श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७२ ] त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण....शिवकी स्तुति | ३४५
बहत्तरवाँ अध्याय
त्रिपुरासुरके वधके लिये विश्वकर्माद्वारा एक दिव्य रथका निर्माण तथा भगवान् महेश्वरका उस रथपर आरूढ़ हो त्रिपुरासुरको दग्ध करना एवं ब्रह्माद्वारा भगवान् शिवकी स्तुति
| सूत उवाच | |
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| अथ रुद्रस्य देवस्य निर्मितो विश्वकर्मणा।<br>सर्वलोकमयो दिव्यो रथो यत्नेन सादरम्॥ १<br><br>सर्वभूतमयश्चैव सर्वदेवनमस्कृतः।<br>सर्वदेवमयश्चैव सौवर्णः सर्वसम्मतः॥ २<br><br>रथाङ्गं दक्षिणं सूर्यो वामाङ्गं सोम एव च।<br>दक्षिणं द्वादशारं हि षोडशारं तथोत्तरम्॥ ३<br><br>अरेषु तेषु विप्रेन्द्राश्चादित्या द्वादशैव तु।<br>शशिनः षोडशारेषु कला वामस्य सुव्रताः॥ ४<br><br>ऋक्षाणि च तदा तस्य वामस्यैव तु भूषणम्।<br>नेम्यः षडृतवश्चैव तयोर्वे विप्रपुङ्गवाः॥ ५<br><br>पुष्करं चान्तरिक्षं वै रथनीडश्च मन्दरः।<br>अस्ताद्रिरुदयाद्रिश्च उभौ तौ कूबरौ स्मृतौ॥ ६<br><br>अधिष्ठानं महामेरुराश्रयाः केसराचलाः।<br>वेगः संवत्सरस्तस्य अयने चक्रसङ्गमौ॥ ७<br><br>मुहूर्ता बन्धुरास्तस्य शम्याश्चैव कलाः स्मृताः।<br>तस्य काष्ठाः स्मृता घोणा चाक्षदण्डाः क्षणाश्च वै॥ ८<br><br>निमेषाश्चानुकर्षश्च ईषा चास्य लवाः स्मृताः। | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] विश्वकर्माने प्रयत्नके साथ आदरपूर्वक भगवान् रुद्रका रथ बनाया; वह सर्वलोकमय, दिव्य, सर्वभूतमय, सभी देवताओंसे नमस्कृत, सभी देवताओंसे युक्त, सुवर्णमय तथा सबके अनुकूल था। उसका दाहिना चक्र सूर्य एवं बायाँ चक्र चन्द्रमा थे। दाहिना चक्र बारह अरोंवाला तथा बायाँ चक्र सोलह अरोंवाला था। हे विप्रेन्द्रो! हे सुव्रतो! [दाहिने चक्रके] उन अरोंमें बारह आदित्य थे और बायें चक्रके सोलह अरोंमें चन्द्रमाकी [सोलह] कलाएँ थीं। हे मुनिश्रेष्ठो! नक्षत्रगण उस बाएँ चक्रके भूषण थे और छः ऋतुएँ उन दोनों चक्रोंकी नेमियाँ थीं। आकाश इसकी छत थी और मन्दर पर्वत रथका सारथि-स्थान था। अस्ताचल तथा उदयाचल उसके दोनों स्तम्भ कहे गये हैं। महामेरु [पर्वत] उसका अधिष्ठान [मुख्य स्थान] था और केसरपर्वत मेरुको आश्रय देनेवाले थे। संवत्सर उसका वेग था और दोनों अयन (उत्तरायण, दक्षिणायन) उसके चक्रसंगम (अक्षके प्रान्तभाग) थे। मुहूर्त उस रथके बंधुर [तल्पभाग] और कलाएँ उसकी शम्या (वर्तुलपट्टिकाएँ) कही गयी हैं। काष्ठाएँ उसकी नासिका तथा क्षण उसके अक्षदण्ड (चक्रोंका आधारदण्ड) कहे गये हैं। निमेष इस रथके अनुकर्ष (नीचेका तल) तथा लव (निमेषसे भी छोटा समय) इसकी ईषा (दोनों अक्षोंको जोड़नेवाला काष्ठ) कहे गये हैं॥ १—८ ½॥ |
| द्यौर्वरूथं रथस्यास्य स्वर्गमोक्षावुभौ ध्वजौ॥ ९<br><br>धर्मो विरागो दण्डोऽस्य यज्ञा दण्डाश्रयाः स्मृताः।<br>दक्षिणाः सन्ध्यतस्तस्य लोहाः पञ्चाशदग्नयः॥ १०<br><br>युगान्तकोटी तौ तस्य धर्मकामावुभौ स्मृतौ।<br>ईषादण्डस्तथाव्यक्तं बुद्धिस्तस्यैव नड्वलः॥ ११ | अन्तरिक्ष इस रथका वरूथ (कवच) था और स्वर्ग तथा मोक्ष इस रथके दोनों ध्वज थे। धर्म तथा विराग इसके दण्ड थे; यज्ञ इस दण्डको आश्रय (सहारा) देनेवाले कहे गये हैं। दक्षिणाएँ उस रथकी सन्थियाँ थीं और पचासों अग्नियाँ इसकी कीलें थीं। धर्म तथा काम—ये दोनों उसके जुओंके सिरे कहे गये हैं। अव्यक्त [तत्त्व] उसका ईषादण्ड था तथा बुद्धि इसका |