भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 346, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 346

| ३४४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| दिवः पृष्ठे यथा चन्द्रो नक्षत्रैरिव सुव्रताः।<br>तं दृष्ट्वा नन्दिनं देवाः सेन्द्रोपेन्द्रास्तथाविधम् ॥ १५३<br><br>तुष्टुवुर्गणपेशानं देवदेवमिवापरम्।<br><br>देवा ऊचुः<br>नमस्ते रुद्रभक्ताय रुद्रजाप्यरताय च ॥ १५४<br><br>रुद्रभक्तार्तिनाशाय रौद्रकर्मरताय ते।<br>कूष्माण्डगणनाथाय योगिनां पतये नमः ॥ १५५<br><br>सर्वदाय शरण्याय सर्वज्ञायार्तिहारिणे।<br>वेदानां पतये चैव वेदवेद्याय ते नमः ॥ १५६<br><br>वज्रिणे वज्रदंष्ट्राय वज्रिवज्रनिवारिणे।<br>वज्रालङ्कृतदेहाय वज्रिणाराधिताय ते ॥ १५७<br><br>रक्ताय रक्तनेत्राय रक्ताम्बरधराय ते।<br>रक्तानां भवपादाब्जे रुद्रलोकप्रदायिने ॥ १५८<br><br>नमः सेनाधिपतये रुद्राणां पतये नमः।<br>भूतानां भुवनेशानां पतये पापहारिणे ॥ १५९<br><br>रुद्राय रुद्रपतये रौद्रपापहराय ते।<br>नमः शिवाय सौम्याय रुद्रभक्ताय ते नमः ॥ १६० | तारोंसे भर गया हो। हे सुव्रतो! पुष्पोंसे ढँके हुए नन्दी बैलकी पीठपर उसी प्रकार सुशोभित हो रहे थे, जैसे आकाशपृष्ठपर [विराजमान] चन्द्रमा तारोंसे आच्छादित होकर सुशोभित होते हैं॥ १४९-१५२१/२॥<br>उस प्रकारकी शोभावाले उन नन्दीको देखकर इन्द्र तथा विष्णुसहित देवता साक्षात् महादेवजीकी भाँति प्रतीत होनेवाले गणाधिपोंके स्वामी नन्दीकी स्तुति करने लगे॥ १५३१/२॥<br><br>देवता बोले—आप रुद्रभक्त तथा रुद्रजपपरायणको नमस्कार है। रुद्रभक्तोंकी पीड़ाका नाश करनेवाले, रौद्रकर्ममें संलग्न, कूष्माण्डगणोंके स्वामी तथा योगियोंके पति आप [नन्दी]-को नमस्कार है। सब कुछ प्रदान करनेवाले, शरण देनेवाले, सब कुछ जाननेवाले, कष्ट दूर करनेवाले, वेदोंके पति तथा वेदोंसे जाननेयोग्य आप [नन्दी]-को नमस्कार है। वज्रधारी, वज्रतुल्य दंष्ट्रावाले, इन्द्रके वज्रका निवारण करनेवाले, वज्रसे अलंकृत देहवाले तथा इन्द्रके द्वारा आराधित आप [नन्दी]-को नमस्कार है। रक्त वर्णवाले, रक्त नेत्रवाले, रक्त वस्त्र धारण करनेवाले तथा शिवके चरणकमलमें अनुरागयुक्त लोगोंको रुद्रलोक प्रदान करनेवाले आप [नन्दी]-को नमस्कार है। सेनाके अधिपति, रुद्रोंके पति, भूतों तथा भुवनेशोंके पति और पापोंका हरण करनेवाले आप [नन्दी]-को नमस्कार है। रुद्र, रुद्रपति, रौद्र पापोंका हरण करनेवाले आप [नन्दी]-को नमस्कार है। शिवस्वरूप, सौम्य [स्वभाववाले] तथा रुद्रभक्त आप [नन्दी]-को नमस्कार है॥ १५४-१६०॥ | | सूत उवाच<br>ततः प्रीतो गणाध्यक्षः प्राह देवांश्छिलात्मजः।<br>रथं च सारथिं शम्भोः कार्मुकं शरमुत्तमम् ॥ १६१<br><br>कर्तुमर्हथ यत्नेन नष्टं मत्वा पुरत्रयम्।<br>अथ ते ब्रह्मणा सार्धं तथा वै विश्वकर्मणा ॥ १६२<br><br>रथं चक्रुः सुसंरब्धा देवदेवस्य धीमतः ॥ १६३ | सूतजी बोले—[हे ऋषियो!] तदनन्तर प्रसन्न हुए शिलादपुत्र गणेश्वर [नन्दी]-ने देवताओंसे कहा—'अब तीनों पुरोंको नष्ट मानकर आपलोग शम्भुके लिये रथ, सारथि, धनुष तथा उत्तम बाण प्रयत्नपूर्वक तैयार कराइये।' इसके बाद उन देवताओंने अतिशीघ्रतासे युक्त होकर ब्रह्माके साथ विश्वकर्माके द्वारा बुद्धिमान् देवदेव [शिव]-का रथ बनवाया॥ १६१-१६३॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे पुरदाहे नन्दिकेश्वरवाक्यं नामैकसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७१ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'पुरदाहप्रसंगमें नन्दिकेश्वरवाक्य' नामक इकहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७१ ॥