भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३४०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

| देवा ऊचुः | तथा मरुद्गणोंके साथ देव परमेश्वरकी स्तुति करने लगे॥ ९८-९९॥ | | नमः सर्वात्मने तुभ्यं शङ्करायार्तिहारिणे।<br>रुद्राय नीलरुद्राय कद्रुद्राय प्रचेतसे॥ १००<br><br>गतिर्नः सर्वदास्माभिर्वन्द्यो देवारिमर्दनः।<br>त्वमादिस्त्वमनन्तश्च अनन्तश्चाक्षयः प्रभुः॥ १०१<br><br>प्रकृतिः पुरुषः साक्षात्स्रष्टा हर्ता जगद्गुरो।<br>त्राता नेता जगत्यस्मिन् द्विजानां द्विजवत्सल॥ १०२<br><br>वरदो वाङ्मयो वाच्यो वाच्यवाचकवर्जितः।<br>याज्यो मुक्त्यर्थमीशानो योगिभिर्योगविभ्रमैः॥ १०३<br><br>हृत्पुण्डरीकसुषिरे योगिनां संस्थितः सदा।<br>वदन्ति सूरयः सन्तं परं ब्रह्मस्वरूपिणम्॥ १०४<br><br>भवन्तं तत्त्वमित्यार्यास्तेजोराशिं परात्परम्।<br>परमात्मानमित्याहुरस्मिञ्जगति तद्विभो॥ १०५<br><br>दृष्टं श्रुतं स्थितं सर्वं जायमानं जगद्गुरो।<br>अणोरल्पतरं प्राहुर्महतोऽपि महत्तरम्॥ १०६<br><br>सर्वतः पाणिपादं त्वां सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्।<br>सर्वतः श्रुतिमल्लोके सर्वमावृत्य तिष्ठसि॥ १०७ | देवता बोले— आप सर्वात्मा, शंकर, दुःखनाशक, रुद्र, नीलरुद्र, कद्रुद्र (प्रशस्त रुद्र) तथा प्रचेताको नमस्कार है। आप हमलोगोंकी गति हैं। दैत्योंका संहार करनेवाले आप हमलोगोंद्वारा सर्वदा वन्द्य हैं। आप आदि तथा अन्तरहित हैं; आप अनन्त (शेषरूप), अविनाशी एवं प्रभुतासम्पन्न हैं। हे जगद्गुरो! आप प्रकृति, पुरुष, साक्षात् स्रष्टा, रक्षक तथा संहारक हैं। हे द्विजवत्सल! आप इस जगत्में द्विजोंके नेता हैं। आप वरदाता, वाणीमय, वाच्य, वाच्य-वाचकसे रहित ईशान हैं; आप मुक्तिके लिये योगपरायण योगियोंके द्वारा पूज्य हैं। आप योगियोंके हृदयरूपी कमलके छिद्रमें सदा स्थित हैं। विद्वान्लोग आपको सर्वत्र विद्यमान्, श्रेष्ठ तथा ब्रह्मस्वरूप कहते हैं। हे विभो! ऋषिगण आपको इस जगत्में तत्त्वरूप, तेजोराशि, परात्पर एवं परमात्मा कहते हैं। हे जगद्गुरो! आप दृष्ट, श्रुत, स्थित तथा जायमान सब कुछ हैं। लोग आपको अणुसे भी अल्पतर, महान्से भी महत्तर, सभी ओर हाथ-पैरवाला, सभी ओर नेत्र-सिर-मुखवाला तथा सभी ओर कानवाला कहते हैं। आप संसारमें सभीको आच्छादित करके स्थित हैं॥ १००-१०७॥ | | महादेमनिर्देश्यं सर्वज्ञं त्वामनामयम्।<br>विश्वरूपं विरूपाक्षं सदाशिवमनामयम्॥ १०८<br><br>कोटिभास्करसङ्काशं कोटिशीतांशुसन्निभम्।<br>कोटिकालाग्निसङ्काशं षड्विंशकमनीश्वरम्॥ १०९<br><br>प्रवर्तकं जगत्यस्मिन् प्रकृतेः प्रपितामहम्।<br>वदन्ति वरदं देवं सर्वावासं स्वयम्भुवम्॥ ११०<br><br>श्रुतयः श्रुतिसारं त्वां श्रुतिसारविदो जनाः॥ १११ | लोग आपको महादेव, अनिर्देश्य, सर्वज्ञ, अनामय, विश्वरूप, विरूपाक्ष, सदाशिव, निर्विकार, करोड़ों सूर्योंके समान [तेजस्वी], करोड़ों चन्द्रमासदृश [प्रकाशमान], करोड़ों कालाग्निके समान [प्रज्वलित], छब्बीस तत्त्वोंसे युक्त, अनीश्वर, इस जगत्में प्रकृतिके प्रवर्तक, प्रपितामह, सबके आवास-स्वरूप तथा स्वयम्भू (स्वयं उत्पन्न होनेवाला) एवं वर देनेवाला देव कहते हैं; श्रुतियाँ तथा श्रुति-तत्त्वोंको जाननेवाले लोग आपको वेदोंका सार कहते हैं॥ १०८-१११॥ | | अदृष्टमस्माभिरनेकमूर्ते<br>विना कृतं यद्भवताथ लोके।<br>त्वमेव दैत्यान् सुरभूतसङ्घान्<br>देवान्नरान् स्थावरजङ्गमांश्च॥ ११२ | हे अनेक रूपोंवाले [प्रभो]! हमलोगोंने संसारमें ऐसा कुछ भी नहीं देखा है, जो आपके बिना [किसी अन्यके द्वारा] रचित हो; आपने ही दैत्यों, सुरोंके भूतसमुदायों, देवताओं, मनुष्यों, स्थावर-जंगम आदिको उत्पन्न किया है॥ ११२॥ | | पाहि नान्या गतिः शम्भो विनिहत्यासुरोत्तमान्।<br>मायया मोहिताः सर्वे भवतः परमेश्वर॥ ११३ | हे शम्भो! हमलोगोंकी कोई अन्य गति नहीं है; |