भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| नेत्राणि च विभो पश्य शुभानि त्वं शुभानि च।<br>अञ्जनानि विचित्राणि मङ्गलार्थं च मातृभिः॥ १२७<br><br>गङ्गादिभिः कृत्तिकाद्यैः स्वाहया च विशेषतः।<br>इत्येवं लोकमातुश्च वाग्भिः सम्बोधितः शिवः॥ १२८ | वृत्ताकार तिलकसे युक्त इसके कमलसमूह-सदृश मुखोंको देखिये। हे विभो! आप इसके अत्यन्त सुन्दर नेत्रोंको देखिये, गंगा आदि, कृत्तिका आदि तथा विशेष रूपसे स्वाहा माताओंके द्वारा मंगलके लिये लगाये गये भव्य तथा विचित्र काजलोंको देखिये॥ १२१-१२७१/२॥ | | न ययौ तृप्तिमीशानः पिबन् स्कन्दाननामृतम्।<br>न सस्मार च तान् देवान् दैत्यशस्त्रनिपीडितान्॥ १२९<br><br>स्कन्दमालिङ्ग्य चाघ्राय नृत्य पुत्रेत्युवाच ह।<br>सोऽपि लीलालसो बालो ननर्तातिहरः प्रभुः॥ १३०<br><br>सहैव ननृतुश्चान्ये सह तेन गणेश्वराः।<br>त्रैलोक्यमखिलं तत्र ननर्तेशाज्ञया क्षणम्॥ १३१<br><br>नागाश्च ननृतुः सर्वे देवाः सेन्द्रपुरोगमाः।<br>तुष्टुवुर्गणपाः स्कन्दं मुमोदाम्बा च मातरः॥ १३२<br><br>ससृजुः पुष्पवर्षाणि जगुर्गन्धर्वकिन्नराः।<br>नृत्यामृतं तदा पीत्वा पार्वतीपरमेश्वरौ।<br>अवापतुस्तदा तृप्तिं नन्दिना च गणेश्वराः॥ १३३ | इस प्रकार जगज्जननी [उमा]-के वचनोंसे सम्बोधित किये गये ईशान शिव कार्तिकेयके मुखामृतका पान करते हुए तृप्त नहीं हुए। उन्हें दैत्योंके शस्त्रोंसे पीड़ित उन देवताओंका स्मरण नहीं रहा। उन्होंने स्कन्दका आलिङ्गन करके उसका सिर सूँघकर कहा—'हे पुत्र! नृत्य करो।' तब कष्ट दूर करनेवाले बालकरूप प्रभु [स्कन्द] भी लीला करते हुए नाचने लगे। सभी गणेश्वर भी उनके साथ नृत्य करने लगे और क्षणभरमें शिवकी आज्ञासे सम्पूर्ण त्रिलोकी वहाँ नृत्य करने लगा। नाग और इन्द्रसहित सभी देवता भी नाचने लगे। गणेश्वरोंने स्कन्दकी स्तुति की। [उस समय] पार्वती तथा [अन्य] माताएँ आनन्दित हुईं। गन्धर्व तथा किन्नर पुष्पवृष्टि करने लगे एवं गाने लगे। तब [उस] नृत्यरूपी अमृतका पान करके पार्वती तथा परमेश्वर तृप्त हो गये और नन्दीसहित गणेश्वर भी तृप्त हुए॥ १२८-१३३॥ | | ततः स नन्दी सह षण्मुखेन<br>तथा च सार्धं गिरिराजपुत्र्या।<br>विवेश दिव्यं भवनं भवोऽपि<br>यथाम्बुदोऽन्याम्बुदमम्बुदाभः॥ १३४ | तदनन्तर सूर्यके समान कान्तिवाले शिवजीने भी नन्दी, षडानन (स्कन्द) तथा गिरिराजपुत्री [पार्वती]-के साथ दिव्य भवनमें प्रवेश किया, जैसे मेघ अन्य मेघमें प्रवेश करता है॥ १३४॥ | | द्वारस्य पार्श्वे ते तस्थुर्देवा देवस्य धीमतः।<br>तुष्टुवुश्च महादेवं किञ्चिदुद्विग्नचेतसः॥ १३५<br><br>किन्तु किन्विति चान्योन्यं प्रेक्ष्य चैतत्समाकुलाः।<br>पापा वयमिति ह्यान्ये अभाग्याश्चेति चापरे॥ १३६<br><br>भाग्यवन्तश्च दैत्येन्द्रा इति चान्ये सुरेश्वराः।<br>पूजाफलमिमं तेषामित्यन्ये नेति चापरे॥ १३७ | वे देवता उन बुद्धिमान् शिवके द्वारके पास खड़े हो गये और कुछ-कुछ व्याकुलचित्त होकर महादेवकी स्तुति करने लगे। वे व्याकुल होकर एक-दूसरेकी ओर देखकर कहने लगे—'यह क्या, यह क्या; हमलोग पापी हैं' अन्य दूसरोंने कहा—'हम अभागे हैं' अन्य सुरेश्वरोंने कहा—'ये महादैत्य भाग्यशाली हैं।' कुछने कहा—'यह उनकी पूजाका फल है' और कुछने कहा—'ऐसा नहीं है'॥ १३५-१३७॥ | | एतस्मिन्नन्तरे तेषां श्रुत्वा शब्दाननेकशः।<br>कुम्भोदरो महातेजा दण्डेनाताडयत्सुरान्॥ १३८<br><br>दुद्रुवुस्ते भयाविष्टा देवा हाहेतिवादिनः।<br>अपतन् मुनयश्चान्ये देवाश्च धरणीतले॥ १३९ | इसी बीच उनके अनेक शब्दोंको सुनकर महातेजस्वी कुम्भोदर [नामक शिवगण] दण्डसे देवताओंको पीटने लगा। तब वे देवता भयभीत होकर 'हा-हा' कहते हुए |