श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ७०] महेश्वरसे होनेवाली आदिसृष्टिका स्वरूप··· सतीकी देहसे अनेक देवियोंका प्रादुर्भाव ३३१
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| स्वाहा स्वधा महाविद्या मेधा लक्ष्मीः सरस्वती।<br>सती दाक्षायणी विद्या इच्छा शक्तिः क्रियात्मिका॥ ३३०<br>अपर्णा चैकपर्णा च तथा चैवैकपाटला।<br>उमा हैमवती चैव कल्याणी चैकमातृका॥ ३३१<br>ख्यातिः प्रज्ञा महाभागा लोके गौरिति विश्रुता।<br>गणाम्बिका महादेवी नन्दिनी जातवेदसी॥ ३३२<br>एकरूपमथैतस्याः पृथग्देहविभावनात्।<br>सावित्री वरदा पुण्या पावनी लोकविश्रुता॥ ३३३<br>आज्ञा आवेशनी कृष्णा तामसी सात्त्विकी शिवा।<br>प्रकृतिर्विकृता रौद्री दुर्गा भद्रा प्रमाथिनी॥ ३३४<br>कालरात्रिर्महामाया रेवती भूतनायिका।<br>द्वापरान्तविभागे च नामानीमानि सुव्रताः॥ ३३५<br>गौतमी कौशिकी चार्या चण्डी कात्यायनी सती।<br>कुमारी यादवी देवी वरदा कृष्णपिङ्गला॥ ३३६<br>बर्हिध्वजा शूलधरा परमा ब्रह्मचारिणी।<br>महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी दृषद्वत्येकशूलधृक्॥ ३३७<br>अपराजिता बहुभुजा प्रगल्भा सिंहवाहिनी।<br>शुम्भादिदैत्यहन्त्री च महामहिषमर्दिनी॥ ३३८<br>अमोघा विन्ध्यनिलया विक्रान्ता गणनायिका।<br>देव्या नामविकाराणि इत्येतानि यथाक्रमम्॥ ३३९<br>भद्रकाल्या मयोक्तानि सम्यक्फलप्रदानि च।<br>ये पठन्ति नरास्तेषां विद्यते न च पातकम्॥ ३४०<br>अरण्ये पर्वते वापि पुरे वाप्यथवा गृहे।<br>रक्षामेतां प्रयुञ्जीत जले वाथ स्थलेऽपि वा॥ ३४१<br>व्याघ्रकुम्भीनचोरेभ्यो भयस्थाने विशेषतः।<br>आपत्स्वपि च सर्वासु देव्या नामानि कीर्तयेत्॥ ३४२<br>आर्यकग्रहभूतैश्च पूतनामातृभिस्तथा।<br>अभ्यर्दितानां बालानां रक्षामेतां प्रयोजयेत्॥ ३४३ | स्वाहा, स्वधा, महाविद्या, मेधा, लक्ष्मी, सरस्वती, सती, दाक्षायणी, विद्या, इच्छा, शक्ति, क्रियात्मिका, अपर्णा, एकपर्णा, एकपाटला, उमा, हैमवती, कल्याणी, एकमात्रुका, ख्याति, प्रज्ञा, महाभागा, लोकप्रसिद्ध गौरी, गणाम्बिका, महादेवी, नन्दिनी तथा जातवेदसी—ये नाम हैं। पृथक् देह धारण करनेसे पहले इनका एक ही रूप था। सावित्री, वरदा, पुण्या, पावनी, लोकविश्रुता, आज्ञा, आवेशनी, कृष्णा, तामसी, सात्त्विकी, शिवा, प्रकृति, विकृता, रौद्री, दुर्गा, भद्रा, प्रमाथिनी, कालरात्रि, महामाया, रेवती, भूतनायिका—हे सुव्रतो! द्वापरयुगके अन्तमें ये उनके नाम हुए। इसी प्रकार गौतमी, कौशिकी, आर्या, चण्डी, कात्यायनी, सती, कुमारी, यादवी, देवी, वरदा, कृष्णपिंगला, बर्हिध्वजा, शूलधरा, परमा, ब्रह्मचारिणी, महेन्द्रोपेन्द्रभगिनी, दृषद्वती, एकशूलधृक्, अपराजिता, बहुभुजा, प्रगल्भा, सिंहवाहिनी, शुम्भादिदैत्यहन्त्री, महामहिषमर्दिनी, अमोघा, विन्ध्यनिलया, विक्रान्ता, गणनायिका—मैंने देवी भद्रकालीके इन नामविकारोंको यथाक्रम बता दिया, जो सम्यक् फल प्रदान करनेवाले हैं। जो लोग इनका पाठ करते हैं, उनका पाप शेष नहीं रह जाता है। जंगलमें, पर्वतपर, नगरमें, घरमें, जल अथवा स्थल कहीं भी रक्षाके लिये इनका प्रयोग करना चाहिये। विशेष रूपसे बाघ, हाथी तथा चोरोंसे भयके स्थानमें और सभी प्रकारकी विपत्तियोंमें देवीके नामोंको पढ़ना चाहिये। बुरे ग्रहों, भूतों, पूतना तथा मातृगणोंसे पीड़ित शिशुओंकी रक्षाके लिये इन नामोंका प्रयोग करना चाहिये॥ ३३०—३४३॥ |
| महादेवी कले द्वे तु प्रज्ञा श्रीश्च प्रकीर्तिते।<br>आभ्यां देवीसहस्त्राणि यैर्व्याप्तमखिलं जगत्॥ ३४४<br>अनया देवदेवोऽसौ सत्या रुद्रो महेश्वरः।<br>आतिष्ठत्सर्वलोकानां हिताय परमेश्वरः॥ ३४५<br>रुद्रः पशुपतिश्चासीत्पुरा दग्धं पुरत्रयम्।<br>देवाश्च पशवः सर्वे बभूवुस्तस्य तेजसा॥ ३४६<br>यः पठेच्छृणुयाद्वापि आदिसर्गक्रमं शुभम्।<br>स याति ब्रह्मणो लोकं श्रावयेद्वा द्विजोत्तमान्॥ ३४७ | 'प्रज्ञा' तथा 'श्री'—ये महादेवीकी दो कलाएँ कही गयी हैं। इन दोनोंसे हजारों देवियाँ उत्पन्न हुई हैं, जिनके द्वारा सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है। देवदेव महेश्वर परमेश्वर रुद्र सभी लोकोंके हितके लिये इन सतीके साथ [सर्वदा] विद्यमान रहते हैं। रुद्र पशुपति हैं। इन्होंने ही पूर्वकालमें त्रिपुरको दग्ध किया था। उन्हींके तेजसे सभी देवता पशु [जीव] हुए। जो [व्यक्ति] आदिसृष्टिके शुभ क्रमको पढ़ता है अथवा सुनता है अथवा उत्तम द्विजोंको सुनाता है, वह ब्रह्मलोकको जाता है॥ ३४४—३४७॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे सृष्टिबिस्तारो नाम सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'सृष्टिविस्तार' नामक सत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ७०॥