भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 350, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 350
३४८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पशुत्वादिति सत्यं च प्रतिज्ञातं समाहिताः ।<br>ये चाप्यन्ये चरिष्यन्ति व्रतं पाशुपतं मम ॥ ३९<br>मोक्ष्यन्ति ते न सन्देहः पशुत्वात्सुरसत्तमाः ।<br>नैष्ठिकं द्वादशाब्दं वा तदर्थं वर्षकत्रयम् ॥ ४०<br>शुश्रूषां कारयेद्यस्तु स पशुत्वाद्विमुच्यते ।<br>तस्मात्परमिदं दिव्यं चरिष्यथ सुरोत्तमाः ॥ ४१मुक्तिका उपाय सुनिये और उसे कीजिये। जो दिव्य पाशुपतव्रतको करेगा, वह पशुत्वसे मुक्त हो जायगा; यह सत्य तथा प्रतिज्ञात है। हे श्रेष्ठ देवताओ! एकाग्रचित्त होकर जो अन्य लोग भी मेरे पाशुपतव्रतको करेंगे, वे पशुत्वसे मुक्त हो जायँगे; इसमें सन्देह नहीं है। जो निष्ठापूर्वक बारह वर्ष, उसके आधे [छः वर्ष] अथवा तीन वर्षतक शुश्रूषा करेगा, वह पशुत्वसे मुक्त हो जायगा। अतः हे श्रेष्ठ देवताओ! [आपलोग] इस परम दिव्य व्रतको कीजिये' ॥ ३७-४१ ॥
तथेति चाब्रुवन् देवाः शिवे लोकनमस्कृते ।<br>तस्माद्वै पशवः सर्वे देवासुरनराः प्रभोः ॥ ४२<br>रुद्रः पशुपतिश्चैव पशुपाशविमोचकः ।<br>यः पशुस्तत्पशुत्वं च व्रतेनानेन सन्त्यजेत् ॥ ४३<br>तत्कृत्वा न च पापीयानिति शास्त्रस्य निश्चयः ।<br>ततो विनायकः साक्षाद् बालोऽबालपराक्रमः ॥ ४४<br>अपूजितस्तदा देवैः प्राह देवान्निवारयन् ।लोकनमस्कृत शिवके ऐसा कहनेपर देवताओंने कहा—'ऐसा ही होगा।' अतः समस्त देवता, असुर तथा मनुष्य शिवजीके पशु हैं। रुद्र पशुपति हैं और पशुपाशसे मुक्त करनेवाले हैं। जो पशु है, उसे इस व्रतके द्वारा पशुभावका त्याग कर देना चाहिये; इसे करके वह पापी नहीं रह जाता है—यह शास्त्रका निश्चय है ॥ ४२-४३ १/२ ॥<br><br>तत्पश्चात् अमित पराक्रमवाले बालकरूप साक्षात् विनायक देवताओंद्वारा पूजित न होनेके कारण उन्हें रोकते हुए कहने लगे ॥ ४४ १/२ ॥
श्रीविनायक उवाच<br>मामपूज्य जगत्यस्मिन् भक्ष्यभोज्यादिभिः शुभैः ॥ ४५<br>कः पुमान् सिद्धिमाप्नोति देवो वा दानवोऽपि वा ।<br>ततस्तस्मिन् क्षणादेव देवकार्ये सुरेश्वराः ॥ ४६<br>विघ्नं करिष्ये देवेशः कथं कर्तुं समुद्यताः ।<br>ततः सेन्द्राः सुराः सर्वे भीताः सम्पूज्य तं प्रभुम् ॥ ४७<br>भक्ष्यभोज्यादिभिश्चैव उण्डरैश्चैव मोदकैः ।<br>अब्रुवंस्ते गणेशानं निर्विघ्नं चास्तु नः सदा ॥ ४८श्रीविनायक बोले—शुभ भक्ष्य, भोज्य आदि पदार्थोंके द्वारा मेरी पूजा किये बिना इस संसारमें कौन मनुष्य, देवता अथवा दानव सिद्धि प्राप्त कर सकता है? अतः हे सुरेश्वरो! मैं देवेश क्षणभरमें ही उस देवकार्यमें विघ्न करूँगा; [मेरी पूजा किये बिना] आपलोग कार्य करनेमें कैसे तत्पर हो गये? ॥ ४५-४६ १/२ ॥<br><br>तत्पश्चात् इन्द्रसहित सभी देवता भयभीत हो गये और भक्ष्य-भोज्य आदि पदार्थों, आटेसे बने लड्डुओं तथा मोदकोंसे उन प्रभुकी विधिवत् पूजा करके वे गणेश्वरसे बोले—'हमलोगोंका कार्य सदा निर्विघ्न सम्पन्न हो' ॥ ४७-४८ ॥
भवोऽप्यनेकैः कुसुमैर्गणेशं<br>भक्ष्यैश्च भोज्यैः सुरसैः सुगन्धैः ।<br>आलिङ्ग्य चाघ्राय सुतं तदानी-<br>मपूजयत्सर्वसुरेन्द्रमुख्यः ॥ ४९उस समय समस्त सुरेश्वरोंमें मुख्य शिवने भी [अपने] पुत्र गणेशका आलिङ्गन करके उनका सिर सूँघकर अनेक प्रकारके सुगन्धित पुष्पों, भक्ष्य-भोज्य पदार्थों तथा उत्तम रसोंसे उनकी पूजा की ॥ ४९ ॥
सम्पूज्य पूज्यं सह देवसङ्घै-<br>र्विनायकं नायकमिश्वराणाम् ।<br>गणेश्वरैरैव नगेन्द्रधन्वा<br>पुरत्रयं दग्धुमसो जगाम ॥ ५०इसके बाद वे मेरुधन्वा शिवजी देवताओंके साथ