भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 348, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 348
३४६श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| कोणस्तथा ह्यहङ्कारो भूतानि च बलं स्मृतम्।<br>इन्द्रियाणि च तस्यैव भूषणानि समन्ततः॥ १२<br><br>श्रद्धा च गतिरस्यैव वेदास्तस्य हयाः स्मृताः।<br>पदानि भूषणान्येव षडङ्गान्युपभूषणम्॥ १३<br><br>पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्राणि सुव्रताः।<br>वालाश्रयाः पटाश्चैव सर्वलक्षणसंयुताः॥ १४<br><br>मन्त्रा घण्टाः स्मृतास्तेषां वर्णाः पादास्तथाश्रमाः।<br>अवच्छेदो ह्यनन्तस्तु सहस्रफणभूषितः॥ १५ | नड़वल (अक्षको स्निग्ध बनानेवाले द्रव्यका पात्र) थी। अहंकार इसका कोण था। पंचमहाभूतोंको इसका बल बताया गया है। [सभी] इन्द्रियाँ उसके सभी ओर लगे हुए आभूषण थे। श्रद्धा इस [रथ]-की गति थी। वेद उसके घोड़े कहे गये हैं। वेदोंके पदविभाग इसके भूषण थे तथा [शिक्षा आदि] छः वेदांग इसके उपभूषण थे। हे सुव्रतो! पुराण, न्याय, मीमांसा तथा धर्मशास्त्र इसके वालाश्रय पट थीं, जो सभी लक्षणोंसे युक्त थे। [गायत्री आदि] मन्त्र, [क आदि] वर्ण, पाद (छन्दोंके चतुर्थांश) तथा [ब्रह्मचर्य आदि] आश्रम उन पटोंके घंटे कहे गये हैं। हजार फणोंसे विभूषित अनन्त [शेषनाग] उसके बन्धनरज्जु थे॥ ९-१५॥ | | दिशः पादा रथस्यास्य तथा चोपदिशश्च ह।<br>पुष्कराद्याः पताकाश्च सौवर्णा रत्नभूषिताः॥ १६<br><br>समुद्रास्तस्य चत्वारो रथकम्बलिकाः स्मृताः।<br>गङ्गाद्याः सरितः श्रेष्ठाः सर्वाभरणभूषिताः॥ १७<br><br>चामरासक्तहस्ताग्राः सर्वाः स्त्रीरूपशोभिताः।<br>तत्र तत्र कृतस्थानाः शोभयाञ्चक्रिरे रथम्॥ १८ | दिशाएँ तथा उपदिशाएँ इस रथके पाद थे। पुष्कर आदि [मेघ] रत्नभूषित सुवर्णनिर्मित पताकाएँ थीं। चारों समुद्र उस रथके बाह्य कम्बल कहे गये हैं। गंगा आदि सभी श्रेष्ठ नदियाँ समस्त आभूषणोंसे अलंकृत होकर [अपने] हाथोंके अग्रभागमें चामर (चँवर) धारण किये हुए स्त्रीरूपसे शोभित होती हुई जहाँ-तहाँ अपना स्थान बनाकर रथको सुशोभित कर रही थीं॥ १६-१८॥ | | आवहाद्यास्तथा सप्त सोपानं हैममुत्तमम्।<br>सारथिर्भगवान् ब्रह्मा देवाभीषुधराः स्मृताः॥ १९<br><br>प्रतोदो ब्रह्मणस्तस्य प्रणवो ब्रह्मदैवतम्।<br>लोकालोकाचलस्तस्य ससोपानः समन्ततः॥ २०<br><br>विषमश्च तदा बाह्यो मानसाद्रिः सुशोभनः।<br>नासाः समन्ततस्तस्य सर्व एवाचलाः स्मृताः॥ २१ | आवह आदि सात वायु उसकी सुवर्णमय उत्तम सीढ़ियाँ थीं। भगवान् ब्रह्मा सारथि थे और देवतालोग रथकी रश्मियोंको पकड़नेवाले कहे गये हैं। ब्रह्मदैवत प्रणव ब्रह्माके हाथमें स्थित उसका प्रतोद (चाबुक) था। विस्तृत लोकालोक पर्वत उसके सात वायुओंके स्कन्धरूप सोपानसे युक्त था। परम सुन्दर मानस पर्वत उसमें पैर रखनेका अधोभाग (पायदान) था। समस्त पर्वत सभी ओर इस रथकी नासा (नासिका) कहे गये हैं॥ १९-२१॥ | | तलाः कपोताः कापोताः सर्वे तलनिवासिनः।<br>मेरुरेव महाछत्रं मन्दरः पार्श्वडिण्डिमः॥ २२<br><br>शैलेन्द्रः कार्मुकं चैव ज्याभुजङ्गाधिपः स्वयम्।<br>कालरात्र्या तथैवेह तथेन्द्रधनुषा पुनः॥ २३<br><br>घण्टा सरस्वती देवी धनुषः श्रुतिरूपिणी।<br>इषुर्विष्णुर्महातेजाः शल्यं सोमः शरस्य च॥ २४ | सातों तल उस रथके मज्जन थे; उन तलोंमें रहनेवाले सभी लोग कपोतपक्षीके समान थे। मेरु पर्वत उस रथका महाछत्र था और मन्दर पर्वत पृष्ठवाद्यके रूपमें था। शैलराज [मेरु] धनुष थे और स्वयं भुजंगपति [वासुकि] कालरात्रि तथा इन्द्रधनुषके साथ ज्या (धनुषकी डोरी) थे। वेदस्वरूपिणी सरस्वती देवी [उस] धनुषकी घण्टा थीं, महातेजस्वी विष्णु बाण थे |

श्रीलिंगमहापुराण · पृष्ठ 348, कुल 834 में से · BharatKosha