भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 405

अध्याय ८२] सभी पापोंका उच्छेदक तथा शिवसायुज्य प्रदान करनेवाला व्यपोहनस्तव ४०३ ब्रह्माणी चैव माहेशी कौमारी वैष्णवी तथा। वाराही चैव माहेन्द्री चामुण्डाग्नेयिका तथा ॥ ९६ एता वै मातरः सर्वाः सर्वलोकप्रपूजिताः। योगिनीभिर्महापापं व्यपोहन्तु समाहिताः ॥ ९७ वीरभद्रो महातेजा हिमकुन्देन्दुसन्निभः । रुद्रस्य तनयो रौद्रः शूलासक्तमहाकरः ॥ ९८ सहस्रबाहुः सर्वज्ञः सर्वायुधधरः स्वयम्। त्रेताग्निनयनो देवस्त्रैलोक्याभयदः प्रभुः ॥ ९९ मातृणां रक्षको नित्यं महावृषभवाहनः। त्रैलोक्यनमितः श्रीमान् शिवपादार्चने रतः ॥ १०० यज्ञस्य च शिरश्छेत्ता पूष्णो दन्तविनाशनः । वह्नेर्हस्तहरः साक्षाद् भगनेत्रनिपातनः ॥ १०१ पादाङ्गुष्ठेन सोमाङ्गपेषकः प्रभुसंज्ञकः । उपेन्द्रेन्द्रयमादीनां देवानामहङ्गरक्षकः ॥ १०२ सरस्वत्या महादेव्या नासिकोष्ठावकर्तनः । गणेश्वरो यः सेनानीः स मे पापं व्यपोहतु ॥ १०३ ज्येष्ठा वरिष्ठा वरदा वराभरणभूषिता। महालक्ष्मीर्जगन्माता सा मे पापं व्यपोहतु ॥ १०४ महामोहा महाभागा महाभूतगणैर्वृता । शिवार्चनरता नित्यं सा मे पापं व्यपोहतु ॥ १०५ लक्ष्मीः सर्वगुणोपेता सर्वलक्षणसंयुता। सर्वदा सर्वगा देवी सा मे पापं व्यपोहतु ॥ १०६ सिंहारूढा महादेवी पार्वत्यास्तनयाव्यया । विष्णोर्निद्रा महामाया वैष्णवी सुरपूजिता ॥ १०७ त्रिनेत्रा वरदा देवी महिषासुरमर्दिनी। शिवार्चनरता दुर्गा सा मे पापं व्यपोहतु ॥ १०८ ब्रह्माण्डधारका रुद्राः सर्वलोकप्रपूजिताः । सत्याश्च मानसाः सर्वे व्यपोहन्तु भयं मम ॥ १०९ भूताः प्रेताः पिशाचाश्च कूष्माण्डगणनायकाः । कूष्माण्डकाश्च ते पापं व्यपोहन्तु समाहिताः ॥ ११० ब्रह्माणी, माहेशी, कौमारी, वैष्णवी, वाराही, माहेन्द्री, चामुण्डा, आग्नेयिका - समस्त लोकोंसे पूजित तथा योगिनियोंसे घिरी हुई ये सभी माताएँ [मेरे] महापापको दूर करें ॥ ९६-९७ ॥ महातेजस्वी, हिम (बर्फ) - कुन्दपुष्प तथा चन्द्रमाके सदृश, रुद्रके पुत्र, भयानक, शूलयुक्त विशाल भुजावाले, हजार भुजाओंवाले, सब कुछ जाननेवाले, सभी प्रकारके शस्त्र धारण करनेवाले, तीन अग्निरूप नेत्रवाले, देवस्वरूप, तीनों लोकोंको अभय प्रदान करनेवाले, ऐश्वर्यशाली, माताओंकी सर्वदा रक्षा करनेवाले, महान् वृषभपर आरूढ़, तीनों लोकोंसे नमस्कृत, श्रीयुक्त, शिवके पादार्चनमें तल्लीन, यज्ञके सिरका छेदन करनेवाले, पूषाके दाँतको तोड़नेवाले, अग्निके हाथको नष्ट करनेवाले, साक्षात् भगके नेत्रको नीचे गिरानेवाले, [अपने] पैरके अँगूठेसे सोमके अंगको पीसनेवाले, प्रभु नामवाले, उपेन्द्र-इन्द्र-यम आदि देवताओंके अंगरक्षक, महादेवी सरस्वतीके ओठ तथा नाकको काटनेवाले, गणोंके ईश्वर (स्वामी) तथा सेनानायक जो वीरभद्र हैं- वे मेरे पापको दूर करें ॥ ९८-१०३ ॥ ज्येष्ठ, वरिष्ठ, वरदायिनी, श्रेष्ठ आभूषणोंसे विभूषित तथा जगज्जननी जो महालक्ष्मी हैं- वे मेरे पापको दूर करें। महाभागवती, महान् भूतगणोंसे घिरी हुई तथा शिवपूजनमें सदा रत जो महामोहा (महामाया) हैं- वे मेरे पापको दूर करें। सभी गुणोंसे सम्पन्न, सभी लक्षणोंसे युक्त, सब कुछ देनेवाली और सर्वत्र गमन करनेवाली जो देवी लक्ष्मी हैं-वे मेरे पापको दूर करें। सिंहपर आरूढ़, पार्वतीकी पुत्री, शाश्वत, विष्णुकी निद्रारूपा, महामाया, वैष्णवी (विष्णुकी शक्ति), देवताओंसे पूजित, तीन नेत्रोंवाली, वर प्रदान करनेवाली, महिषासुरका संहार करनेवाली तथा शिवके अर्चनमें तल्लीन जो महादेवी भगवती दुर्गा हैं- वे मेरे पापको दूर करें ॥ १०४-१०८ ॥ ब्रह्माण्डको धारण करनेवाले तथा सभी लोकोंद्वारा पूजित सभी सत्य और मानस रुद्र मेरे भयको दूर करें। जो भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्माण्डगणनायक तथा