<br>गुणाष्टकवृतायैव गुणिने निर्गुणाय ते॥ १३६हजार सिरोंवाले, हजार रूपोंवाले, हजार पैरोंसे युक्त आप शर्व परमेष्ठीको नमस्कार है। [पुरुष, प्रकृति, व्यक्त, अहंकार, नभ, अनिल, ज्योति, आप (जल), पृथ्‍वी] नौ आत्मतत्त्वमय स्वरूपवाले, सत्रह आत्मशक्तियोंवाले, अष्टप्रकाशस्वरूप (उर आदि स्थानोंमें वर्णोंको अभिव्यंजित करनेवाले), आठ मूर्तियोंवाले, चौंसठ योगिनियोंके प्राणतत्त्वरूप, भव आदि आठ नामोंवाले, आठ गुणोंसे युक्त, [सत्त्व, रज, तम] तीनों गुणोंसे युक्त तथा गुणोंसे शून्य आप [शिव]-को नमस्कार है॥ १३४-१३६॥
मूलस्थाय नमस्तुभ्यं शाश्वतस्थानवासिने।<br>नाभिमण्डलसंस्थाय हृदि निःस्वनकारिणे॥ १३७<br><br>कन्धरे च स्थितायैव तालुरन्ध्रस्थिताय च।<br>भ्रूमध्ये संस्थितायैव नादमध्ये स्थिताय च॥ १३८<br><br>चन्द्रबिम्बस्थितायैव शिवाय शिवरूपिणे।<br>वह्निसोमर्करूपाय षट्त्रिंशच्छक्तिरूपिणे॥ १३९<br><br>त्रिधा संवृत्य लोकान् वै प्रसुप्तभुजगात्मने।<br>त्रिप्रकारं स्थितायैव त्रेताग्निमयरूपिणे॥ १४०<br><br>सदाशिवाय शान्ताय महेशाय पिनाकिने।<br>सर्वज्ञाय शरण्याय सद्योजाताय वै नमः॥ १४१<br><br>अघोराय नमस्तुभ्यं वामदेवाय ते नमः।<br>तत्पुरुषाय नमोऽस्तु ईशानाय नमो नमः॥ १४२मूलाधारचक्रमें विराजमान, शाश्वत स्थानमें निवास करनेवाले, नाभिमण्डलमें स्थित तथा हृदयमें प्राणवायु ध्वनि करनेवाले आप [शिव]-को नमस्कार है। ग्रीवामें स्थित, तालुछिद्रमें स्थित, भौंहोंके मध्यमें स्थित, नादके मध्यमें स्थित, चन्द्रबिम्बमें स्थित, कल्याणकारी, शिवस्वरूप, अग्नि-चन्द्र-सूर्यरूपवाले, छत्तीस शक्तिरूपवाले, तीन प्रकारके [सत्त्व, रज, तम] गुणोंसे लोकोंको वेष्टितकर सोये हुए सर्परूप [कुण्डलिनीरूप]-वाले, [गार्हपत्य, आहवनीय तथा दक्षिणाग्नि] तीन रूपसे स्थित त्रेताग्निमय रूपवाले, सदाशिव, शान्तस्वभाववाले, महेश्वर, पिनाकधारी, सब कुछ जाननेवाले तथा शरण देनेवाले सद्योजातको नमस्कार है। आप अघोरको नमस्कार है। आप वामदेवको नमस्कार है। तत्पुरुषको नमस्कार है। ईशानको बार-बार नमस्कार है॥ १३७-१४२॥
नमस्त्रिंशत्प्रकाशाय शान्तातीताय वै नमः।<br>अनन्तेशाय सूक्ष्माय उत्तमाय नमोऽस्तु ते॥ १४३तीसों मुहूर्तोंमें सदा प्रकाशमान रहनेवालेको नमस्कार है। शान्तातीतको नमस्कार है। आप अनन्तेश, सूक्ष्म तथा

अध्याय ७२] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३५७


| एकाक्षाय नमस्तुभ्यमेकरुद्राय ते नमः।<br>नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं श्रीकण्ठाय शिखण्डिने॥ १४४<br><br>अनन्तासनसंस्थाय अनन्तायान्तकारिणे।<br>विमलाय विशालाय विमलाङ्गाय ते नमः ॥ १४५<br><br>विमलासनसंस्थाय विमलार्थार्थरूपिणे।<br>योगपीठान्तरस्थाय योगिने योगदायिने ॥ १४६<br><br>योगिनां हृदि संस्थाय सदा नीवारशूकवत्।<br>प्रत्याहाराय ते नित्यं प्रत्याहाररताय ते ॥ १४७<br><br>प्रत्याहाररतानां च प्रतिस्थानस्थिताय च।<br>धारणायै नमस्तुभ्यं धारणाभिरताय ते ॥ १४८ | उत्तमको नमस्कार है। आप एकाक्ष (एकमात्र ज्ञानरूपी नेत्रवाले)-को नमस्कार है। आप अद्वितीय रुद्रको नमस्कार है। आप त्रिमूर्ति, श्रीकण्ठ तथा शिखण्डीको नमस्कार है॥ १४३-१४४॥<br><br>अनन्त (शेष)-रूपी आसनपर स्थित, अनन्तरूप, अन्त करनेवाले, विशुद्ध, विशाल तथा स्वच्छ अंगोंवाले आपको नमस्कार है। विमल आसनपर विराजमान, विमल ज्ञानके अर्थस्वरूप, योगपीठके मध्यस्थित योगी, योग प्रदान करनेवाले, नीवार (जंगली धान्य)-के शूक (सूक्ष्म अग्रभाग)-की भाँति योगियोंके हृदयमें सदा स्थित रहनेवाले आपको नमस्कार है। प्रत्याहारस्वरूप, प्रत्याहारमें निरत, प्रत्याहारमें रत लोगोंके हृदयमें विराजमान, धारणास्वरूप तथा धारणामें निरत आपको नमस्कार है॥ १४५-१४८॥ | | धारणाभ्यासयुक्तानां पुरस्तात्संस्थिताय च।<br>ध्यानाय ध्यानरूपाय ध्यानगम्याय ते नमः॥ १४९<br><br>ध्येयाय ध्येयगम्याय ध्येयध्यानाय ते नमः।<br>ध्येयानामपि ध्येयाय नमो ध्येयतमाय ते ॥ १५०<br><br>समाधानाभिगम्याय समाधानाय ते नमः।<br>समाधानरतानां तु निर्विकल्पार्थरूपिणे ॥ १५१ | धारणाके अभ्यासमें लगे हुए लोगोंके सामने [सदा] विराजमान, ध्यान, ध्यानरूप तथा ध्यानगम्य आपको नमस्कार है। ध्येय, ध्येयगम्य, ध्यान करनेयोग्य, ध्यानवाले आपको नमस्कार है। ध्यानयोग्य [ब्रह्मा, विष्णु आदि]-के भी ध्येय तथा सबसे अधिक ध्यानयोग्य आपको नमस्कार है। समाधानके द्वारा प्राप्य, समाधानस्वरूप, समाधान (ध्यान)-में रत लोगोंके लिये निर्विकल्प अर्थस्वरूप आपको नमस्कार है॥ १४९-१५१॥ | | दग्ध्वोद्धृतं सर्वमिदं त्वयाद्य<br>जगत्त्रयं रुद्र पुरत्रयं हि।<br>कः स्तोतुमिच्छेत्कथमीदृशं त्वां<br>स्तोष्ये हि तुष्टाय शिवाय तुभ्यम् ॥ १५२ | हे रुद्र! त्रिपुरको दग्ध करके आपने तीनों लोकोंका उद्धार कर दिया। ऐसे प्रभावशाली आपकी स्तुति करनेका सामर्थ्य कौन रखता है; फिर भी [स्वयं] सन्तुष्ट रहनेवाले आप शिवकी मैं स्तुति करता हूँ॥ १५२ ॥ | | भक्त्या च तुष्ट्याद्भुतदर्शनाच्च<br>मर्त्या अमर्त्या अपि देवदेव।<br>एते गणाः सिद्धगणैः प्रणामं<br>कुर्वन्ति देवेश गणेश तुभ्यम् ॥ १५३ | हे देवदेव! आपकी भक्ति, तुष्टि तथा अद्भुत दर्शनके कारण ये मानव, देवता तथा सिद्धगणोंसहित समस्त गण आपको प्रणाम करते हैं। हे देवेश! हे गणेश! आपको नमस्कार है॥ १५३॥ | | निरीक्षणादेव विभोऽसि दग्धुं<br>पुरत्रयं चैव जगत्त्रयं च।<br>लीलालसेनाम्बिकया क्षणेन<br>दग्धं किलेषुश्च तदाथ मुक्तः ॥ १५४ | हे विभो! आप तो देखनेमात्रसे ही तीनों पुरों तथा तीनों लोकोंको जला देनेमें समर्थ हैं। अम्बिकाके साथ लीलासक्त आपने क्षणभरमें त्रिपुरको जला दिया और [सोम आदिके प्रार्थना करनेपर] उस समय बाणको भी मुक्त कर दिया ॥ १५४॥ |

३५८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| कृतो रथश्चेषुवरश्च शुभ्रं<br>शरासनं ते त्रिपुरक्षयाय।<br>अनेकयत्नैश्च मयाथ तुभ्यं<br>फलं न दृष्टं सुरसिद्धसङ्घैः॥ १५५ | आपके द्वारा त्रिपुरके नाशके लिये मैंने अनेक यत्नोंसे रथ, श्रेष्ठ बाण तथा सुन्दर धनुष आपके लिये निर्मित किया था; किंतु देवताओं तथा सिद्धजनोंद्वारा युद्धरूपी फलको नहीं जाना जा सका अर्थात् परम महिमावाले आपने क्षणभरमें त्रिपुरका नाश कर दिया॥ १५५॥ | | रथो रथी देववरो हरिश्च<br>रुद्रः स्वयं शक्रपितामहौ च।<br>त्वमेव सर्वे भगवन् कथं तु<br>स्तोष्ये ह्यतोष्यं प्रणिपत्य मूर्ध्ना॥ १५६ | रथ, रथी, देवश्रेष्ठ विष्णु, स्वयं रुद्र, इन्द्र, ब्रह्मा—ये सब आप ही हैं। हे भगवन्! मैं आप अतोष्य (स्तुति न किये जा सकनेवाले)-की स्तुति कैसे करूँ; अतः सिर झुकाकर [केवल] प्रणाम करता हूँ॥ १५६॥ | | अनन्तपादस्त्वमनन्तबाहु-<br>रनन्तमूर्द्धान्तकरः शिवश्च।<br>अनन्तमूर्तिः कथमीदृशं त्वां<br>तोष्ये ह्यतोष्यं कथमीदृशं त्वाम्॥ १५७ | आप अनन्त चरणोंवाले, अनन्त भुजाओंवाले, अनन्त सिरवाले, अनन्त रूपोंवाले, संहार करनेवाले तथा कल्याण करनेवाले हैं—ऐसे प्रभाववाले आपकी स्तुति कैसे करूँ; आप अतोष्यकी स्तुति कैसे करूँ?॥ १५७॥ | | नमो नमः सर्वविदे शिवाय<br>रुद्राय शर्वाय भवाय तुभ्यम्।<br>स्थूलाय सूक्ष्माय सुसूक्ष्मसूक्ष्म-<br>सूक्ष्माय सूक्ष्मार्थविदे विधात्रे॥ १५८ | आप सर्ववेत्ता, शिव, रुद्र, शर्व, भव, स्थूल, सूक्ष्म, अत्यन्त सूक्ष्मसे भी सूक्ष्म, सूक्ष्म अर्थोंको जाननेवाले तथा विधाताको नमस्कार है॥ १५८॥ | | स्रष्ट्रे नमः सर्वसुरासुराणां<br>भर्त्रे च हर्त्रे जगतां विधात्रे।<br>नेत्रे सुराणामसुरेश्वराणां<br>दात्रे प्रशास्त्रे मम सर्वशास्त्रे॥ १५९ | सभी देवताओं तथा असुरोंके स्रष्टा, लोकोंका सृजन-पालन-संहार करनेवाले, देवताओं तथा असुरोंके नायक, सब कुछ देनेवाले और मुझपर तथा सभीपर शासन करनेवालेको नमस्कार है॥ १५९॥ | | वेदान्तवेद्याय सुनिर्मलाय<br>वेदार्थविद्भिः सततं स्तुताय।<br>वेदात्मरूपाय भवाय तुभ्य-<br>मन्ताय मध्याय सुमध्यमाय॥ १६० | वेदान्तके द्वारा जाननेयोग्य, परम शुद्ध, वेदार्थके ज्ञाताओंद्वारा निरन्तर स्तुत, वेदके आत्मास्वरूप, भव, अन्त, मध्य तथा सुमध्यम आपको नमस्कार है॥ १६०॥ | | आद्यन्तशून्याय च संस्थिताय<br>तथा त्वशून्याय च लिङ्गिने च।<br>अलिङ्गिने लिङ्गमयाय तुभ्यं<br>लिङ्गाय वेदादिमयाय साक्षात्॥ १६१ | आदि तथा अन्तसे रहित, सर्वत्र विद्यमान, शून्यत्वसे रहित, लिङ्गी, अलिङ्गी, लिङ्गमय, लिङ्गस्वरूप तथा साक्षात् वेदादिमय (प्रणवरूप) आपको नमस्कार है॥ १६१॥ | | रुद्राय मूर्द्धानिकृन्तनाय<br>ममादिदेवस्य च यज्ञमूर्तेः।<br>विध्वान्तभङ्गं मम कर्तुमीश<br>दृष्ट्वैव भूमौ करजाग्रकोट्या॥ १६२ | मेरे भी आदिदेव यज्ञमूर्ति विष्णुके तथा मुझ ब्रह्माके अज्ञानान्धकारका नाश करनेके लिये अपराधस्थानमें देखकर [अपने] नाखूनके अग्रभागसे मेरे मस्तकका छेदन करनेवाले हे ईश! आप रुद्रको नमस्कार है॥ १६२॥ | | अहो विचित्रं तव देवदेव<br>विचेष्टितं सर्वसुरासुरेश।<br>देहीव देवैः सह देवकार्यं<br>करिष्यसे निर्गुणरूपतत्त्व॥ १६३ | हे देवदेव! हे समस्त देवताओं तथा असुरोंके ईश! आपका क्रिया-कलाप विचित्र है। हे निर्गुणरूपतत्त्व! आप देवताओंके साथ देहधारीकी भाँति देवोंका कार्य करेंगे॥ १६३॥ |

अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति३५९
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
एकं स्थूलं सूक्ष्ममेकं सुसूक्ष्मं<br>मूर्तामूर्तं मूर्तमेकं ह्यमूर्तम्।<br>एकं दृष्टं वाङ्मयं चैकमीशं<br>ध्येयं चैकं तत्त्वमत्राद्भुतं ते ॥ १६४इस ब्रह्माण्डमें आपका एक स्थूल रूप (पृथ्वीरूप), एक सूक्ष्म रूप (जलरूप), एक सुसूक्ष्म रूप (अग्निरूप), मूर्तामूर्त रूप (क्षय-वृद्धिके आश्रयके कारण चन्द्ररूप), एक मूर्तरूप (सूर्यरूप), एक अमूर्तरूप (वायुरूप), एक दृष्ट वाङ्मयरूप (शब्दगुणसे ज्ञात गगनरूप) और एक ध्येय अद्भुत ईशरूप है॥ १६४॥
स्वप्ने दृष्टं यत्पदार्थं ह्यलक्ष्यं<br>दृष्टं नूनं भाति मन्ये न चापि।<br>मूर्त्तिर्नो वै देवमीशानदेवै-<br>र्लक्ष्या यत्नैर्प्यप्यलक्ष्यं कथं तु ॥ १६५स्वप्नमें जो पदार्थ दिखायी देता है, वह प्रत्यक्षकी भाँति प्रतीत होता है; उसे मैं अलक्ष्य नहीं मानता हूँ। वैसे ही हे ईशान! देवताओंके द्वारा प्रयत्नपूर्वक देखा गया आपका विग्रह हमारे लिये निर्गुण तथा अलक्ष्य कैसे हो सकता है?॥ १६५॥
दिव्यः क्व देवेश भवत्प्रभावो<br>वयं क्व भक्तिः क्व च ते स्तुतिश्च।<br>तथापि भक्त्या विलपन्तमीश<br>पितामहं मां भगवन् क्षमस्व ॥ १६६हे देवेश! कहाँ आपका दिव्य प्रभाव और कहाँ हमलोग, कहाँ हमारी भक्ति और कहाँ आपकी [यह] स्तुति; फिर भी हे देवेश! हे भगवन्! भक्तिपूर्वक विलाप करते हुए मुझ ब्रह्माको क्षमा कीजिये॥ १६६॥
सूत उवाच<br>य इमं शृणुयाद् द्विजोत्तमा<br>भुवि देवं प्रणिपत्य वा पठेत्।<br>स च मुञ्चति पापबन्धनं<br>भवभक्त्या पुरशासितुः स्तवम्॥ १६७सूतजी बोले— हे द्विजश्रेष्ठो! पृथ्वीपर जो भी शिवको प्रणाम करके त्रिपुरके शास्ता भगवान् शिवकी इस स्तुतिको सुनता अथवा पढ़ता है, वह भवभक्तिके द्वारा पापबन्धनसे मुक्त हो जाता है॥ १६७॥
श्रुत्वा च भक्त्या चतुराननेन<br>स्तुतो हसञ्छैलसुतां निरीक्ष्य।<br>स्तवं तदा प्राह महानुभावं<br>महाभुजो मन्दरशृङ्गवासी॥ १६८तब ब्रह्माके द्वारा भक्तिपूर्वक स्तुत हुए मन्दरशिखरवासी तथा महान् भुजाओंवाले शिवजी उस स्तुतिको सुनकर पार्वतीकी ओर देखकर महानुभाव ब्रह्मासे हँसते हुए कहने लगे— ॥ १६८ ॥
शिव उवाच<br>स्तवेनानेन तुष्टोऽस्मि तव भक्त्या च पद्मज।<br>वरान् वरय भद्रं ते देवानां च यथेप्सितान्॥ १६९शिवजी बोले— हे पद्मयोने! भक्तिपूर्वक की गयी आपकी इस स्तुतिसे मैं प्रसन्न हूँ। आप यथेष्ट वर माँगिये; आपका तथा देवताओंका कल्याण हो॥ १६९॥
सूत उवाच<br>ततः प्रणम्य देवेशं भगवान् पद्मसम्भवः।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्राहेदं प्रीतमानसः॥ १७०सूतजी बोले— तत्पश्चात् पद्मयोनि ब्रह्माजी देवेशको प्रणाम करके हाथ जोड़कर प्रसन्नचित्त होकर यह [वचन] कहने लगे— ॥ १७०॥
श्रीपितामह उवाच<br>भगवन् देवदेवेश त्रिपुरान्तक शङ्कर।<br>त्वयि भक्तिं परां मेऽद्य प्रसीद परमेश्वर॥ १७१<br>देवानां चैव सर्वेषां त्वयि सर्वार्थदेश्वर।<br>प्रसीद भक्तियोगेन सारथ्येन च सर्वदा ॥ १७२श्रीपितामह बोले— 'हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे त्रिपुरविनाशक! हे शंकर! आपमें अपनी परम भक्ति चाहता हूँ। हे परमेश्वर! अब प्रसन्न हो जाइये। सभी कामनाओंको पूर्ण करनेवाले हे ईश्वर! आपमें सभी देवताओंकी भक्ति हो; मेरे भक्तियोगसे तथा सारथीरूपसे आप सदा प्रसन्न रहें' ॥ १७१-१७२॥
३६०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| जनार्दनोऽपि भगवान्नमस्कृत्य महेश्वरम्।<br>कृताञ्जलिपुटो भूत्वा प्राह साम्बं त्रियम्बकम्॥ १७३<br>वाहनत्वं तवेशान नित्यमीहे प्रसीद मे।<br>त्वयि भक्तिं च देवेश देवदेव नमोऽस्तु ते॥ १७४<br>सामर्थ्यं च सदा मह्यं भवन्तं वोढुमीश्वरम्।<br>सर्वज्ञत्वं च वरद सर्वगत्वं च शङ्कर॥ १७५ | भगवान् विष्णुने भी पार्वतीसहित त्रिनेत्र शिवको प्रणाम करके हाथ जोड़कर उनसे कहा—'हे ईशान! मैं [वृषभ आदि रूपसे] सदा आपका वाहन होनेकी अभिलाषा करता हूँ और हे देवेश! आपमें [अपनी] भक्ति चाहता हूँ। हे देवदेव! आपको नमस्कार है। हे वरद! हे शंकर! आप ईश्वरको सदा वहन करनेका सामर्थ्य, सर्वज्ञत्व तथा सर्वत्र गमन करनेकी शक्ति मुझे प्रदान कीजिये॥ १७३-१७५॥ | | सूत उवाच<br>तयोः श्रुत्वा महादेवो विज्ञप्तिं परमेश्वरः।<br>सारथ्ये वाहनत्वे च कल्पयामास वै भवः॥ १७६ | सूतजी बोले— उन दोनोंकी प्रार्थना सुनकर महादेव परमेश्वर शिवने उन्हें सारथि तथा वाहन होनेका वर प्रदान किया॥ १७६॥ | | दत्त्वा तस्मै ब्रह्मणे विष्णवे च<br>दग्ध्वा दैत्यान् देवदेवो महात्मा।<br>सार्धं देव्या नन्दिना भूतसङ्घै-<br>रन्तर्धानं कारयामास शर्वः॥ १७७ | इस प्रकार दैत्योंको दग्ध करके और उन ब्रह्मा तथा विष्णुको वर प्रदान करके देवदेव महात्मा शिव देवी [पार्वती], नन्दी तथा भूतगणोंसहित अन्तर्धान हो गये॥ १७७॥ | | ततस्तदा महेश्वरे गते रणाद् गणैः सह।<br>सुरेश्वराः सुविस्मिता भवं प्रणम्य पार्वतीम्॥ १७८<br>ययुश्च दुःखवर्जिताः स्ववाहनैर्दिवं ततः।<br>सुरेश्वरा मुनीश्वरा गणेशवराश्च भास्कराः॥ १७९ | इसके बाद युद्धभूमिसे गणोंसहित शिवके चले जानेपर श्रेष्ठ देवतालोग अतिविस्मित हुए। हे मुनीश्वरो! शिव तथा पार्वतीको प्रणाम करके दुःखरहित होकर सुरेश्वर, गणेश्वर तथा आदित्यगण अपने-अपने वाहनोंसे स्वर्ग चले गये॥ १७८-१७९॥ | | त्रिपुरारेरिमं पुण्यं निर्मितं ब्रह्मणा पुरा।<br>यः पठेच्छ्राद्धकाले वा दैवे कर्मणि च द्विजाः॥ १८०<br>श्रावयेद्वा द्विजान् भक्त्या ब्रह्मलोकं स गच्छति।<br>मानसैर्वाचिकैः पापैस्तथा वै कायिकैः पुनः॥ १८१<br>स्थूलैः सूक्ष्मैः सुसूक्ष्मैश्च महापातकसम्भवैः।<br>पातकैश्च द्विजश्रेष्ठा उपपातकसम्भवैः॥ १८२<br>पापैश्च मुच्यते जन्तुः श्रुत्वाध्यायमिमं शुभम्।<br>शत्रवो नाशमायान्ति सङ्ग्रामे विजयी भवेत्॥ १८३<br>सर्वरोगैर्न बाध्येत आपदो न स्पृशन्ति तम्।<br>धनमायुर्यशो विद्यां प्रभावमतुलं लभेत्॥ १८४ | हे द्विजो! जो [व्यक्ति] पूर्वकालमें ब्रह्माके द्वारा निर्मित किये गये त्रिपुरशत्रु [शिव]-के इस पवित्र स्तोत्रको श्राद्धके समय अथवा देवकार्यमें भक्तिपूर्वक पढ़ता है अथवा द्विजोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है। हे द्विजश्रेष्ठो! इस शुभ अध्यायको सुनकर प्राणी मानसिक, वाचिक तथा शारीरिक पापोंसे; स्थूल, सूक्ष्म तथा अतिसूक्ष्म पापोंसे; घोर अपराधसे होनेवाले पापोंसे तथा अल्प अपराधसे होनेवाले पापोंसे मुक्त हो जाता है; उसके शत्रु नष्ट हो जाते हैं, वह संग्राममें विजयी होता है, सभी रोग उसे बाधा नहीं पहुँचाते, आपदाएँ उसे स्पर्शतक नहीं करतीं और वह धन-आयु-यश-विद्या तथा अतुलनीय प्रभाव प्राप्त करता है॥ १८०-१८४॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे त्रिपुरदाहे ब्रह्मस्तवो नाम द्विसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७२॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें त्रिपुरदाहप्रसंगमें 'ब्रह्मस्तव' नामक बहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७२॥

७३- लिङ्गार्चनकी विधि तथा उसकी महिमा

अध्याय ७३ ] लिङ्गार्चनकी विधि तथा उसकी महिमा [ ३६१


तिहत्तरवाँ अध्याय

लिङ्गार्चनकी विधि तथा उसकी महिमा

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
सूत उवाच<br>गते महेश्वरे देवे दग्ध्वा च त्रिपुरं क्षणात्।<br>सदस्याह सुरेन्द्राणां भगवान् पद्मसम्भवः॥ १सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] क्षणभरमें त्रिपुरको जलाकर देव महेश्वरके चले जानेपर भगवान् पद्मयोनि (ब्रह्मा)-ने श्रेष्ठ देवताओंकी सभामें [इस प्रकार] कहा—॥ १॥
पितामह उवाच<br>सन्त्यज्य देवदेवेशं लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्।<br>तारपौत्रो महातेजास्तारकस्य सुतो बली॥ २<br>तारकाक्षोऽपि दितिजः कमलाक्षश्च वीर्यवान्।<br>विद्युन्माली च दैत्येशः अन्ये चापि सबान्धवाः॥ ३<br>त्यक्त्वा देवं महादेवं मायया च हरेः प्रभोः।<br>सर्वे विनष्टाः प्रध्वस्ताः स्वपुरैः पुरसम्भवैः॥ ४**पितामह बोले—**लिङ्गमूर्ति देवदेवेश महेश्वरकी उपेक्षा करके दितिसे उत्पन्न महातेजस्वी तारकपौत्र और तारकका बलवान् पुत्र तारकाक्ष, पराक्रमी कमलाक्ष, दैत्यराज विद्युन्माली तथा अन्य राक्षस भी [अपने] बन्धुओंसहित मारे गये। [इस प्रकार] प्रभु श्रीहरिकी मायासे भगवान् महादेवका त्याग करके वे सब अपने पुरों तथा नागरिकोंसहित विनष्ट तथा ध्वस्त हो गये॥ २–४॥
तस्मात्सदा पूजनीयो लिङ्गमूर्तिः सदाशिवः।<br>यावत्पूजा सुरेशानां तावदेव स्थितिर्र्यतः॥ ५<br>पूजनीयः शिवो नित्यं श्रद्धया देवपुङ्गवैः।<br>सर्वलिङ्गमयो लोकः सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम्॥ ६<br>तस्मात् सम्पूजयेल्लिङ्गं य इच्छेत्सिद्धिमात्मनः।<br>सर्वे लिङ्गार्चनादेव देवा दैत्याश्च दानवाः॥ ७अतः लिङ्गमूर्ति सदाशिवकी सर्वदा पूजा करनी चाहिये। जबतक उनकी पूजा होगी, तभीतक देवताओंकी स्थिति बनी रहेगी, अतः श्रेष्ठ देवताओंको नित्य श्रद्धापूर्वक शिवका पूजन करना चाहिये। समस्त जगत् लिङ्गमय है, सब कुछ लिङ्गमें प्रतिष्ठित है, अतः जो आत्मसिद्धि चाहता है, उसे [शिव] लिङ्गकी विधिवत् पूजा करनी चाहिये॥ ५-६ १/२॥
यक्षा विद्याधराः सिद्धा राक्षसाः पिशिताशनाः।<br>पितरो मुनयश्चापि पिशाचाः किन्नरादयः॥ ८<br>अर्चयित्वा लिङ्गमूर्तिं संसिद्धा नात्र संशयः।<br>तस्माल्लिङ्गं यजेन्नित्यं येन केनापि वा सुराः॥ ९सभी देवता, दैत्य तथा दानव लिङ्गार्चनसे ही प्रतिष्ठित हैं। यक्ष, विद्याधर, सिद्धगण, मांसभक्षी राक्षस, पितर, मुनि, पिशाच, किन्नर आदि लिङ्गमूर्तिका अर्चन करके सिद्धिको प्राप्त हुए हैं; इसमें सन्देह नहीं है॥ ७-८ १/२॥
पशवश्च वयं तस्य देवदेवस्य धीमतः।<br>पशुत्वं च परित्यज्य कृत्वा पाशुपतं ततः॥ १०<br>पूजनीयो महादेवो लिङ्गमूर्तिः सनातनः।<br>विशोध्य चैव भूतानि पञ्चभिः प्रणवैः समम्॥ ११<br>प्राणायामैः समायुक्तैः पञ्चभिः सुरपुङ्गवाः।<br>चतुर्भिः प्रणवैश्चैव प्राणायामपरायणैः॥ १२<br>त्रिभिश्च प्रणवैर्देवाः प्राणायामैस्तथाविधैः।<br>द्विधा न्यस्य तथोङ्कारं प्राणायामपरायणः॥ १३अतः हे देवताओ! जिस किसी भी प्रकारसे नित्य लिङ्गकी पूजा करनी चाहिये। हम लोग उन बुद्धिमान् देवाधिदेवके पशु हैं। अतः पाशुपत व्रत करके पशुत्वका त्याग करके लिङ्गमूर्ति सनातन महादेवकी पूजा करनी चाहिये। हे श्रेष्ठ देवताओ! पाँच प्रणवयुक्त पाँच प्राणायामोंके द्वारा पंचभूतोंका शोधन करके; हे देवताओ! चार प्रणवोंके साथ चार प्राणायामोंद्वारा, पुनः उसी प्रकारके तीन प्रणवोंके साथ [तीन] प्राणायामोंद्वारा,
३६२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| ततश्चोङ्कारमुच्चार्य प्राणापानौ नियम्य च।<br>ज्ञानामृतेन सर्वाङ्गान्यापूर्य प्रणवेन च॥ १४<br><br>गुणत्रयं चतुर्थाख्यमहङ्कारं च सुव्रताः।<br>तन्मात्राणि च भूतानि तथा बुद्धीन्द्रियाणि च॥ १५<br><br>कर्मेन्द्रियाणि संशोध्य पुरुषं युगलं तथा।<br>चिदात्मानं तनुं कृत्वा चाग्निर्भस्मेति संस्पृशेत्॥ १६<br><br>वायुर्भस्मेति च व्योम तथाम्भः पृथिवी तथा।<br>त्र्यायुषं त्रिसन्ध्यं च धूलयेद्भसितेन यः॥ १७<br><br>स योगी सर्वतत्त्वज्ञो व्रतं पाशुपतं त्विदम्।<br>भवेन पाशमोक्षार्थं कथितं देवसत्तमाः॥ १८ | पुनः दो प्रणवोंसहित [दो] प्राणायामोंके द्वारा शोधन करके; प्राणायामपरायण होकर ओंकारका न्यास करके; तदनन्तर ओंकारका उच्चारण करके प्राण तथा अपान [वायु]-को नियन्त्रितकर ज्ञानामृतरूपी प्रणवसे सभी अंगोंको आप्लावित मानकर; हे सुव्रतो! तीनों गुणों, चौथा अहंकार, [पाँच] तन्मात्राओं, [पाँच] भूतों, [पाँच] ज्ञानेन्द्रियों, [पाँच] कर्मेन्द्रियोंका शोधन करके; पुनः युगलपुरुषका शोधन करके [अपने] शरीरको चिदात्मस्वरूप मानकर अग्नि भस्म है, वायु भस्म है, व्योम [आकाश] भस्म है, जल भस्म है, पृथ्वी भस्म है—ऐसा कहकर भस्मका स्पर्श करना चाहिये। जो तीनों सन्ध्याओंमें भस्मस्नान करता है, वह योगी तथा सभी तत्त्वोंका ज्ञाता हो जाता है। हे श्रेष्ठ देवताओ! [स्वयं] भगवान् शिवने पाश (बन्धन)-से मुक्तिके लिये इस पाशुपतव्रतको कहा है॥ ९—१८॥ | | एवं पाशुपतं कृत्वा सम्पूज्य परमेश्वरम्।<br>लिङ्गे पुरा मया दृष्टे विष्णुना च महात्मना॥ १९<br><br>पशवो नैव जायन्ते वर्षमात्रेण देवताः।<br>अस्माभिः सर्वकार्याणां देवमभ्यर्च्य यत्नतः॥ २०<br><br>बाह्ये चाभ्यन्तरे चैव मन्ये कर्तव्यमीश्वरम्।<br>प्रतिज्ञा मम विष्णोश्च दिव्यैषा सुरसत्तमाः॥ २१<br><br>मुनीनां च न सन्देहस्तस्मात्सम्पूजयेच्छिवम्। | हे देवताओ! इस प्रकार पाशुपतव्रत करके पूर्वकालमें मेरे तथा महात्मा विष्णुके द्वारा देखे गये लिङ्गमें परमेश्वरकी विधिपूर्वक पूजा करके लोग एक वर्षमें पशुत्वसे मुक्त हो जाते हैं। हम लोगोंको सभी कर्मोंके देव महेश्वरकी पूजा यत्नपूर्वक बाह्य तथा आभ्यन्तर विधिसे करनी चाहिए—ऐसा मैं मानता हूँ। हे श्रेष्ठ देवताओ! मेरी, विष्णुकी तथा मुनियोंकी यह दिव्य प्रतिज्ञा है; इसमें सन्देह नहीं है। अतः शिवका पूजन [अवश्य] करना चाहिये॥ १९—२१ १/२॥ | | सा हानिस्तन्महच्छिद्रं स मोहः सा च मूकता॥ २२<br><br>यत्क्षणं वा मुहूर्तं वा शिवमेकं न चिन्तयेत्।<br>भवभक्तिपरा ये च भवप्रणतचेतसः॥ २३ | यदि कोई एक क्षण या एक मुहूर्त भी शिवका चिन्तन नहीं करता, तो वही [उसकी] हानि है, वही दोष है, वही उसका अज्ञान है और वही उसकी मूकता है। | | भवसंस्मरणोद्युक्ता न ते दुःखस्य भाजनम्।<br>भवनानि मनोज्ञानि दिव्यमाभरणं स्त्रियः॥ २४ | जो लोग शिवभक्तिमें संलग्न हैं, अन्तःकरणसे शिवको प्रणाम करनेवाले हैं तथा भगवान् शिवके स्मरणमें लगे हुए हैं, वे दुःखके पात्र नहीं होते हैं। | | धनं वा तुष्टिपर्यन्तं शिवपूजाविधेः फलम्।<br>ये वाञ्छन्ति महाभोगान् राज्यं च त्रिदशालये।<br>तेऽर्चयन्तु सदा कालं लिङ्गमूर्तिं महेश्वरम्॥ २५ | सुन्दर भवन, दिव्य आभूषण, स्त्रियाँ तथा तुष्टिपर्यन्त धन—यह सब शिवपूजाविधिका फल है। जो लोग महाभोगों तथा स्वर्गका राज्य चाहते हैं, वे सभी समयोंमें लिङ्गमूर्ति महेश्वरका अर्चन करें। | | हत्वा भित्त्वा च भूतानि दग्ध्वा सर्वमिदं जगत्॥ २६ | सभी प्राणियोंका वध तथा छेदन करके और इस सम्पूर्ण |

७४- ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण करके देवताओंको प्रदान करना एवं देवताओंद्वारा उन-उन लिङ्गोंका पूजन, लिङ्गोंके विविध भेद तथा उनकी स्थापनाका माहात्म्य

अध्याय ७४ ] ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण...स्थापनाका माहात्म्य ३६३

संस्कृतहिन्दी
यजेदेकं विरूपाक्षं न पापैः स प्रलिप्यते।<br>शैलं लिङ्गं मदीयं हि सर्वदेवनमस्कृतम्॥ २७जगत्को जलाकर भी जो एकमात्र विरूपाक्ष [शिव]-की पूजा करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता है, मेरे द्वारा पूजित यह शिलामय लिङ्ग सभी देवताओंके द्वारा नमस्कृत है॥ २२-२७॥
इत्युक्त्वा पूर्वमभ्यर्च्य रुद्रं त्रिभुवनेश्वरम्।<br>तुष्टाव वाग्भिरिष्टाभिर्देवदेवं त्र्यम्बकम्॥ २८<br><br>तदाप्रभृति शक्राद्याः पूजयामासुरीश्वरम्।<br>साक्षात्पाशुपतं कृत्वा भस्मोद्धूलितविग्रहाः॥ २९ऐसा कहकर पहले ब्रह्माजीने तीनों लोकोंके स्वामी, देवोंके भी देव तथा तीन नेत्रोंवाले रुद्रकी पूजा करके प्रिय वचनोंसे [उनकी] स्तुति की। उसी समयसे इन्द्रादि [देवता] शरीरमें भस्म पोतकर पाशुपतव्रत करके साक्षात् महेश्वरकी पूजा करने लगे॥ २८-२९॥

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे ब्रह्मप्रोक्तलिङ्गार्चनविधिर्नाम त्रिसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'ब्रह्मप्रोक्तलिङ्गार्चनविधि' नामक तिहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७३॥


चौहत्तरवाँ अध्याय

ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण करके देवताओंको प्रदान करना एवं देवताओंद्वारा उन-उन लिङ्गोंका पूजन, लिङ्गोंके विविध भेद तथा उनकी स्थापनाका माहात्म्य

संस्कृतहिन्दी
सूत उवाच<br>लिङ्गानि कल्पयित्वैवं स्वाधिकारानुरूपतः।<br>विश्वकर्मा ददौ तेषां नियोगाद् ब्रह्मणः प्रभोः॥ १सूतजी बोले—विश्वकर्माने प्रभु ब्रह्माकी आज्ञासे अपने अधिकारके अनुरूप लिङ्गोंका निर्माण करके उन [देवताओं]-को दिया॥ १॥
इन्द्रनीलमयं लिङ्गं विष्णुना पूजितं सदा।<br>पद्मरागमयं शक्रो हैमं विश्रवसः सुतः॥ २<br><br>विश्वेदेवास्तथा रौप्यं वसवः कान्तिकं शुभम्।<br>आरकूटमयं वायुराश्विनौ पार्थिवं सदा॥ ३विष्णुने इन्द्रनील (नीलकान्तमणि)-से निर्मित लिङ्गकी सदा पूजा की। इन्द्रने पद्मरागनिर्मित लिङ्गकी, विश्रवाके पुत्र कुबेरने सुवर्णनिर्मित लिङ्गकी, विश्वेदेवोंने चाँदीसे बने हुए लिङ्गकी, वसुओंने चन्द्रकान्तमणिसे बने हुए सुन्दर लिङ्गकी, वायुने आरकूट (पीतल)-से बने हुए लिङ्गकी तथा [दोनों] अश्विनीकुमारोंने मिट्टीसे बने हुए लिङ्गकी सदा पूजा की॥ २-३॥
स्फाटिकं वरुणो राजा आदित्यास्ताम्रनिर्मितम्।<br>मौक्तिकं सोमराड् धीमांस्तथा लिङ्गमनुत्तमम्॥ ४<br><br>अनन्ताद्या महानागाः प्रवालकमयं शुभम्।<br>दैत्या ह्यायोमयं लिङ्गं राक्षसाश्च महात्मनः॥ ५राजा वरुणने स्फटिकसे बने हुए लिङ्गकी, आदित्योंने ताँबेसे बने हुए लिङ्गकी, बुद्धिमान् सोमराटने मोतीसे बने हुए अत्युत्तम लिङ्गकी, अनन्त आदि महानागोंने प्रवालनिर्मित शुभ लिङ्गकी और महात्मा दैत्यों तथा राक्षसोंनें लोहेसे बने हुए लिङ्गकी पूजा की॥ ४-५॥
त्रैलोहिकं गुह्यकाश्च सर्वलोहमयं गणाः।<br>चामुण्डा सैकतं साक्षान्मातरश्च द्विजोत्तमाः॥ ६<br><br>दारुजं नैर्ऋतिर्भक्त्या यमो मारकतं शुभम्।<br>नीलाद्याश्च तथा रुद्राः शुद्धं भस्ममयं शुभम्॥ ७हे द्विजोत्तमो! गुह्यकोंने तीन प्रकारके लोहेसे निर्मित लिङ्गकी, गणोंने सर्वलोहमय लिङ्गकी और चामुण्डा तथा [सभी] माताओंने बालूसे बने हुए लिङ्गकी पूजा की। नैर्ऋतिने लकड़ीसे बने लिङ्गकी, यमने मरकतसे बने शुभ
३६४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
लिङ्गकी, नील आदि रुद्रोंने भस्वनिर्मित शुद्ध तथा शुभ लिङ्गकी भक्तिपूर्वक पूजा की॥ ६-७॥
लक्ष्मीवृक्षमयं लक्ष्मीर्गुहो वै गोमयात्मकम्।<br>मुनयो मुनिशार्दूलाः कुशाग्रमयमुत्तमम्॥ ८<br><br>वामाद्याः पुष्पलिङ्गं तु गन्धलिङ्गं मनोन्मनी।<br>सरस्वती च रत्नेन कृतं रुद्रस्य वाम्भसा॥ ९<br><br>दुर्गा हैमं महादेवं सवेदिकमनुत्तमम्।<br>उग्रा पिष्टमयं सर्वे मन्त्रा ह्याज्यमयं शुभम्॥ १०<br><br>वेदाः सर्वे दधिमयं पिशाचाः सीसनिर्मितम्।<br>लेभिरे च यथायोग्यं प्रसादाद् ब्रह्मणः पदम्॥ ११<br><br>बहुनात्र किमुक्तेन चराचरमिदं जगत्।<br>शिवलिङ्गं समभ्यर्च्य स्थितमत्र न संशयः॥ १२हे श्रेष्ठ मुनियो! लक्ष्मीने लक्ष्मीवृक्ष (बेल)-से निर्मित लिङ्गकी, गुहने गोमयसे निर्मित लिङ्गकी, मुनियोंने कुशके अग्रभागसे निर्मित उत्तम लिङ्गकी, वामदेव आदिने पुष्पके लिङ्गकी, मनोन्मनीने गन्धोंसे निर्मित लिङ्गकी और सरस्वतीने रत्न अथवा रुद्रके जलसे निर्मित लिङ्गकी पूजा की। दुर्गाने वेदीसहित सुवर्णनिर्मित अत्युत्तम शिवलिङ्गकी, उग्रोंने आटेसे बने हुए लिङ्गकी, सभी मन्त्रोंने घृतनिर्मित शुभ लिङ्गकी, सभी वेदोंने दधिनिर्मित लिङ्गकी एवं पिशाचोंने सीसनिर्मित लिङ्गकी पूजा की। इन सभीने [पूजा करके] ब्रह्माजीकी कृपासे यथायोग्य पद प्राप्त किया, इस विषयमें अधिक कहनेसे क्या लाभ? शिवलिङ्गकी पूजा करनेसे ही यह चराचर जगत् स्थित है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ८-१२॥
षड्विधं लिङ्गमित्याहुर्द्रव्याणां च प्रभेदतः।<br>तेषां भेदाश्चतुर्युक्तचत्वारिंशदिति स्मृताः॥ १३<br><br>शैलजं प्रथमं प्रोक्तं तद्वि साक्षाच्चतुर्विधम्।<br>द्वितीयं रत्नजं तच्च सप्तधा मुनिसत्तमाः॥ १४<br><br>तृतीयं धातुजं लिङ्गमष्टधा परमेष्ठिनः।<br>तुरीयं दारुजं लिङ्गं तत्तु षोडशधोच्यते॥ १५<br><br>मृन्मयं पञ्चमं लिङ्गं द्विधा भिन्नं द्विजोत्तमाः।<br>षष्ठं तु क्षणिकं लिङ्गं सप्तधा परिकीर्तितम्॥ १६द्रव्योंके भेदसे छः प्रकारका लिङ्ग कहा गया है। उनके कुल चौवालीस भेद कहे गये हैं। प्रथम प्रकारका लिङ्ग पाषाणनिर्मित कहा गया है; वह चार प्रकारका होता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! द्वितीय प्रकारका लिङ्ग रत्ननिर्मित होता है; वह सात प्रकारका होता है। शिवजीका तीसरे प्रकारका लिङ्ग धातुनिर्मित होता है; वह आठ प्रकारका होता है। चौथे प्रकारका लिङ्ग लकड़ीसे बना होता है; वह सोलह प्रकारका कहा जाता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! पाँचवें प्रकारका लिङ्ग मिट्टीसे बना होता है; वह दो विभागोंवाला होता है। छठे प्रकारका लिङ्ग क्षणिक (रंगवल्लीनिर्मित) होता है; वह सात प्रकारका कहा गया है॥ १३-१६॥
श्रीप्रदं रत्नजं लिङ्गं शैलजं सर्वसिद्धिदम्।<br>धातुजं धनदं साक्षाद्दारुजं भोगसिद्धिदम्॥ १७<br><br>मृन्मयं चैव विप्रेन्द्राः सर्वसिद्धिकरं शुभम्।<br>शैलजं चोत्तमं प्रोक्तं मध्यमं चैव धातुजम्॥ १८रत्ननिर्मित लिङ्ग श्री (लक्ष्मी) प्रदान करनेवाला, पाषाणनिर्मित लिङ्ग समस्त सिद्धियोंको देनेवाला, धातुनिर्मित लिङ्ग साक्षात् धन प्रदान करनेवाला तथा काष्ठनिर्मित लिङ्ग भोग-सिद्धि प्रदान करनेवाला है। हे श्रेष्ठ विप्रो! मिट्टीसे बना हुआ (पार्थिव) शुभ लिङ्ग सभी सिद्धियोंकी प्राप्ति करानेवाला है। पाषाणनिर्मित लिङ्ग उत्तम तथा धातुनिर्मित लिङ्ग मध्यम कहा गया है॥ १७-१८॥

अध्याय ७४] ब्रह्माकी आज्ञासे विश्वकर्माद्वारा विभिन्न लिङ्गोंका निर्माण...स्थापनाका माहात्म्य ३६५


| बहुधा लिङ्गभेदाश्च नव चैव समासतः।<br>मूले ब्रह्मा तथा मध्ये विष्णुस्त्रिभुवनेश्वरः॥ १९<br><br>रुद्रोपरि महादेवः प्रणवाख्यः सदाशिवः।<br>लिङ्गवेदी महादेवी त्रिगुणा त्रित्रयाम्बिका॥ २०<br><br>तया च पूजयेद्यस्तु देवी देवश्च पूजितौ।<br>शैलजं रत्नजं वापि धातुजं वापि दारुजम्॥ २१<br><br>मृन्मयं क्षणिकं वापि भक्त्या स्थाप्य फलं शुभम्।<br>सुरेन्द्राम्भोजगर्भार्ग्नियमम्बुपधनेश्वरैः ॥ २२<br><br>सिद्धविद्याधराहीन्द्रैर्यक्षदानवकिन्नरैः ।<br>स्तूयमानः सुपुण्यात्मा देवदुन्दुभिनिःस्वनैः॥ २३<br><br>भूर्भुवःस्वर्महर्लोकान् क्रमाद्वै जनतः परम्।<br>तपः सत्यं पराक्रम्य भासयन् स्वेन तेजसा॥ २४<br><br>लिङ्गस्थापनसन्मार्गनिहितस्वायतासिना ।<br>आशु ब्रह्माण्डमुद्भिद्य निर्गच्छेन्निर्विशङ्कया॥ २५ | लिङ्गोंके बहुत भेद हैं; संक्षेपमें वे नौ हैं। [लिङ्गके] मूलमें ब्रह्मा, मध्यमें तीनों लोकोंके ईश्वर विष्णु तथा ऊपरी भागमें प्रणवसंज्ञक महादेव रुद्र सदाशिव विराजमान रहते हैं। लिङ्गकी वेदी महादेवी अम्बिका हैं; वे [सत्, रज, तम] तीनों गुणोंसे तथा त्रिदेवोंसे युक्त रहती हैं। जो उस [वेदी]-के साथ लिङ्गकी पूजा करता है, उसने मानो महादेव तथा भगवती [पार्वती]-का पूजन कर लिया। पाषाणनिर्मित, रत्ननिर्मित, धातुनिर्मित, काष्ठनिर्मित, पार्थिव अथवा क्षणिक जो भी लिङ्ग हो—उसे भक्तिपूर्वक स्थापित करके [व्यक्ति] शुभ फल प्राप्त करता है। वह परम पुण्यात्मा इन्द्र, ब्रह्मा, अग्नि, यम, वरुण, कुबेर, सिद्धों, विद्याधरों, नागराज, यक्षों, दानवों तथा किन्नरोंके द्वारा देवदुन्दुभियोंकी ध्वनिसे स्तुत होता हुआ क्रमशः भूः, भुवः, स्वः, महः, जन, तप तथा सत्य लोकोंको लाँघकर अपने तेजसे प्रकाशित होता हुआ लिङ्गस्थापन आदि सन्मार्गमें निहित स्वाधीन खड्गसे शीघ्र ही ब्रह्माण्डका भेदन करके निःशंक भावसे मुक्त हो जाता है॥ १९—२५॥ | | शैलजं रत्नजं वापि धातुजं वापि दारुजम्।<br>मृन्मयं क्षणिकं त्यक्त्वा स्थापयेत्सकलं वपुः॥ २६<br><br>विधिना चैव कृत्वा तु स्कन्दोमासहितं शुभम्।<br>कुन्दगोक्षीरसङ्काशं लिङ्गं यः स्थापयेन्नरः॥ २७<br><br>नृणां तनुं समास्थाय स्थितो रुद्रो न संशयः।<br>दर्शनात्स्पर्शनात्तस्य लभन्ते निर्वृतिं नराः॥ २८<br><br>तस्य पुण्यं मया वक्तुं सम्यग्युगशतैरपि।<br>शक्यते नैव विप्रेन्द्रास्तस्माद्वै स्थापयेत्तथा॥ २९<br><br>सर्वेषामेव मर्त्यानां विभोर्दिव्यं वपुः शुभम्।<br>सकलं भावनायोग्यं योगिनामेव निष्कलम्॥ ३० | पाषाणनिर्मित, रत्ननिर्मित, धातुनिर्मित, काष्ठनिर्मित, पार्थिव अथवा क्षणिक लिङ्गकी अपेक्षा चन्द्रकलादिसहित बाणलिङ्ग आदिकी स्थापना करनी चाहिये। विधिपूर्वक लिङ्ग बनाकर जो मनुष्य कार्तिकेय-पार्वतीसहित कुन्द पुष्प तथा गायके दूधके समान वर्णवाले शुभ लिङ्गको स्थापित करता है, वह मानव-शरीर धारण करके भी रुद्रके रूपमें स्थित रहता है; इसमें सन्देह नहीं है। उसके दर्शन तथा स्पर्शसे [अन्य] मनुष्य मुक्ति प्राप्त करते हैं। हे विप्रेन्द्रो! मैं उसके पुण्यका सम्यक् वर्णन सैकड़ों युगोंमें भी नहीं कर सकता हूँ, अतः विधिपूर्वक लिङ्गको स्थापित करना चाहिये। सभी मनुष्योंके लिये प्रभुका सकल (सगुण), दिव्य तथा शुभ विग्रह भावनाके योग्य है, किंतु योगियोंके लिये निष्कल (निर्गुण) विग्रह भावनाके योग्य है॥ २६—३०॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवलिङ्गभेदसंस्थापनादिवर्णनं नाम चतुःसप्ततितमोऽध्यायः॥ ७४॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवलिङ्गभेदसंस्थापनादिवर्णन' नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७४॥

७५- शिवके निर्गुण एवं सगुणस्वरूपका निरूपण

३६६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

पचहत्तरवाँ अध्याय

शिवके निर्गुण एवं सगुणस्वरूपका निरूपण

ऋषय ऊचुः<br>निष्कलो निर्मलो नित्यः सकलत्वं कथं गतः।<br>वक्तुमर्हसि चास्माकं यथापूर्वं यथाश्रुतम्॥ १ऋषिगण बोले— निष्कल (निर्गुण), निर्मल तथा नित्य (शाश्वत) शिव सकलत्व (सगुणता)-को कैसे प्राप्त हुए? [हे सूतजी!] आपने जैसा पहले सुना है, उसे हम लोगोंको बताइये॥ १॥
सूत उवाच<br>परमार्थविदः केचिदूचुः प्रणवरूपिणम्।<br>विज्ञानमिति विप्रेन्द्राः श्रुत्वा श्रुतिशिरस्यजम्॥ २<br>शब्दादिविषयं ज्ञानं ज्ञानमित्यभिधीयते।<br>तज्ज्ञानं भ्रान्तिरहितमित्यन्ये नेति चापरे॥ ३सूतजी बोले— हे श्रेष्ठ विप्रो! कुछ तत्त्वज्ञोंने उपनिषदोंमें शिवको अजन्मा सुनकर उन्हें प्रणवरूप विज्ञान कहा है। शब्द आदि विषयोंका जो ज्ञान है, उसे 'ज्ञान' कहा जाता है। अन्य लोग कहते हैं कि जो भ्रान्तिरहित ज्ञान है, वही ज्ञान है; दूसरे लोग कहते हैं कि ऐसा कुछ नहीं है॥ २-३॥
यज्ज्ञानं निर्मलं शुद्धं निर्विकल्पं निराश्रयम्।<br>गुरुप्रकाशकं ज्ञानमित्यन्ये मुनयो द्विजाः॥ ४हे द्विजो! अन्य मुनि लोग कहते हैं कि जो ज्ञान निर्मल, शुद्ध, निर्विकल्प, आश्रयरहित तथा गुरुके द्वारा प्रकाशित है, वह [वास्तविक] ज्ञान है॥ ४॥
ज्ञानेनैव भवेन्मुक्तिः प्रसादो ज्ञानसिद्धये।<br>उभाभ्यां मुच्यते योगी तत्रानन्दमयो भवेत्॥ ५<br>वदन्ति मुनयः केचित्कर्मणा तस्य सङ्गतिम्।<br>कल्पनाकल्पितं रूपं संहृत्य स्वेच्छयैव हि॥ ६ज्ञानसे ही मुक्ति प्राप्त होती है; ज्ञानसिद्धिके लिये [ईश्वरकी] प्रसन्नता आवश्यक है। दोनोंके द्वारा योगी मुक्त हो जाता है और वह आनन्दमय हो जाता है। कुछ मुनि स्वेच्छासे मायाविरचित रूपको हृदयमें भावित करके (विचारकर) विधिप्रतिपादित निष्काम कर्मद्वारा उस ज्ञानकी संगतिको बताते हैं॥ ५-६॥
द्यौर्मूर्धा तु विभोस्तस्य खं नाभिः परमेष्ठिनः।<br>सोमसूर्याग्नयो नेत्रं दिशः श्रोत्रं महात्मनः॥ ७<br>चरणौ चैव पातालं समुद्रस्तस्य चाम्बरम्।<br>देवास्तस्य भुजाः सर्वे नक्षत्राणि च भूषणम्॥ ८<br>प्रकृतिस्तस्य पत्नी च पुरुषो लिङ्गमुच्यते।<br>वक्त्राद्वै ब्राह्मणाः सर्वे ब्रह्मा च भगवान् प्रभुः॥ ९<br>इन्द्रोपेन्द्रौ भुजाभ्यां तु क्षत्रियाश्च महात्मनः।<br>वैश्याश्चोरुप्रदेशात्तु शूद्राः पादात्पिनाकिनः॥ १०<br>पुष्करावर्तकाद्यास्तु केशास्तस्य प्रकीर्तिताः।<br>वायवो घ्राणजास्तस्य गतिः श्रौतं स्मृतिस्तथा॥ ११द्यौ (स्वर्ग) उन विभुका सिर है, आकाश उन परमेश्वरकी नाभि है, चन्द्र-सूर्य-अग्नि [उनके] नेत्र हैं, दिशाएँ [उन] महात्माके कान हैं, पाताल ही [उनके] दोनों चरण हैं, समुद्र उनका वस्त्र है, सभी देवता उनकी भुजाएँ हैं, [सभी] नक्षत्र [उनके] आभूषण हैं। प्रकृतिको [उनकी] पत्नी तथा पुरुषको [उनका] लिङ्ग कहा जाता है। सभी ब्राह्मण, ब्रह्मा, भगवान् विष्णु, इन्द्र तथा उपेन्द्र उनके मुखसे; महात्मा क्षत्रिय भुजाओंसे; वैश्य उनके ऊरुप्रदेशसे तथा शूद्र उन पिनाकधारीके पैरसे उत्पन्न हुए हैं। पुष्कर, आवर्त आदि [मेघ] उनके केश कहे गये हैं। सभी वायु उनकी नासिकासे उत्पन्न हुए हैं। श्रुति तथा स्मृतिमें कथित कर्म उनकी गति हैं॥ ७-११॥

अध्याय ७५] शिवके निर्गुण एवं सगुणस्वरूपका निरूपण [३६७


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
अथानेनैव कर्मात्मा प्रकृतेस्तु प्रवर्तकः।<br>पुंसां तु पुरुषः श्रीमान् ज्ञानगम्यो न चान्यथा॥ १२<br><br>कर्मयज्ञसहस्त्रेभ्यस्तपोयज्ञो विशिष्यते।<br>तपोयज्ञसहस्रेभ्यो जपयज्ञो विशिष्यते॥ १३<br><br>जपयज्ञसहस्रेभ्यो ध्यानयज्ञो विशिष्यते।<br>ध्यानयज्ञात्परो नास्ति ध्यानं ज्ञानस्य साधनम्॥ १४<br><br>यदा समरसे निष्ठो योगी ध्यानेन पश्यति।<br>ध्यानयज्ञरतस्यास्य तदा सन्निहितः शिवः॥ १५इसी [शरीर]-से वे [परमात्मा] कर्मरूप होकर प्रकृतिका प्रवर्तन करते हैं। वे ऐश्वर्यशाली पुरुष (परमात्मा) मनुष्योंके लिये ज्ञानगम्य हैं; इसमें सन्देह नहीं है। तपोयज्ञ हजार कर्मयज्ञोंसे बढ़कर है, जपयज्ञ हजार तपोयज्ञोंसे बढ़कर है और ध्यानयज्ञ हजार जपयज्ञोंसे बढ़कर है। ध्यानयज्ञसे श्रेष्ठ कुछ भी नहीं है; ध्यान ज्ञानका साधन है। जब योगी समरसमें स्थित होकर ध्यानके द्वारा देखता है, तब शिव ध्यानयज्ञमें लीन उस [योगी]-को प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं॥ १२-१५॥
नास्ति विज्ञानिनां शौचं प्रायश्चित्तादिचोदना।<br>विशुद्धा विद्यया सर्वे ब्रह्मविद्याविदो जनाः॥ १६<br><br>नास्ति क्रिया च लोकेषु सुखं दुःखं विचारतः।<br>धर्माधर्मौ जपो होमो ध्यानिनां सन्निधिः सदा॥ १७<br><br>परानन्दात्मकं लिङ्गं विशुद्धं शिवमक्षरम्।<br>निष्कल सर्वगं ज्ञेयं योगिनां हृदि संस्थितम्॥ १८विज्ञानियोंके लिये शुद्धि, प्रायश्चित्त आदि कर्म आवश्यक नहीं हैं; ब्रह्मविद्याको जाननेवाले सभी लोग [ब्रह्म] विद्यासे पूर्णरूपसे शुद्ध हो जाते हैं। विचारकी दृष्टिसे ध्यानियोंके लिये लोकोंमें क्रिया, सुख, दुःख, धर्म, अधर्म, जप, होम आदि [आवश्यक] नहीं हैं; उनके लिये शिव-सन्निधि ही मुख्य है। परम आनन्दमय, विशुद्ध, कल्याणकारी, अविनाशी, निष्कल तथा सर्वव्यापी लिङ्गको योगियोंके हृदयमें [सदा] विराजमान जानना चाहिये॥ १६-१८॥
लिङ्गं तु द्विविधं प्राहुर्बाह्यमाभ्यन्तरं द्विजाः।<br>बाह्यं स्थूलं मुनिश्रेष्ठाः सूक्ष्ममाभ्यन्तरं द्विजाः॥ १९हे द्विजो! लिङ्ग दो प्रकारका कहा गया है—बाह्य तथा आभ्यन्तर। हे श्रेष्ठ मुनियो! स्थूल [लिङ्ग] बाह्य होता है और सूक्ष्म [लिङ्ग] आभ्यन्तर होता है॥ १९॥
कर्मयज्ञरताः स्थूलाः स्थूललिङ्गार्चने रताः।<br>असतां भावनार्थाय नान्यथा स्थूलविग्रहः॥ २०कर्मयज्ञमें निरत तथा स्थूलस्वभाववाले स्थूललिङ्गके अर्चनमें संलग्न रहते हैं। अज्ञानी जनोंकी भावनासिद्धिके लिये ही स्थूलविग्रह कल्पित किया गया है; इसमें दूसरा हेतु नहीं है।
आध्यात्मिकं च यल्लिङ्गं प्रत्यक्षं यस्य नो भवेत्।<br>असौ मूढो बहिः सर्वं कल्पयित्वैव नान्यथा॥ २१जो आध्यात्मिक सूक्ष्मलिङ्ग है, उसका प्रत्यक्ष दर्शन जिसे नहीं होता है, ऐसा वह अज्ञानी व्यक्ति 'सब कुछ बाहर है'—यह कल्पना करके ही पूजनादिमें प्रवृत्त होता है; इसमें सन्देह नहीं है।
ज्ञानिनां सूक्ष्मममलं भवेत्प्रत्यक्षमव्ययम्।<br>यथा स्थूलमयुक्तानां मृत्काष्ठाद्यैः प्रकल्पितम्॥ २२जैसे ज्ञानियोंके लिये प्रत्यक्षरूपसे सूक्ष्म, निर्मल तथा अव्यय (अविनाशी) लिङ्गकी कल्पना की गयी है, वैसे ही सामान्य लोगोंके लिये मिट्टी, काष्ठ आदिसे निर्मित स्थूल लिङ्ग प्रकल्पित है।
अर्थो विचारतो नास्तीत्यन्ये तत्त्वार्थवेदिनः।<br>निष्कलः सकलश्चेति सर्वं शिवमयं ततः॥ २३अतः विचार करनेसे निरवयव तथा सावयव—सब कुछ शिवमयं ही है। मोक्षरूप पुरुषार्थकी भी सत्ता नहीं है*—ऐसा अन्य तत्त्ववेत्तालोग कहते हैं।

* श्रीमद्भागवतके एकादश स्कन्धके अनुसार बन्धन मायामूलक है अर्थात् मिथ्या है, अतः मोक्षकी भी कोई सत्ता नहीं है।

| ३६८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
व्योमैकमपि दृष्टं हि शरावं प्रति सुव्रताः ।<br>पृथक्त्वञ्चापृथक्त्वं च शङ्करस्येति चापरे ॥ २४<br><br>प्रत्ययार्थं हि जगतामेकस्थोऽपि दिवाकरः ।<br>एकोऽपि बहुधा दृष्टो जलाधारेषु सुव्रताः ॥ २५आकाशके एक होते हुए भी जैसे वह शराव (मिट्टीका कसोरा)-[आदि उपाधियोंके भेदसे] अनेक रूपोंमें प्रतीत होता है, वैसे ही भगवान् शिवके एक होनेपर भी उनकी एकता तथा अनेकता दिखायी देती है—ऐसा दूसरे लोग कहते हैं। हे सुव्रतो! एक स्थानपर स्थित होते हुए तथा एक होनेपर भी सूर्य जलके आश्रयभूत विभिन्न पात्रोंमें अनेक रूपोंमें दिखायी देते हैं—यह दृष्टान्त लोगोंको ज्ञान करानेके लिये है॥ २०-२५॥
जन्तवो दिवि भूमौ च सर्वे वै पाञ्चभौतिकाः ।<br>तथापि बहुला दृष्टा जातिव्यक्तिविभेदतः ॥ २६<br><br>दृश्यते श्रूयते यद्यत्तत्तद्विद्धि शिवात्मकम् ।<br>भेदो जनानां लोकेऽस्मिन् प्रतिभासो विचारतः ॥ २७स्वर्ग तथा पृथ्वीके सभी प्राणी पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश)-से निर्मित हैं; तथापि जाति तथा व्यक्तिके भेदसे वे अनेक रूपोंमें दिखायी देते हैं। जो कुछ भी दिखायी देता है अथवा सुनायी पड़ता है, उसे शिवमयं जानिये; विचार करनेपर इस लोकमें लोगोंका भेद तो प्रतिभास (भ्रम)-मात्र है॥ २६-२७॥
स्वप्ने च विपुलान् भोगान् भुक्त्वा मर्त्यः सुखी भवेत् ।<br>दुःखी च भोगं दुःखं च नानुभूतं विचारतः ॥ २८<br><br>एवमाहुस्तथान्ये च सर्वे वेदार्थतत्त्वगाः ।<br>हृदि संसारिणां साक्षात्सकलः परमेश्वरः ॥ २९स्वप्नमें बहुत-से सुखोंका उपभोग करके मनुष्य सुखी तथा दुःखी हो जाता है; विचार करनेसे देखा जाय, तो वास्तवमें सुख-दुःखका अनुभव नहीं होता। इसी प्रकार अन्य सभी वेदार्थतत्त्वज्ञ बन्धन तथा मोक्षको भी स्वप्नकी भाँति बताते हैं। परमेश्वर [शिव] संसारी लोगोंके हृदयमें साक्षात् सकल (सगुण)-रूपसे विराजमान रहते हैं और वे ही जगन्मय देव योगियों तथा ज्ञानियोंके हृदयमें निष्कल (निर्गुण)-रूपसे विराजमान रहते हैं॥ २८-२९ १/२॥
योगिनां निष्कलो देवो ज्ञानिनां च जगन्मयः ।<br>त्रिविधं परमेशस्य वपुर्लोके प्रशस्यते ॥ ३०<br><br>निष्कलं प्रथमं चैकं ततः सकलनिष्कलम् ।<br>तृतीयं सकलं चैव नान्यथेति द्विजोत्तमाः ॥ ३१परमेश्वरका तीन प्रकारका विग्रह लोकमें पूजित होता है। हे श्रेष्ठ द्विजो! पहला निष्कल (निर्गुण), दूसरा सकल-निष्कल (सगुण-निर्गुण) और तीसरा सकल (सगुण); इसमें सन्देह नहीं है॥ ३०-३१॥
अर्चयन्ति मुहुः केचित्सदा सकलनिष्कलम् ।<br>सर्वज्ञं हृदये केचिच्छिवलिङ्गे विभावसौ ॥ ३२<br><br>सकलं मुनयः केचित्सदा संसारवर्तिनः ।<br>एवमभ्यर्चयन्त्येव सदाराः ससुता नराः ॥ ३३कुछ लोग सदा सकल-निष्कल रूपकी पूजा करते हैं; कुछ लोग उन सर्वज्ञकी पूजा हृदयमें, शिवलिङ्गमें तथा अग्निमें करते हैं और हे मुनियो! संसारमें रहनेवाले कुछ मनुष्य स्त्री-पुत्रोंसहित सकल (सगुण) रूपकी सर्वदा पूजा करते हैं॥ ३२-३३॥
यथा शिवस्तथा देवी यथा देवी तथा शिवः ।<br>तस्माद्भेदबुद्धयैव सप्तविंशत्प्रभेदतः ॥ ३४<br><br>यजन्ति देहे बाह्ये च चतुष्कोणे षडस्रके ।<br>दशारे द्वादशारे च षोडशारे त्रिरस्रके ॥ ३५जैसे शिव हैं, वैसे ही देवी हैं और जैसे देवी हैं, वैसे ही शिव हैं; अतः लोग सत्ताईस प्रभेदसे अभेद बुद्धिसे शरीरमें तथा शरीरके बाहर चतुष्कोण (मूलाधार)-में,