श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| अध्याय ७१ ] | तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त | ३३३ |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| नास्ति सर्वामरत्वं वै निवर्तध्वमतोऽसुराः।<br>अन्यं वरं वृणीध्वं वै यादृशं सम्प्ररोचते॥ १३ | देव ब्रह्माने उनसे कहा—'हे असुरो! सभीको अमरत्व नहीं हुआ करता, अतः इसे छोड़ो और दूसरा वर माँगो, जो तुमलोगोंको अच्छा लगता हो'॥ ११—१३॥ |
| ततस्ते सहिता दैत्याः सम्प्रधार्य परस्परम्।<br>ब्रह्माणमब्रुवन् दैत्याः प्रणिपत्य जगद्गुरुम्॥ १४<br><br>वयं पुराणि त्रीण्येव समास्थाय महीमिमाम्।<br>विचरिष्याम लोकेश त्वत्प्रसादाज्जगद्गुरो॥ १५<br><br>तथा वर्षसहस्रेषु समेष्यामः परस्परम्।<br>एकीभावं गमिष्यन्ति पुराण्येतानि चानघ॥ १६<br><br>समागतानि चैतानि यो हन्याद्भगवंस्तदा।<br>एकेनैवेषुणा देवः स नो मृत्युर्भविष्यति॥ १७ | तदनन्तर उन दैत्योंने मिलकर आपसमें विचार करके जगद्गुरु ब्रह्माको प्रणाम करके कहा—हे लोकेश! हे जगद्गुरो! तीन पुर स्थापित करके हमलोग आपकी कृपासे इस पृथ्वीपर विचरण करें। हमलोग एक हजार वर्षमें आपसमें मिलें और हे अनघ! ये तीनों पुर एकीभावको प्राप्त हों। हे भगवन्! जो इन इकट्ठे हुए पुरोंको एक ही बाणसे नष्ट कर दे, वह देव हमलोगोंका मृत्युस्वरूप हो॥ १४—१७॥ |
| एवमस्त्विति तान् देवः प्रत्युक्त्वा प्राविशद्दिवम्।<br>ततो मयः स्वतपसा चक्रे वीरः पुराण्यथ॥ १८<br><br>काञ्चनं दिवि तत्रासीदन्तरिक्षे च राजतम्।<br>आयसं चाभवद्भूमौ पुरं तेषां महात्मनाम्॥ १९<br><br>एकैकं योजनशतं विस्तारायामतः समम्।<br>काञ्चनं तारकाक्षस्य कमलाक्षस्य राजतम्॥ २०<br><br>विद्युन्मालेश्चायसं वै त्रिविधं दुर्गमुत्तमम्।<br>मयश्च बलवांस्तत्र दैत्यदानवपूजितः॥ २१<br><br>हैरण्ये राजते चैव कृष्णायासमये तथा।<br>आलयं चात्मनः कृत्वा तत्रास्ते बलवांस्तदा॥ २२ | 'ऐसा ही हो'—उनसे यह कहकर ब्रह्मदेव स्वर्गलोक चले गये। इसके बाद वीर [दानव] मयने अपनी तपस्याके द्वारा तीन पुरोंका निर्माण किया। उन महात्माओंका सुवर्णमय पुर स्वर्गमें, रजत (चाँदी)-मय पुर अन्तरिक्षमें तथा लौहमय पुर पृथ्वीपर था। उनमेंसे प्रत्येक पुर लम्बाई तथा चौड़ाईमें एक सौ योजनवाला और एक समान था। सोनेका पुर तारकाक्षका, चाँदीका पुर कमलाक्षका और लोहेका पुर विद्युन्मालीका था; तीनों प्रकारके दुर्ग उत्तम थे। बलशाली मय दैत्यों तथा दानवोंसे पूजित था; वह बलवान् मय वहाँ स्वर्णमय, रजतमय एवं काले लौहमय पुरमें अपना भवन बनाकर |