श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७१ ] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त ३४१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| यथा तरङ्गा लहरीसमूहा<br>युध्यन्ति चान्योन्यमपांनिधौ च।<br>जलाशयादेव जडीकृताश्च<br>सुरासुरास्तद्वदजस्य सर्वम्॥ ११४॥<br><br>सूत उवाच<br>य इदं प्रातरुत्थाय शुचिर्भूत्वा जपेन्नरः।<br>शृणुयाद्वा स्तवं पुण्यं सर्वकाममवाप्नुयात्॥ ११५॥<br>स्तुतस्त्वेवं सुरैर्विष्णोर्जपेन च महेश्वरः।<br>सोमः सोमामथालिङ्ग्य नन्दिदत्तकरः स्मयन्॥ ११६॥<br>प्राह गम्भीरया वाचा देवानावलोक्य शङ्करः।<br>ज्ञातं मयेदमधुना देवकार्यं सुरेश्वराः॥ ११७॥<br>विष्णोर्मायाबलं चैव नारदस्य च धीमतः।<br>तेषामधर्मनिष्ठानां दैत्यानां देवसत्तमाः॥ ११८॥<br>पुरत्रयविनाशं च करिष्येऽहं सुरोत्तमाः।<br><br>सूत उवाच<br>अथ सब्रह्मका देवाः सेन्द्रोपेन्द्राः समागताः॥ ११९॥<br>श्रुत्वा प्रभोस्तदा वाक्यं प्रणेमुस्तुष्टुवुश्च ते।<br>अप्येतदन्तरं देवी देवमालोक्य विस्मिता॥ १२०॥<br>लीलाम्बुजेन चाहत्य कलमाह वृषध्वजम्।<br><br>देव्युवाच<br>क्रीडमानं विभो पश्य षण्मुखं रविसन्निभम्॥ १२१॥<br>पुत्रं पुत्रवतां श्रेष्ठ भूषितं भूषणैः शुभैः।<br>मुकुटैः कटकैश्चैव कुण्डलैर्वलयैः शुभैः॥ १२२॥<br>नूपुरैश्छन्नवारैश्च तथा ह्युदरबन्धनैः।<br>किङ्किणीभिरनेकाभिर्हैमैरश्वत्थपत्रकैः॥ १२३॥<br>कल्पद्रुमजैः पुष्पैः शोभितैरलकैः शुभैः।<br>हारैर्वारीजरागादिमणिचित्रैस्तथाङ्गदैः॥ १२४॥<br>मुक्ताफलमयैर्हारैः पूर्णचन्द्रसमप्रभैः।<br>तिलकैश्च महादेव पश्य पुत्रं सुशोभनम्॥ १२५॥<br>अङ्कितं कुङ्कुमाद्यैश्च वृत्तं भसितनिर्मितम्।<br>वक्त्रवृन्दं च पश्येश वृन्दं कामलकं यथा॥ १२६॥ | महादैत्योंका संहार करके आप [हमारी] रक्षा कीजिये। हे परमेश्वर! सभीलोग आपकी मायासे मोहित हैं॥ ११३॥<br><br>जिस प्रकार तरंगें तथा लहरें समुद्रमें परस्पर टकराती हैं और जलाश्रयसे ही जड़ीभूत होकर उसीमें विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार ब्रह्माकी सृष्टिके देवता-असुर सभी कोई आपसमें टकराते हैं और अन्तमें जड़ीभूत होकर आपमें ही विलीन हो जाते हैं॥ ११४॥<br><br>**सूतजी बोले—**जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर शुद्ध होकर इस पवित्र स्तुतिको पढ़ता अथवा सुनता है, वह सभी कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ ११५॥<br><br>इस प्रकार देवताओंके द्वारा स्तुति किये जाने तथा विष्णुके जपसे प्रसन्न हुए महेश्वर शंकरने उमाका आलिङ्गन करके नन्दीके ऊपर हाथ रखकर देवताओंकी ओर देखकर गम्भीर वाणीमें मुसकराते हुए कहा—'हे सुरेश्वरो! अब मैंने इस देवकार्यको और विष्णु तथा बुद्धिमान् नारदके मायाबलको जान लिया है। हे श्रेष्ठ देवताओ! मैं अधर्ममें निष्ठा रखनेवाले उन दैत्योंके तीनों पुरोंका विनाश [अवश्य] करूँगा'॥ ११६—११८ १/२॥<br><br>**सूतजी बोले—**इसके बाद [वहाँ] आये हुए वे इन्द्र-ब्रह्मा-विष्णुसहित देवताओंने प्रभुका वचन सुनकर उन्हें प्रणाम किया तथा उनकी स्तुति की। इसके अनन्तर शिवकी ओर देखकर विस्मित देवी भी अपने लीला-कमलसे शिवजीको मारकर (स्पर्शकर) यह वचन कहने लगीं॥ ११९-१२० १/२॥<br><br>**देवी बोलीं—**हे विभो! हे पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ! उत्तम आभूषणोंसे सुशोभित तथा सूर्यके समान प्रतीत होनेवाले [अपने] इस खेलते हुए श्रेष्ठ पुत्र षडाननको देखिये। हे महादेव! मुकुटों, कटकों, कुण्डलों, सुन्दर कँगनों, नूपुरों, छन्नवारों, करधनियों, अनेक किंकिणियों, सुवर्णमय पीपलके पत्तों, कल्पद्रुमके पुष्पोंसे शोभित सुन्दर अलकों, पद्मराग आदि मणियोंसे चमत्कृत हारों तथा बाजूबन्दों, पूर्णचन्द्रमाके समान प्रभावाले मुक्ताफलमय हारों और तिलकोंसे मण्डित परम सुन्दर पुत्रको देखिये। हे ईश! कुंकुम आदिसे अंकित तथा भस्मनिर्मित |