श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 345, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ें| अध्याय ७१ ] | तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त | ३४३ |
|---|
卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
| अहो विधेर्बलं चेति मुनयः कश्यपादयाः।<br>दृष्ट्वापि देवदेवेशं देवानां चासुरद्विषाम्॥ १४०<br><br>अभाग्यान्न समाप्तं तु कार्यमित्यपरे द्विजाः।<br>प्रोचुर्नमः शिवायेति पूज्य चाल्पतरं हृदि॥ १४१<br><br>ततः कपर्दी नन्दीशो महादेवप्रियो मुनिः।<br>शूली माली तथा हाली कुण्डली वलयी गदी॥ १४२<br><br>वृषमारुह्य सुश्वेतं ययौ तस्याज्ञया तदा।<br>ततो वै नन्दिनं दृष्ट्वा गणः कुम्भोदरोऽपि सः॥ १४३<br><br>प्रणम्य नन्दिनं मूर्ध्ना सह तेन त्वरन् ययौ।<br>नन्दी भाति महातेजा वृषपृष्ठे वृषध्वजः॥ १४४<br><br>सगणो गणसेनानीर्मेघपृष्ठे यथा भवः।<br>दशयोजनविस्तीर्णं मुक्ताजालैरलङ्कृतम्॥ १४५<br><br>सितातपत्रं शैलादेराकाशमिव भाति तत्।<br>तत्रान्तर्बद्धमाला सा मुक्ताफलमयी शुभा॥ १४६<br><br>गङ्गाकाशान्निपतिता भाति मूर्ध्नि विभोर्यथा।<br>अथ दृष्ट्वा गणाध्यक्षं देवदुन्दुभयः शुभाः॥ १४७<br><br>नियोगाद्वज्रिणः सर्वे विनेदुर्मुनिपुङ्गवाः।<br>तुष्टुवुश्च गणेशानं वाग्भिरिष्टप्रदं शुभम्॥ १४८<br><br>यथा देवा भवं दृष्ट्वा प्रीतिकण्टकितत्वचः।<br>नियोगाद्वज्रिणो मूर्ध्नि पुष्पवर्षं च खेचराः॥ १४९<br><br>ववृषुश्च सुगन्धाढ्यं नन्दिनो गगनोदितम्।<br>वृष्ट्या तुष्टस्तदा रेजे तुष्ट्या पुष्ट्या यथार्थया॥ १५०<br><br>नन्दी भवश्चान्द्रया तु स्नातया गन्धवारिणा।<br>पुष्पैर्नानाविधैस्तत्र भाति पृष्ठं वृषस्य तत्॥ १५१<br><br>सङ्कीर्णं तु दिवः पृष्ठं नक्षत्रैरिव सुव्रताः।<br>कुसुमैः संवृतो नन्दी वृषपृष्ठे रराज सः॥ १५२ | भागने लगे; कुछ मुनि तथा देवता पृथ्वीतलपर गिर पड़े॥ १३८-१३९॥<br>कश्यप आदि मुनियोंने कहा—'विधिकी बल कैसा अद्भुत है!' हे द्विजो! अन्य लोगोंने कहा—'देव-देवेशका दर्शन करके भी असुरशत्रु देवताओंके अभाग्यसे ही कार्य पूर्ण नहीं हो सका। इसके बाद वे सब हृदयमें थोड़ा अर्चन करके 'शिवको नमस्कार है'—ऐसा कहने लगे॥ १४०-१४१॥<br>तत्पश्चात् जटाजूट धारण किये, [हाथमें] त्रिशूल लिये, माला पहने हुए, हाला धारण किये हुए, कुण्डल धारण किये हुए, कंगन पहने हुए तथा गदा धारण किये हुए महादेवप्रिय मुनि नन्दीश सुन्दर श्वेत बैलपर चढ़कर उन [शिव]—की आज्ञासे वहाँ जाने लगे। तब नन्दीको देखकर कुम्भोदर [नामक] वह गण भी नन्दीको प्रणाम करके शीघ्रता करते हुए उनके साथ चल दिया। गणसहित वे महातेजस्वी वृषध्वज गणोंके सेनापति नन्दी बैलकी पीठपर उसी तरह प्रतीत हो रहे थे, मानो मेघस्वरूप विष्णुके पृष्ठपर शिवजी विराजमान हों। नन्दीश्वरका दस योजन विस्तृत तथा मुक्ताजालोंसे अलंकृत श्वेत छत्र आकाशकी भाँति प्रतीत हो रहा था। उस छत्रमें भीतरसे बँधी हुई मुक्ताफलोंकी वह श्वेत माला ऐसी लग रही थी, मानो शिवजीके सिरपर आकाशसे गंगा गिर रही हों॥ १४२–१४६१/२॥<br>हे मुनिश्रेष्ठो! तदनन्तर गणाध्यक्ष [नन्दी]-को देखकर इन्द्रकी आज्ञासे दिव्य देवदुन्दुभियाँ बजने लगीं; सभी लोग वाणीद्वारा वांछित फल प्रदान करनेवाले शुभ गणेश्वरकी स्तुति करने लगे, जैसे शिवको देखकर देवतालोग प्रसन्नतासे रोमांचित होकर उनकी स्तुति करते हैं॥ १४७-१४८१/२॥<br>आकाशचारियोंने इन्द्रकी आज्ञासे नन्दीके सिरपर आकाशसे सुगन्धमय पुष्पवृष्टि की। तुष्टि-पुष्टिसे युक्त यथार्थ वृष्टिसे प्रसन्न होकर नन्दी उसी तरह शोभा पा रहे थे, जैसे शिवजी गन्धजलसे अभिसिंचित चन्द्रलेखासे शोभा प्राप्त करते हैं। हे सुव्रतो! वृषभका पृष्ठ अनेक प्रकारके पुष्पोंसे ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो आकाशपृष्ठ |