भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 336
३३४श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
श्लोक (संस्कृत)हिन्दी-अनुवाद
रहा करता था॥ १८–२२॥
एवं बभूवुर्दैत्यानामतिदुर्गाणि सुव्रताः।<br>पुराणि त्रीणि विप्रेन्द्रास्त्रैलोक्यमिव चापरम्॥ २३<br>पुरत्रये तदा जाते सर्वे दैत्या जगत्त्रये।<br>पुरत्रयं प्रविश्यैव बभूवुस्ते बलाधिकाः॥ २४हे सुव्रतो! हे विप्रेन्द्रो! इस प्रकार दैत्योंके सुदृढ़ किलोंसे युक्त वे तीनों पुर दूसरे त्रिलोकीके समान थे। तब तीनों पुरोंके [निर्मित] हो जानेपर वे सभी दैत्य उन तीनों पुरोंमें प्रवेश करके तीनों लोकोंमें अत्यधिक बलशाली हो गये॥ २३-२४॥
कल्पद्रुमसमाकीर्णं गजवाजिसमाकुलम्।<br>नानाप्रासादसङ्कीर्णं मणिजालैः समावृतम्॥ २५<br>सूर्यमण्डलसङ्काशैर्विमानैर्विश्वतोमुखैः।<br>पद्मरागमयैः शुभ्रैः शोभितं चन्द्रसन्निभैः॥ २६<br>प्रासादैर्गोपुरैर्दिव्यैः कैलासशिखरोपमैः।<br>शोभितं त्रिपुरं तेषां पृथक्पृथगनुत्तमैः॥ २७<br>दिव्यस्त्रीभिः सुसम्पूर्णं गन्धर्वैः सिद्धचारणैः।<br>रुद्रालयैः प्रतिगृहं साग्निहोत्रैर्द्विजोत्तमाः॥ २८उनके तीनों पुर कल्पवृक्षोंसे भरे हुए, हाथी-घोड़ोंसे परिपूर्ण, अनेक भवनोंसे सुशोभित, मणियोंके जालोंसे घिरे हुए, सभी ओर द्वारोंवाले, सूर्यमण्डलसदृश विमानोंसे युक्त, पद्मरागमय चन्द्रसदृश उज्ज्वल महलोंसे सुशोभित और कैलासशिखरके समान दिव्य तथा अत्युत्तम फाटकोंसे पृथक्-पृथक् मण्डित थे। हे श्रेष्ठ द्विजो! वे पुर दिव्य स्त्रियों, गन्धर्वों, सिद्धों एवं चारणोंसे भरे हुए थे। प्रत्येक घरमें रुद्रालय थे और अग्निहोत्र होता था।
वापीकूपतडागैश्च दीर्घिकाभिस्तु सर्वतः।<br>मत्तमातङ्गयूथैश्च तुरङ्गैश्च सुशोभनैः॥ २९<br>रथैश्च विविधाकारैर्विचित्रैर्विश्वतोमुखैः।<br>सभाप्रपादिभिश्चैव क्रीडास्थानैः पृथक् पृथक्॥ ३०<br>वेदाध्ययनशालाभिर्विविधाभिः समन्ततः।<br>अधृष्यं मनसाप्यन्यैर्मयस्यैव च मायया॥ ३१वे पुर सभी ओर बावलियों, कुओं, तालाबों और बड़ी-बड़ी झीलोंसे युक्त थे; मत्त हाथियोंके झुण्डों, अति सुन्दर घोड़ों, चारों ओर मुखवाले अनेक प्रकारके अद्भुत रथों, सभाभवनों, पानीय (जल)-की शालाओं तथा क्रीड़ास्थलोंसे पृथक्-पृथक् समन्वित थे। वे पुर चारों ओर अनेकविध वेदाध्ययनशालाओंसे युक्त थे और मय [दानव]-की मायासे अन्य लोगोंद्वारा मनसे भी अलंघ्य थे।
पतिव्रताभिः सर्वत्र सेवितं मुनिपुङ्गवाः।<br>कृत्वापि सुमहत्पापमपापैः शङ्करार्चनात्॥ ३२<br>दैत्येश्वरैर्महाभागैः सदारैः ससुतैर्द्विजाः।<br>श्रौतस्मार्तार्थधर्मज्ञैस्तद्धर्मनिरतैः सदा॥ ३३<br>महादेवेतरं त्यक्त्वा देवं तस्यार्चनं स्थितैः।<br>व्यूढोरस्कैर्वृषस्कन्धैः सर्वायुधधरैः सदा॥ ३४<br>सर्वदा क्षुधितैश्चैव दावाग्निसदृशेक्षणैः।<br>प्रशान्तैः कुपितैश्चैव कुब्जैर्वामनकैस्तथा॥ ३५<br>नीलोत्पलदलप्रख्यैर्नीलकुञ्चितमूर्धजैः।<br>नीलाद्रिमेरुसङ्काशैर्नीरदोपमनिःस्वनैः।<br>मयेन रक्षितैः सर्वैः शिक्षितैर्युद्धलालसैः॥ ३६हे मुनिश्रेष्ठो! वे पुर सर्वत्र पतिव्रता स्त्रियोंके द्वारा सेवित थे। हे द्विजो! वे पुर बड़े-बड़े पाप करके भी शंकरजीकी पूजाके कारण पापरहित, श्रौत-स्मार्त धर्मोंके ज्ञाता तथा अपने धर्मके प्रति परायण भार्यासहित महाभाग्यशाली दैत्योंसे सदा समन्वित थे; महादेवके अतिरिक्त अन्य देवताको छोड़कर उन [शिव]-के अर्चनमें स्थित, चौड़ी छातीवाले, बैलके समान कंधेवाले, सर्वदा समस्त आयुध धारण करनेवाले, सदा उपवास करनेवाले, दावानलके समान नेत्रोंवाले, उनमें कुछ शान्त तथा कुछ कुपित, कुबड़े, बौने, नील कमलदलकी आभाके सदृश, काले एवं घुँघराले बालोंवाले, नीलपर्वत तथा मेरुके समान प्रतीत होनेवाले, मेघके समान गर्जन करनेवाले, मयके द्वारा रक्षित तथा शिक्षित और युद्धकी तीव्र इच्छावाले दैत्योंसे परिपूर्ण थे। इस प्रकार वे पुर
अथ समररतैः सदासमन्ता-<br>च्छिवपदपूजनया सुलब्धवीर्यैः।
श्रीलिंगमहापुराण · पृष्ठ 336, कुल 834 में से · BharatKosha