भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३३२श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग

इकहत्तरवाँ अध्याय

तारकासुरके पुत्रों—विद्युन्माली, तारकाक्ष तथा कमलाक्षका वृत्तान्त एवं तपस्याद्वारा इन्हें कामचारी तीन पुरोंकी प्राप्ति, त्रिपुरासुरके विनाशके लिये देवताओंका उद्योग तथा भगवान् शंकरका उनपर अनुग्रह

ऋषय ऊचुःऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] आपने संक्षेपमें
समासाद्विस्तराच्चैव सर्गः प्रोक्तस्त्वया शुभः।<br>कथं पशुपतिश्चासीत्पुरं दग्धुं महेश्वरः॥ १तथा विस्तारसे शुभ सर्गका निरूपण कर दिया। पशुपति महेश्वरने पुरको कैसे दग्ध किया और ब्रह्मासहित सभी
कथं च पशवश्चासन् देवाः सब्रह्मकाः प्रभोः।<br>मयस्य तपसा पूर्वं सुदुर्गं निर्मितं पुरम्॥ २देवता प्रभुके पशु कैसे हो गये? मयकी तपस्याके द्वारा पूर्वकालमें उत्तम दुर्गमय पुर निर्मित किया गया था।
हैमं च रजतं दिव्यमयस्मयमनुत्तमम्।<br>सुदुर्गं देवदेवेन दग्धमित्येव नः श्रुतम्॥ ३हमने सुना है कि देवदेव [शिव]-ने सोने, चाँदी तथा लोहेसे निर्मित दिव्य, उत्तम तथा सुन्दर दुर्गको जला
कथं ददाह भगवान् भगनेत्रनिपातनः।<br>एकेनेषुनिपातेन दिव्येनापि तदा कथम्॥ ४दिया था। भगके नेत्रका नाश करनेवाले भगवान् शिवने केवल एक बाणके प्रक्षेपसे उसे कैसे जला दिया और
विष्णुनोत्पादितैर्भूतैर्न दग्धं तत्पुरत्रयम्।<br>पुरस्य सम्भवः सर्वो वरलाभः पुरा श्रुतः॥ ५विष्णुके द्वारा उत्पन्न किये गये भूतगण उन तीनों पुरोंको क्यों नहीं जला सके? हमलोगोंने [उस] पुरकी उत्पत्ति
इदानीं दहनं सर्वं वक्तुमर्हसि सुव्रत।<br>तेषां तद्वचनं श्रुत्वा सूतः पौराणिकोत्तमः॥ ६तथा सम्पूर्ण वरप्राप्तिके विषयमें पहले ही सुन लिया है; अब हे सुव्रत! [पुरके] दहनके विषयमें पूर्णरूपसे बतानेकी कृपा कीजिये॥ १—५ १/२॥
यथा श्रुतं तथा प्राह व्यासाद्विश्वार्थसूचकात्।तब उनका वचन सुनकर पौराणिकोंमें उत्तम सूतजीने समस्त अर्थोंके सूचक व्यासजीसे [इस विषयमें] जैसा सुना था, उसे बताया॥ ६ १/२॥
सूत उवाचसूतजी बोले— [हे ऋषियो!] इस त्रिलोकीके
त्रैलोक्यस्यास्य शापाद्वि मनोवाक्कायसम्भवात्॥ ७मन-वाणी-शरीरजन्य शापके कारण स्कन्द (कार्तिकेय)-
निहते तारके दैत्ये तारपुत्रे सबान्धवे।<br>स्कन्देन वा प्रयत्नेन तस्य पुत्रा महाबलाः॥ ८के द्वारा प्रयत्नपूर्वक बान्धवोंसहित तारपुत्र दैत्य तारकके मार दिये जानेपर उसके महाबली पुत्रों विद्युन्माली,
विद्युन्माली तारकाक्षः कमलाक्षश्च वीर्यवान्।<br>तपस्तेपुर्महात्मानो महाबलपराक्रमाः॥ ९तारकाक्ष तथा पराक्रमी कमलाक्षने तप किया। महान् बल तथा पराक्रमवाले वे महात्मा कठोर तपमें लीन
तप उग्रं समास्थाय नियमे परमे स्थिताः।<br>तपसा कर्शयामासुर्देहान् स्वान् दानवोत्त्माः॥ १०होकर परम नियममें स्थित थे। उन श्रेष्ठ दानवोंने तपस्याके द्वारा अपने शरीरोंको दुर्बल बना दिया। तब
तेषां पितामहः प्रीतो वरदः प्रददौ वरम्।उनपर प्रसन्न होकर वरदाता ब्रह्माजीने उन्हें वर प्रदान किया॥ ७—१० १/२॥
दैत्या ऊचुःदैत्य बोले— 'सभी प्राणियोंसे सर्वदा हम सभीका
अवध्यत्वं च सर्वेषां सर्वभूतेषु सर्वदा॥ ११अवध्यत्व हो'—उन सभीने एक साथ सभी लोकोंके
सहिता वरयामासुः सर्वलोकपितामहम्।<br>तानब्रवीत्तदा देवो लोकानां प्रभुरव्ययः॥ १२पितामहसे यह वर माँगा। तब लोकोंके स्वामी अव्यय