श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ३३८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत | हिन्दी अनुवाद |
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| शास्त्रं च शास्ता सर्वेषामकरोत्कामरूपधृक्।<br>सर्वसम्मोहनं मायी दृष्टप्रत्ययसंयुतम्॥ ७४<br><br>एतत्त्वाङ्गभवायैव पुरुषायोपदिश्य तु।<br>मायी मायामयं शास्त्रं ग्रन्थषोडशलक्षकम्॥ ७५<br><br>श्रौतस्मार्तविरुद्धं च वर्णाश्रमविवर्जितम्।<br>इहैव स्वर्गनरकं प्रत्ययं नान्यथा पुनः॥ ७६<br><br>तच्छास्त्रमुपदिश्यैव पुरुषायच्युतः स्वयं।<br>पुरत्रयविनाशाय प्राहैनं पुरुषं हरिः॥ ७७<br><br>गन्तुमर्हसि नाशाय भो तूर्णं पुरवासिनाम्।<br>धर्मास्तथा प्रणश्यन्तु श्रौतस्मार्ता न संशयः॥ ७८ | लिये अपने शरीरसे मायामय पुरुषका सृजन किया। सबके शासक तथा स्वेच्छासे रूप धारण करनेवाले मायापति [विष्णु]-ने देखनेमात्रसे विश्वास उत्पन्न करनेवाले भावसे युक्त अतएव सबको मोहित करनेवाले शास्त्रका निर्माण किया। षोडशलक्षक अर्थात् अत्यन्त विस्तृत श्रुति-स्मृतिसे विरुद्ध तथा वर्णाश्रम-धर्मोंसे रहित इस मायामय शास्त्रका उपदेश अपने शरीरसे उत्पन्न पुरुषको करना चाहिए और स्वर्ग-नरक यहींपर है, ऐसा विश्वास करना चाहिये, इसके अतिरिक्त कुछ नहीं—इसे प्रतिपादित करनेवाले उस शास्त्रको उस पुरुषको स्वयं पढ़ाकर मायामय अच्युत विष्णुने तीनों पुरोंके विनाशहेतु उस पुरुषसे कहा—[हे पुरुष!] त्रिपुरवासियोंके नाशके लिये तुम शीघ्र जाओ और ऐसा प्रयत्न करो, जिससे [वहाँके] श्रौत-स्मार्त धर्म नष्ट हो जायें; इसमें संशय नहीं है॥ ७२—७८॥ |
| ततः प्रणम्य तं मायी मायाशास्त्रविशारदः।<br>प्रविश्य तत्पुरं तूर्णं मुनिर्मायां तदाकरोत्॥ ७९ | तत्पश्चात् उन्हें प्रणाम करके मायाशास्त्रविशारद मायावी मुनिने उन पुरोंमें शीघ्र प्रवेश करके माया रची॥ ७९॥ |
| मायया तस्य ते दैत्याः पुरत्रयनिवासिनः।<br>श्रौतं स्मार्तं च सन्त्यज्य तस्य शिष्यास्तदाभवन्॥ ८०<br><br>तत्यजुश्च महादेवं शङ्करं परमेश्वरम्।<br>नारदोऽपि तदा मायी नियोगान्मायिनः प्रभोः॥ ८१ | तब तीनों पुरोंमें निवास करनेवाले वे दैत्य उसकी मायाके कारण श्रौत-स्मार्त धर्मोंका त्याग करके उसके शिष्य हो गये और उन्होंने महादेव परमेश्वर शंकरको छोड़ दिया॥ ८०१/२॥ |
| प्रविश्य तत्पुरं तेन मायिना सह दीक्षितः।<br>मुनिः शिष्यैः प्रशिष्यैश्च संवृतः सर्वतः स्वयम्॥ ८२<br><br>स्त्रीधर्मं चाकरोस्त्रीणां दुश्चारफलसिद्धिदम्।<br>चक्रुस्ताः सर्वदा लब्ध्वा सद्य एव फलं स्त्रियः॥ ८३<br><br>जनासक्ता बभूवुस्ता विनिन्द्य पतिदेवताः।<br>अद्यापि गौरवात्तस्य नारदस्य कलौ मुनेः॥ ८४ | तत्पश्चात् मायामय प्रभुके आदेशसे [अपने] शिष्यों-प्रशिष्योंसे चारों ओरसे घिरे हुए मायावी नारदमुनि भी उस पुरमें प्रवेश करके उस मायावी [पुरुष]-से स्वयं दीक्षित हुए। उन्होंने स्त्रियोंको दुराचार फलकी सिद्धि देनेवाले स्त्रीधर्मका उपदेश दिया। उन स्त्रियोंने उसका सदा पालन किया और शीघ्र ही उसका फल प्राप्तकर वे अपने पतिदेवोंकी अवहेलना करके अन्य लोगोंमें आसक्त हो गयीं। उन नारदमुनिके गुरुत्वके कारण आज भी कलियुगमें अधम स्त्रियाँ पतियोंका त्याग करके व्यभिचार करती हैं॥ ८१—८४१/२॥ |
| नार्यश्चरन्ति सन्त्यज्य भर्तॄन् स्वैरं वृथाधमाः।<br>स्त्रीणां माता पिता बन्धुः सखा मित्रं च बान्धवः॥ ८५<br><br>भर्ता एव न सन्देहस्तथाप्यासहमायया।<br>कृत्वापि सुमहत्पापं या भर्तुः प्रेमसंयुता॥ ८६ | पति ही स्त्रियोंका माता-पिता, बन्धु, सखा, मित्र तथा बान्धव होता है; इसमें सन्देह नहीं है। फिर भी विष्णुकी असह मायाके कारण उन स्त्रियोंने वैसा किया। बड़ा-से-बड़ा पाप करके भी जो [स्त्री] पतिके प्रति |