भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ७१] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त ३३७

विष्णुरुवाचविष्णु बोले—
दग्ध्वा भित्त्वा च भुक्त्वा च गत्वा दैत्यपुरत्रयम्।<br>पुनर्यथागतं वीरा गन्तुमर्हथ भूतले॥ ६०हे वीरो! उस [त्रिपुर] दैत्यके तीनों पुरोंमें जाकर सभीको जलाकर, छिन्न-भिन्न करके और उनका भक्षण करके पुनः आपलोग जैसे आये हैं, वैसे ही भूतलपर चले जायँ॥ ६०॥
ततः प्रणम्य देवेशं भूतसङ्घाः पुरत्रयम्।<br>प्रविश्य नष्टास्ते सर्वे शलभा इव पावकम्॥ ६१तत्पश्चात् देवेशको प्रणाम करके तीनों पुरोंमें प्रवेश करके वे भूतगण उसी तरह नष्ट हो गये, जैसे अग्निमें प्रवेश करके शलभ (पतिंगे) नष्ट हो जाते हैं॥ ६१॥
ततस्तु नष्टास्ते सर्वे भूता देवेशवराज्ञया।<br>ननृतुर्मुदुशुश्चैव जगुर्दैत्याः सहस्त्रशः॥ ६२<br>तुष्टुवुर्देवदेवेशं परमात्मानमीश्वरम्।<br>ततः पराजिता देवा ध्वस्तवीर्याः क्षणेन तु॥ ६३<br>सेन्द्राः सङ्गम्य देवेशमुपेन्द्रं धिष्ठिता भयात्।<br>तान् दृष्ट्वा चिन्तयामास भगवान् पुरुषोत्तमः॥ ६४<br>किं कृत्यमिति सन्तप्तः सन्तप्तान् सेन्द्रकान् क्षणम्।<br>कथं तु तेषां दैत्यानां बलं हत्वा प्रयत्नतः॥ ६५<br>देवकार्यं करिष्यामि प्रसादात्परमेष्ठिनः।<br>पापं विचारतो नास्ति धर्मिष्ठानां न संशयः॥ ६६<br>तस्माद्दैत्या न वध्यास्ते भूतैश्चोपसदोद्भवैः।<br>पापं नुदति धर्मेण धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ ६७<br>धर्मादैश्वर्यमित्येषा श्रुतिरेषा सनातनी।<br>दैत्याश्चैते हि धर्मिष्ठाः सर्वे त्रिपुरवासिनः॥ ६८<br>तस्मादवध्यतां प्राप्ता नान्यथा द्विजपुङ्गवाः।<br>कृत्वापि सुमहत्पापं रुद्रमभ्यर्चयन्ति ये॥ ६९<br>मुच्यन्ते पातकैः सर्वैः पद्मपत्रमिवाम्भसा।<br>पूजया भोगसम्पत्तिरवश्यं जायते द्विजाः॥ ७०<br>तस्मात्ते भोगिनो दैत्या लिङ्गार्चनपरायणाः।<br>तस्मात्कृत्वा धर्मविघ्नमहं देवाः स्वमायया॥ ७१<br>दैत्यानां देवकार्यार्थं जेष्येऽहं त्रिपुरं क्षणात्।तब देवेश्वरकी आज्ञासे उन सभी भूतोंके नष्ट हो जानेपर हजारों दैत्य आनन्द मनाने लगे, नाचने-गाने लगे और देवेश परमात्मा ईश्वरकी स्तुति करने लगे॥ ६२ १/२॥<br><br>तदनन्तर क्षणभरमें पराजित तथा नष्ट पराक्रमवाले इन्द्रसहित देवतागण देवेश विष्णुके पास पहुँचकर भयपूर्वक खड़े हो गये। तब इन्द्रसहित उन सन्तप्त देवताओंको देखकर भगवान् पुरुषोत्तम उस समय दुःखी होकर सोचने लगे—क्या किया जाना चाहिये? प्रयत्नपूर्वक उन दैत्योंका बल नष्ट करके मैं कैसे देवताओंका कार्य करूँगा? विचारपूर्वक देखा जाय, तो शिवकी कृपासे उन धर्मनिष्ठ दैत्योंमें पाप नहीं है, अतः वे दैत्य उपसद [नामक] यज्ञसे उत्पन्न भूतोंके द्वारा वध्य नहीं हैं। धर्मसे ही पाप नष्ट होता है; सब कुछ धर्ममें ही प्रतिष्ठित है। धर्मसे ऐश्वर्य प्राप्त होता है—यह सनातनी श्रुति है। [सूतजीने कहा—] हे द्विजश्रेष्ठो! तीनों पुरोंमें निवास करनेवाले वे सभी दैत्य धर्मनिष्ठ थे, अर्थात् अनुष्ठानमें तत्पर थे। अतः वे अवध्यताको प्राप्त हो गये थे; इसमें सन्देह नहीं है। बहुत बड़ा पाप करके भी जो लोग रुद्रका अर्चन करते हैं, वे सभी पापोंसे मुक्त हो जाते हैं; जैसे जलसे कमल मुक्त रहता है। हे द्विजो! शिवकी पूजासे भोगसम्पदा अवश्य प्राप्त होती है; वे दैत्य लिङ्ग-पूजामें परायण हैं, अतः वे भोगोंसे युक्त हैं। [विष्णुने कहा—] हे देवताओ! इसलिये मैं देवताओंके कार्यके लिये अपनी मायासे दैत्योंके धर्म (अनुष्ठान)-में विघ्न डालकर क्षणभरमें तीनों पुरोंको जीत लूँगा॥ ६३—७१ १/२॥
सूत उवाचसूतजी बोले—
विचार्यैवं ततस्तेषां भगवान् पुरुषोत्तमः।<br>कर्तुं व्यवसितश्चाभूद्धर्मविघ्नं सुरारिणाम्॥ ७२<br>असृजच्च महातेजाः पुरुषं चात्मसम्भवम्।<br>मायी मायामयं तेषां धर्मविघ्नार्थमच्युतः॥ ७३ऐसा विचार करके भगवान् पुरुषोत्तम उन देवशत्रुओं (दैत्यों)-के धर्ममें विघ्न उत्पन्न करनेके लिये प्रवृत्त हुए। महातेजस्वी मायावी अच्युतने उनके धर्मविघ्नके