भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ७७ ] शिवमन्दिरोंके निर्माणका फल... शिवमन्दिरके उपलेपन आदिका माहात्म्य [ ३७७


श्लोकअर्थ
कर्तव्यः सर्वयत्नेन धर्मकामार्थमुक्तये।<br>अशक्तश्चेन्मुनिश्रेष्ठाः प्रासादं कर्तुमुत्तमम्॥ ३०लिये तथा धर्म, अर्थ, काम, मोक्षके लिये पूर्ण प्रयत्नके साथ शिवालयका निर्माण करना चाहिये॥ २८-२९ १/२ ॥
सम्मार्जनादिभिर्वापि सर्वान् कामानवाप्नुयात्।<br>सम्मार्जनं तु यः कुर्यान्मार्जन्या मृदुसूक्ष्मया॥ ३१<br><br>चान्द्रायणसहस्रस्य फलं मासेन लभ्यते।<br>यः कुर्याद्वस्त्रपूतेन गन्धगोमयवारिणा॥ ३२<br><br>आलेपनं यथान्यायं वर्षचान्द्रायणं लभेत्।हे श्रेष्ठ मुनियो! यदि कोई उत्तम शिवालय बनानेमें असमर्थ हो, तो वह [शिवालयमें] सम्मार्जन (बुहारना) आदिके द्वारा भी समस्त वांछित फलोंको प्राप्त कर लेता है। जो [व्यक्ति] कोमल तथा सूक्ष्म झाड़ूसे सफाई करता है, वह महीने भरमें हजार चान्द्रायण व्रतका फल प्राप्त करता है। जो [मनुष्य] पवित्र वस्त्रसे छने हुए गन्ध तथा गोमयके जलसे विधानके अनुसार आलेपन (लीपनेका कार्य) करता है, वह वर्षपर्यन्त चान्द्रायणव्रत करनेका फल प्राप्त करता है॥ ३०-३२ १/२ ॥
अर्धक्रोशं शिवक्षेत्रं शिवलिङ्गात्समन्ततः॥ ३३<br><br>यस्त्यजेद्दुस्त्यजान् प्राणाञ्छिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>स्वायम्भुवस्य मानं हि तथा बाणस्य सुव्रताः॥ ३४<br><br>स्वायम्भुवे तदर्धं स्यात्स्यादार्षे च तदर्धकम्।<br>मानुषे च तदर्धं स्यात्क्षेत्रमानं द्विजोत्तमाः॥ ३५<br><br>एवं यतीनामावासे क्षेत्रमानं द्विजोत्तमाः।<br>रुद्रावतारे चाद्यं यच्छिष्ये चैव प्रशिष्यके॥ ३६शिवलिङ्गके चारों ओर आधा कोशका क्षेत्र शिवक्षेत्र होता है। जो [अपने] दुस्त्यज प्राणोंको [इस क्षेत्रमें] छोड़ता है, वह शिव-सायुज्य प्राप्त करता है। हे सुव्रतो! यह [अर्धकोश] मान स्वयम्भू बाणलिङ्ग अर्थात् केवल ज्योतिर्लिङ्गका है। हे द्विजोत्तमो! अन्य स्वयम्भू लिङ्गके लिये शिवक्षेत्रका मान उसका आधा (कोशका चतुर्थांश), ऋषिस्थापित लिङ्गके लिये उसका आधा (कोशका आठवाँ भाग) और मनुष्यके द्वारा स्थापित लिङ्गके लिये उसका भी आधा (कोशका सोलहवाँ) भाग होता है। हे द्विजोत्तमो! इसी प्रकार यतियोंके निवासस्थानसे कोशके सोलहवें भागका क्षेत्र शिवक्षेत्र है। रुद्रोंके अवतारस्थल, उनके शिष्यों-प्रशिष्योंके अवतारस्थल, योगाचार्योंके अवतारस्थल, उनके शिष्योंके अवतारस्थल तथा उनके भी शिष्य-प्रशिष्योंके अवतारस्थलसे आधे कोशका मण्डल शिवक्षेत्र होता है॥ ३३-३६ १/२ ॥
नरावतारे तच्छिष्ये तच्छिष्ये च प्रशिष्यके।<br>श्रीपर्वते महापुण्ये तस्य प्रान्ते च वा द्विजाः॥ ३७<br><br>तस्मिन् वा यस्त्यजेत्प्राणाञ्छिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>वारणस्यां तथाप्येवमविमुक्ते विशेषतः॥ ३८<br><br>केदारे च महाक्षेत्रे प्रयागे च विशेषतः।<br>कुरुक्षेत्रे च यः प्राणान् सन्त्यजेद्याति निर्वृतिम्॥ ३९<br><br>प्रभासे पुष्करेऽवन्त्यां तथा चैवामरेश्वरे।<br>वणीशेलाकुले चैव मृतो याति शिवात्मताम्॥ ४०<br><br>वारणस्यां मृतो जन्तुर्न जातु जन्तुतां व्रजेत्।<br>त्रिविष्टपे विमुक्ते च केदारे सङ्गमेश्वरे॥ ४१हे द्विजो! महापुण्यप्रद श्रीपर्वत तथा उसके प्रान्तभाग—इस शिवक्षेत्रमें जो प्राणोंका त्याग करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है। जो [मनुष्य] वाराणसीमें तथा विशेषकर वहाँ अविमुक्त क्षेत्रमें, केदारमें, विशेषकर महाक्षेत्र प्रयागमें तथा कुरुक्षेत्रमें प्राणत्याग करता है, वह मोक्ष प्राप्त करता है। प्रभास, पुष्कर, अवन्ती, अमरेश्वर तथा वणीशेलाकुलमें मृत प्राणी शिवात्मताको प्राप्त होता है। वाराणसीमें मरनेवाला प्राणी पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होता है। जो [प्राणी]