भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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अध्याय ७१ ] तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त ३३५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
रविमरुदमरेन्द्रसन्निकाशैः<br>सुरमथनैः सुदृढैः सुसेवितं तत् ॥ ३७सदा युद्धपरायण, भलीभाँति शिवके चरणोंकी पूजाके द्वारा प्राप्त पराक्रमवाले, सूर्य-वायु-इन्द्रसदृश, देवताओंका दमन करनेवाले तथा अत्यन्त दृढ़ दैत्योंसे सेवित थे॥ २५-३७॥
सेन्द्रा देवा द्विजश्रेष्ठा द्रुमा दावाग्निना यथा।<br>पुरत्रयाग्निना दग्धा ह्यभवन् दैत्यवैभवात् ॥ ३८हे द्विजश्रेष्ठो! दैत्योंके वैभवके कारण तीनों पुरोंकी अग्निसे इन्द्रसहित देवतागण उसी प्रकार दग्ध हो गये, जैसे दावाग्निसे वृक्ष दग्ध हो जाते हैं॥ ३८॥
अथैवं ते तदा दग्धा देवा देवेश्वरं हरिम्।<br>अभिवन्द्य तदा प्राहुस्तमप्रतिमवर्चसम् ॥ ३९इस प्रकार उन दग्ध देवताओंने अतुलनीय तेजवाले देवेश्वर विष्णुको प्रणाम करके उनको [यह सब] बताया॥ ३९॥
सोऽपि नारायणः श्रीमान् चिन्तयामास चेतसा।<br>किं कार्यं देवकार्येषु भगवानिति स प्रभुः ॥ ४०<br><br>तदा सस्मार वै यज्ञं यज्ञमूर्तिर्जनार्दनः।<br>यज्वा यज्ञभुगीशानो यज्वनां फलदः प्रभुः ॥ ४१तब उन श्रीमान् प्रभु भगवान् नारायणने मनमें सोचा कि देवताओंके कार्यके विषयमें क्या किया जाना चाहिये। इसके बाद यज्ञभोक्ता, यज्ञकर्ता, यज्ञकर्ताओंको फल प्रदान करनेवाले तथा यज्ञमूर्ति प्रभु जनार्दनने यज्ञदेवका स्मरण किया॥ ४०-४१॥
ततो यज्ञः स्मृतस्तेन देवकार्यार्थसिद्धये।<br>देवं ते पुरुषं चैव प्रणेमुस्तुष्टुवुस्तदा ॥ ४२<br><br>भगवानपि तं दृष्ट्वा यज्ञं प्राह सनातनम्।<br>सनातनस्तदा सेन्द्रान् देवानालोक्य चाच्युतः ॥ ४३तदनन्तर देवताओंके कार्यकी सिद्धिके लिये उनके द्वारा स्मरण किये गये यज्ञदेव उपस्थित हुए। तब उन देवताओंने यज्ञदेवको प्रणाम किया और उनकी स्तुति की। इसके बाद सनातन यज्ञको देखकर पुनः इन्द्रसहित देवताओंकी ओर देखकर सनातन भगवान् अच्युत (विष्णु) उनसे कहने लगे॥ ४२-४३॥
श्रीविष्णुरुवाच<br>अनेनोपसदा देवा यजध्वं परमेश्वरम्।<br>पुरत्रयविनाशाय जगत्त्रयविभूतये ॥ ४४श्रीविष्णु बोले—हे देवताओ! तीनों पुरोंके विनाशके लिये तथा तीनों लोकोंकी समृद्धिके लिये इन [उपस्थित] उपसद नामक यज्ञके द्वारा परमेश्वरका यजन कीजिये॥ ४४॥
सूत उवाच<br>अथ तस्य वचः श्रुत्वा देवदेवस्य धीमतः।<br>सिंहनादं महत्कृत्वा यज्ञेशं तुष्टुवुः सुराः ॥ ४५सूतजी बोले—उन बुद्धिमान् देवदेवका वचन सुनकर महान् सिंहनाद करके देवतागण [उन] यज्ञेशकी स्तुति करने लगे॥ ४५॥
ततः सञ्चिन्त्य भगवान् स्वयमेव जनार्दनः।<br>पुनः प्राह स सर्वांस्तांस्त्रिदशांस्त्रिदशेश्वरः ॥ ४६<br><br>हत्वा दग्ध्वा च भूतानि भुक्त्वा चान्यायतोऽपि वा।<br>यजेद्यदि महादेवमपापो नात्र संशयः ॥ ४७इसके बाद स्वयं विचार करके देवताओंके स्वामी वे भगवान् जनार्दन पुनः सभी देवताओंसे बोले—प्राणियोंको मारकर तथा जलाकर और अन्यायपूर्वक भोग-विलास करके भी यदि कोई महादेवकी पूजा करे, तो वह पापरहित हो जाता है, इसमें सन्देह नहीं है॥ ४६-४७॥
अपापा नैव हन्तव्याः पापा एव न संशयः।<br>हन्तव्याः सर्वयत्नेन कथं वध्याः सुरोत्तमाः ॥ ४८'निष्पाप लोगोंकी हत्या नहीं की जानी चाहिये; केवल पापियोंकी ही हत्या पूर्णप्रयत्नसे की जानी