श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ३७६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| ज्ञानयोगं समासाद्य गाणपत्यमवाप्नुयात्।<br>नीलाद्रिशिखराख्यं वा प्रासादं यः सुशोभनम्॥ १६<br>कृत्वा वित्तानुसारेण भक्त्या रुद्राय शम्भवे।<br>यत्फलं लभते मर्त्यस्तत्फलं प्रवदाम्यहम्॥ १७<br>हिमशैले कृते भक्त्या यत्फलं प्राक्तवोदितम्।<br>तत्फलं सकलं लब्ध्वा सर्वदेवनमस्कृतः॥ १८<br>रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रैः सार्धं प्रमोदते।<br>महेन्द्रशैलनामानं प्रासादं रुद्रसम्मतम्॥ १९ | विमानोंसे दिव्य शिवलोक पहुँचकर ज्ञानयोग प्राप्त करके गणाधिपति पद प्राप्त करता है॥ १५ १/२॥<br>जो मनुष्य अपने सामर्थ्यके अनुसार रुद्र शिवके लिये भक्तिपूर्वक नीलाद्रिशिखर नामक परम सुन्दर शिवालय बनाता है, वह जो फल प्राप्त करता है, उसे मैं बता रहा हूँ। भक्तिपूर्वक हिमशैल [नामक शिवालय]-का निर्माण करनेपर जो फल पहले बताया गया है, उस सम्पूर्ण फलको प्राप्त करके वह सभी देवताओंसे नमस्कृत होता हुआ रुद्रलोक प्राप्त करके रुद्रोंके साथ आनन्द मनाता है॥ १६—१८ १/२॥ |
| कृत्वा यत्फलमाप्नोति तत्फलं प्रवदाम्यहम्।<br>महेन्द्रपर्वताकारैर्विमानैर्वृषसंयुतैः ॥ २०<br>गत्वा शिवपुरं दिव्यं भुक्त्वा भोगान्यथेप्सितान्।<br>ज्ञानं विचारितं रुद्रैः सम्प्राप्य मुनिपुङ्गवाः॥ २१<br>विषयान् विषवत्त्यक्त्वा शिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>हेम्ना यस्तु प्रकुर्वीत प्रासादं रत्नशोभितम्॥ २२ | रुद्रका अत्यन्त प्रिय महेन्द्रशैल नामक शिवालय बनाकर मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, उस फलको मैं बता रहा हूँ—हे मुनिश्रेष्ठो! वह [मनुष्य] महेन्द्रपर्वतके आकारवाले तथा वृषभोँसे जुते हुए विमानोंसे दिव्य शिवलोकमें जाकर [वहाँ] यथेष्ट सुखोंको भोगकर रुद्रोंसे पूर्ण ज्ञान प्राप्त करके विषयोंको विषकी भाँति त्यागकर शिवसायुज्य प्राप्त करता है॥ १९—२१ १/२॥ |
| द्राविडं नागरं वापि केसरं वा विधानतः।<br>कूटं वा मण्डपं वापि समं वा दीर्घमेव च॥ २३<br>न तस्य शक्यते वक्तुं पुण्यं शतयुगैरपि।<br>जीर्णं वा पतितं वापि खण्डितं स्फुटितं तथा॥ २४<br>पूर्ववत्कारयेद्यस्तु द्वाराद्यैः सुशुभं द्विजाः।<br>प्रासादं मण्डपं वापि प्राकारं गोपुरं तु वा॥ २५<br>कर्तुर्य्यधिकं पुण्यं लभते नात्र संशयः।<br>वृत्त्यर्थं वा प्रकुर्वीत नरः कर्म शिवालये॥ २६ | जो [मनुष्य] रत्नजटित सोनेका द्राविड़, नागर अथवा केसर कोटिका शिवालय विधानपूर्वक बनवाता है अथवा सम अथवा दीर्घ शिखर (चोटी) या मण्डप बनवाता है, उसके पुण्यका वर्णन सैकड़ों युगोंमें भी नहीं किया जा सकता है। हे द्विजो! जो [मनुष्य] जीर्ण (पुराने), गिरे हुए, टूटे हुए अथवा फूटे हुए शिवालय, उसके मण्डप, चहारदीवारी, फाटक अथवा द्वार आदिको पूर्वकी भाँति अत्यन्त सुन्दर करा देता है; वह [वास्तविक] निर्मातासे भी अधिक पुण्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २२—२५ १/२॥ |
| यः स याति न सन्देहः स्वर्गलोकं सबान्धवः।<br>यश्चात्मभोगसिद्ध्यर्थमपि रुद्रालये सकृत्॥ २७<br>कर्म कुर्याद्यदि सुखं लब्ध्वा चापि प्रमोदते।<br>तस्मादायतनं भक्त्या यः कुर्यान्मुनिसत्तमाः॥ २८ | जो मनुष्य आजीविकाके लिये शिवालयमें कार्य करता है, वह [अपने] बान्धवोंसहित स्वर्गलोक जाता है; इसमें सन्देह नहीं है। जो अपने सुखकी सिद्धिके लिये शिवालयमें एक बार भी [कुछ] कार्य कर देता है, वह सुख प्राप्त करके प्रसन्न रहता है॥ २६—२७ १/२॥ |
| काष्ठेष्टकादिभिर्मर्त्यः शिवलोके महीयते।<br>प्रसादार्थं महेशस्य प्रासादो मुनिपुङ्गवाः॥ २९ | अतः हे उत्तम मुनियो! जो मनुष्य भक्तिपूर्वक काष्ठ, पत्थर आदिसे शिवालय बनवाता है, वह शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। हे श्रेष्ठ मुनियो! महेशकी प्रसन्नताके |