श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति ३४७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| कालाग्निरस्तच्छल्यश्चैव साक्षात्तीक्ष्णः सुदारुणः।<br>अनीकं विषसम्भूतं वायवो वाजकाः स्मृताः॥ २५ | और चन्द्रमा [उस] बाणके शल्य (लौहनिर्मित अग्रभाग) थे। साक्षात् प्रलयाग्नि उस बाणके तीक्ष्ण तथा अतिभयंकर विषमयं अनीक (बल) थे। [आवह आदि] वायु [उस बाणके] पंख कहे गये हैं॥ २२—२५॥ |
| एवं कृत्वा रथं दिव्यं कार्मुकं च शरं तथा।<br>सारथिं जगतां चैव ब्रह्माणं प्रभुमीश्वरम्॥ २६<br><br>आरुरोह रथं दिव्यं रणमण्डनधृग्भवः।<br>सर्वदेवगणैर्युक्तं कम्पयन्निव रोदसी॥ २७ | इस प्रकार [देवताओंके द्वारा] दिव्य रथ, धनुष, बाण तथा जगत्के स्वामी प्रभु ब्रह्माको सारथि बनाकर तथा [कवच, मुकुट आदि] रणभूषणोंको धारण करनेवाले शिवजी सभी देवताओंसहित पृथ्वी तथा स्वर्गको कम्पित करते हुए [उस] दिव्य रथपर आरूढ़ हुए॥ २६-२७॥ |
| ऋषिभिः स्तूयमानश्च वन्द्यमानश्च वन्दिभिः।<br>उपनृत्यच्चाप्सरसां गणैर्नृत्यविशारदैः॥ २८<br><br>सुशोभमानो वरदः सम्प्रेक्ष्यैव च सारथिम्।<br>तस्मिन्नारोहति रथं कल्पितं लोकसम्भृतम्॥ २९<br><br>शिरोभिः पतिता भूमिं तुरगा वेदसम्भवाः।<br>अथाधस्ताद्रथस्यास्य भगवान् धरणीधरः॥ ३०<br><br>वृषेन्द्ररूपी चोत्थाप्य स्थापयामास वै क्षणम्।<br>क्षणान्तरे वृषेन्द्रोऽपि जानुभ्यामगमद्धराम्॥ ३१<br><br>अभीषुहस्तो भगवानुद्यम्य च हयान् विभुः।<br>स्थापयामास देवस्य वचनाद्वै रथं शुभम्॥ ३२<br><br>ततोऽश्वांश्चोदयमास मनोमारुतरंहसः।<br>पुराण्युद्दिश्य खस्थानि दानवानां तरस्विनाम्॥ ३३ | ऋषियोंके द्वारा स्तुत होते हुए और बन्दीजनों तथा नृत्य करती हुई नृत्यप्रवीण अप्सराओंके द्वारा वन्दित होते हुए वे वरद शिव अत्यन्त सुशोभित हो रहे थे। सारथिकी ओर देखकर उस लोकसम्भृत कल्पित रथपर उनके आरूढ़ होते ही वेदसम्भूत घोड़े सिरके बल भूमिपर गिर पड़े। तदनन्तर वृषेन्द्रका रूप धारण किये हुए भगवान् शेषने इस रथको नीचेसे उठाकर क्षणभरमें स्थापित करना चाहा, किंतु वे वृषेन्द्र भी एक क्षणके बाद घुटनोंके बल पृथ्वीपर गिर पड़े। तब हाथमें लगाम पकड़े हुए सर्वव्यापी भगवान् [ब्रह्माने] शिवके आदेशसे घोड़ोंको उद्यत (उत्साहित) करके [उस] शुभ रथको स्थापित कर दिया और उन्होंने मन तथा वायुके समान वेगवाले घोड़ोंको साहसी दानवोंके आकाश-स्थित पुरोंको उद्देश्य करके प्रेरित किया॥ २८—३३॥ |
| अथाह भगवान् रुद्रो देवानालोक्य शङ्करः।<br>पशूनामाधिपत्यं मे दत्तं हन्मि ततोऽसुरान्॥ ३४<br><br>पृथक्पशुत्वं देवानां तथान्येषां सुरोत्तमाः।<br>कल्पयित्वैव वध्यास्ते नान्यथा नैव सत्तमाः॥ ३५ | इसके बाद भगवान् शंकर रुद्रने देवताओंको देखकर कहा—'मुझे ही पशुओं (जीवों)-का आधिपत्य दिया गया है; अतः मैं असुरोंका हनन करता हूँ। हे श्रेष्ठ देवताओ! देवों तथा असुरोंके लिये पृथक्-पृथक् पशुत्व होनेके कारण ही वे महादानव वधके योग्य होंगे; अन्यथा नहीं॥ ३४-३५॥ |
| इति श्रुत्वा वचः सर्वं देवदेवस्य धीमतः।<br>विषादमगमन् सर्वे पशुत्वं प्रति शङ्किताः॥ ३६ | बुद्धिमान् देवदेव [शिव]-का सम्पूर्ण वचन सुनकर पशुत्वके प्रति शंकित होते हुए सभी देवता विषादग्रस्त हो गये॥ ३६॥ |
| तेषां भावं ततो ज्ञात्वा देवस्तानीदमब्रवीत्।<br>मा वोऽस्तु पशुभावेऽस्मिन् भयं विबुधसत्तमाः॥ ३७<br><br>श्रूयतां पशुभावस्य विमोक्षः क्रियतां च सः।<br>यो वै पाशुपतं दिव्यं चरिष्यति स मोक्ष्यति॥ ३८ | तब उनके इस भावको जानकर शिवजीने उनसे यह वचन कहा—'हे श्रेष्ठ देवताओ! इस पशुभावमें आपलोगोंको भय नहीं होना चाहिये। अब पशुभावकी |