श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 341, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 341
अध्याय ७९ ] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त [ ३३९
| प्राप्नुयात्परमं स्वर्गं नरकं च विपर्ययात्।<br>पुरैका मुनिशार्दूलाः सर्वधर्मान् सदा पतिम् ॥ ८७<br><br>सन्त्यज्यापूजयन् साध्व्यो देवानन्याञ्जगद्गुरून्।<br>ताः स्वर्गलोकमासाद्य मोदन्ते विगतज्वराः ॥ ८८<br><br>नरकं च जगामान्या तस्माद्भर्त्ता परा गतिः।<br>तथापि भर्तॄन् स्वांस्त्यक्त्वा बभूवुः स्वैरवृत्तयः ॥ ८९<br><br>मायया देवदेवस्य विष्णोस्तस्याज्ञया प्रभोः।<br>अलक्ष्मीश्च स्वयं तस्य नियोगात्त्रिपुरं गता ॥ ९०<br><br>या लक्ष्मीस्तपसा तेषां लब्धा देवेश्वरादजात्।<br>बहिर्गता परित्यज्य नियोगाद् ब्रह्मणः प्रभोः ॥ ९१<br><br>बुद्धिमोहं तथाभूतं विष्णुमायाविनिर्मितम्।<br>तेषां दत्त्वा क्षणं देवस्तासां मायी च नारदः ॥ ९२<br><br>सुखासीनौ ह्यसम्भ्रान्तौ धर्मविघ्नार्थमव्ययौ।<br>एवं नष्टे तदा धर्मे श्रौतस्मार्ते सुशोभने ॥ ९३<br><br>पाषण्डे ख्यापिते तेन विष्णुना विश्वयोनिना।<br>त्यक्ते महेश्वरे दैत्यैस्त्यक्ते लिङ्गार्चने तथा ॥ ९४<br><br>स्त्रीधर्मे निखिले नष्टे दुराचारे व्यवस्थिते।<br>कृतार्थ इव देवेशो देवैः सार्धमुमापतिम् ॥ ९५<br><br>तपसा प्राप्य सर्वज्ञं तुष्टाव पुरुषोत्तमः। | प्रेमयुक्त रहती है, वह परम स्वर्ग प्राप्त करती है और इससे विपरीत आचरणसे नरक प्राप्त करती है। हे मुनिश्रेष्ठो! पूर्वकालमें स्त्रियाँ सभी धर्मों, अन्य देवताओं तथा जगद्गुरुओंको त्यागकर सर्वदा पतिकी पूजा करती थीं; वे स्वर्गलोक प्राप्त करके निश्चिन्त होकर आनन्द मनाती थीं, [इसके विपरीत] अन्य स्त्रियाँ नरक जाती थीं। अतः पति ही [स्त्रियोंके लिये] परम गति है। तथापि देवदेव प्रभु विष्णुकी आज्ञासे तथा उनकी मायाके कारण वे [त्रिपुरवासिनी स्त्रियाँ] अपने पतियोंका त्याग करके व्यभिचारिणी हो गयीं॥ ८५—८९ १/२ ॥<br><br>उन [विष्णु]-की आज्ञासे अलक्ष्मी तीनों पुरोंमें चली गयीं और जो लक्ष्मी उन [दैत्यों]-की तपस्याके द्वारा देवेश्वर ब्रह्मासे उन्हें प्राप्त थीं, वे [उन्हीं] प्रभु ब्रह्माके आदेशसे [त्रिपुरको] छोड़कर बाहर चली गयीं। इस प्रकार धर्मविघ्नके लिये उन दैत्योंको उस प्रकारका विष्णुमाया-निर्मित बुद्धिमोह देकर भगवान् [पुरुष] और उन स्त्रियोंको विपरीत आचरणका उपदेश देकर मायावी नारद—ये दोनों अव्यय देव निराकुल होकर सुखपूर्वक बैठ गये॥ ९०—९२ १/२ ॥<br><br>इस प्रकार परम उत्तम श्रौत-स्मार्त धर्मके नष्ट हो जानेपर, विश्वकर्ता उन विष्णुके द्वारा [वहाँ] पाखण्ड स्थापित कर दिये जानेपर, दैत्योंके द्वारा महेश्वरका त्याग कर दिये जानेपर तथा लिङ्गपूजाका परित्याग कर दिये जानेपर, सम्पूर्ण स्त्रीधर्मके नष्ट हो जानेपर और दुराचार स्थापित हो जानेपर देवेश [विष्णु] कृतार्थ हो गये और वे पुरुषोत्तम सभी देवताओंके साथ तपस्याद्वारा सर्वज्ञ उमापतिको प्राप्त करके उनकी स्तुति करने लगे॥ ९३—९५ १/२ ॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>महेश्वराय देवाय नमस्ते परमात्मने ॥ ९६<br><br>नारायणाय शर्वाय ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणे।<br>शाश्वताय ह्यनन्ताय अव्यक्ताय च ते नमः ॥ ९७ | श्रीभगवान् बोले— आप महेश्वर, देव, परमात्माको नमस्कार है। आप नारायण, शर्व, ब्रह्म, ब्रह्मरूप, शाश्वत, अनन्त तथा अव्यक्तको नमस्कार है॥ ९६-९७॥ |
| सूत उवाच<br>एवं स्तुत्वा महादेवं दण्डवत्प्रणिपत्य च।<br>जजाप रुद्रं भगवान् कोटिवारं जले स्थितः ॥ ९८<br><br>देवाश्च सर्वे ते देवं तुष्टुवुः परमेश्वरम्।<br>सेन्द्राः साध्याः सयमाः सरुद्राः समरुद्गणाः ॥ ९९ | सूतजी बोले— इस प्रकार भगवान् [विष्णु]-ने महादेवकी स्तुति करके दण्डवत् प्रणाम करके जलमें स्थित होकर एक करोड़ बार रुद्रमन्त्रका जप किया। इसके बाद वे सभी देवता इन्द्र, साध्यगण, यम, रुद्रगण |