श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३३६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| असुरा दुर्मदाः पापा अपि देवैर्महाबलैः।<br>तस्मान्न वध्या रुद्रस्य प्रभावात्परमेष्ठिनः॥ ४९<br><br>कोऽहं ब्रह्माथवा देवा दैत्या देवारिसूंदनाः।<br>मुनयश्च महात्मानः प्रसादेन विना प्रभोः॥ ५० | चाहिये; इसमें सन्देह नहीं है। हे श्रेष्ठ देवताओ! पापी होते हुए भी दुर्मद असुर महाबली देवताओंके द्वारा वध्य कैसे हो सकते हैं? क्योंकि परमेष्ठी रुद्रके प्रभावके कारण वे वध्य नहीं हैं। हे देवताओ! प्रभु [शिव]-की कृपाके बिना मैं कौन हूँ, ब्रह्मा कौन हैं, दैत्य कौन हैं, देवशत्रुओंके विनाशक कौन हैं और महात्मा मुनिगण कौन हैं?॥ ४८-५०॥ | | यः सप्तविंशको नित्यः परात्परतरः प्रभुः।<br>विश्वामरेश्वरो वन्द्यो विश्वाधारो महेश्वरः॥ ५१<br><br>स एव सर्वदेवेशः सर्वेषामपि शङ्करः।<br>लीलया देवदैत्येन्द्रविभागमकरोद्धरः॥ ५२ | जो सत्ताईस तत्त्वोंसे युक्त, शाश्वत, महान्से भी महत्तर, प्रभुतासम्पन्न, सम्पूर्ण देवताओंके स्वामी, वन्दनीय, विश्वके आधार, महेश्वर, सर्वदेवेश तथा सबके स्वामी हैं; उन हर शंकरने ही [अपनी] लीलासे देवताओं एवं दैत्योंका विभाजन किया है॥ ५१-५२॥ | | तस्यांशमेकं सम्पूज्य देवा देवत्वमागताः।<br>ब्रह्मा ब्रह्मत्वमापन्नो ह्यहं विष्णुत्वमेव च॥ ५३<br><br>तमपूज्य जगत्यस्मिन् कः पुमान् सिद्धिमिच्छति।<br>तस्मात्तेनैव हन्तव्या लिङ्गार्चनविधेर्बलात्॥ ५४<br><br>धर्मनिष्ठाश्च ते सर्वे श्रौतस्मार्तविधौ स्थिताः।<br>तथापि यजमानेन रौद्रेणोपसदा प्रभुम्।<br>रुद्रमिष्ट्वा यथान्यायं जेष्यामो दैत्यसत्तमान्॥ ५५<br><br>सतारकाक्षेण मयेन गुप्तं<br>स्वस्थं च गुप्तं स्फटिकाभमेकम्।<br>को नाम हन्तुं त्रिपुरं समर्थो<br>मुक्त्वा त्रिनेत्रं भगवन्तमेकम्॥ ५६ | उनके एक अंश (लिङ्गरूप)-की पूजा करके देवताओंने देवत्व प्राप्त किया है, ब्रह्माने ब्रह्मत्व प्राप्त किया है और मुझ विष्णुने विष्णुत्व प्राप्त किया है। उनकी पूजा किये बिना इस जगत्में कौन व्यक्ति सिद्धि प्राप्त कर सकता है? अतः लिङ्गार्चनविधिके प्रभावसे उन्हींके द्वारा वे दैत्य हन्तव्य हैं। यद्यपि वे सभी [दैत्य] धर्मनिष्ठ हैं तथा श्रौत-स्मार्तविधानमें स्थित हैं, फिर भी उपसद नामक रुद्रयज्ञसे यजमानके द्वारा विधिपूर्वक प्रभु रुद्रका यजन करके हमलोग महादैत्योंको जीत सकेंगे। एकमात्र त्रिनेत्र भगवान् [शिव]-को छोड़कर तारकाक्षसहित [दानव] मयके द्वारा सुरक्षित, स्वस्थ, गुप्त तथा स्फटिकके समान आभावाले तीनों पुरोंको नष्ट करनेमें भला कौन समर्थ है?॥ ५३-५६॥ | | सूत उवाच<br>एवमुक्त्वा हरिश्चेष्ट्वा यज्ञेनोपसदा प्रभुम्।<br>उपविष्टो ददर्शाथ भूतसङ्घान् सहस्रशः॥ ५७<br><br>शूलशक्तिगदाहस्तान् टङ्कोपलशिलायुधान्।<br>नानाप्रहरणोपेतान्नानावेषधरांस्तदा ॥ ५८<br><br>कालाग्निरुद्रसङ्काशान् कालरुद्रोपमांस्तदा।<br>प्राह देवो हरिः साक्षात्प्रणिपत्य स्थितान् प्रभुः॥ ५९ | सूतजी बोले— इस प्रकार उपसद [नामक] यज्ञके द्वारा प्रभु [शिव]-का यजन करके बैठे हुए विष्णुने हजारों भूतसमुदायोंको देखा। तब शूल-शक्ति-गदासे युक्त हाथोंवाले, टंक-उपल-शिलाको आयुधके रूपमें धारण किये हुए, अनेक प्रकारके प्रहारयोग्य अस्त्रोंसे समन्वित, अनेक वेषोंको धारण किये हुए, कालाग्नि रुद्रके समान प्रतीत होनेवाले तथा कालरुद्रके सदृश उन उपस्थित भूतोंको प्रणाम करके साक्षात् प्रभु विष्णुदेव कहने लगे॥ ५७-५९॥ |