भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 406

४०४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग अनेन देवं स्तुत्वा तु चान्ते सर्वं समापयेत्। प्रणम्य शिरसा भूमौ प्रतिमासे द्विजोत्तमाः ॥ १११ व्यपोहनस्तवं दिव्यं यः पठेच्छृणुयादपि। विधूय सर्वपापानि रुद्रलोके महीयते ॥ ११२ कन्यार्थी लभते कन्यां जयकामो जयं लभेत्। अर्थकामो लभेदर्थं पुत्रकामो बहून् सुतान् ॥ ११३ विद्यार्थी लभते विद्यां भोगार्थी भोगमाप्नुयात्। यान् यान् प्रार्थयते कामान् मानवः श्रवणादिह ॥ ११४ तान् सर्वान् शीघ्रमाप्नोति देवानां च प्रियो भवेत्। पठ्यमानमिदं पुण्यं यमुद्दिश्य तु पठ्यते ॥ ११५ तस्य रोगा न बाधन्ते वातपित्तादिसम्भवाः। नाकाले मरणं तस्य न सर्पैरपि दंश्यते ॥ ११६ यत्पुण्यं चैव तीर्थानां यज्ञानां चैव यत्फलम्। दानानां चैव यत्पुण्यं व्रतानां च विशेषतः ॥ ११७ तत्पुण्यं कोटिगुणितं जप्त्वा चाप्नोति मानवः। गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च वीरहा ब्रह्महा भवेत् ॥ ११८ शरणागतघाती च मित्रविश्वासघातकः। दुष्टः पापसमाचारो मातृहा पितृहा तथा ॥ ११९ व्यपोह्य सर्वपापानि शिवलोके महीयते ॥ १२० कूष्माण्ड हैं—वे समाहितचित्त होकर [मेरे] पापको दूर करें॥१०९-११०॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! प्रत्येक महीनेमें इस [व्यपोहनस्तव]- से शिवकी स्तुति करके भूमिपर मस्तक टेककर प्रणाम करके अन्तमें सम्पूर्ण अनुष्ठानका समापन करना चाहिये॥१११॥ जो [इस] दिव्य व्यपोहनस्तवको पढ़ता अथवा सुनता है, वह समस्त पापोंको ध्वस्त करके रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥११२॥ कन्याकी अभिलाषा रखनेवाला कन्या प्राप्त करता है, विजयकी कामना करनेवाला विजय प्राप्त करता है, धनकी इच्छा रखनेवाला धन प्राप्त करता है, पुत्रकी कामना करनेवाला अनेक पुत्र प्राप्त करता है, विद्या चाहनेवाला विद्या प्राप्त करता है और सुख चाहनेवाला सुख प्राप्त करता है; मनुष्य जिन-जिन कामनाओंकी प्रार्थना करता है, इसके श्रवणसे इस लोकमें उन सबको शीघ्र प्राप्त कर लेता है और देवताओंका प्रिय हो जाता है। जिस किसीके निमित्त इस पवित्र स्तवको पढ़ा जाता है, उसे वात, पित्त आदिसे होनेवाले रोग पीड़ित नहीं करते हैं, असमयमें उसकी मृत्यु नहीं होती है और उसे सर्प नहीं डँसते हैं॥११३-११६॥ जो पुण्य तीर्थोंकी यात्रा करनेसे, जो फल यज्ञोंके करनेसे, जो पुण्य दान करनेसे और जो पुण्य विशेषरूपसे व्रतोंके करनेसे होता है; उससे करोड़ों गुना फल इसे जप करके मनुष्य प्राप्त करता है। जो गायकी हत्या करनेवाला, कृतघ्न, वीरघाती, ब्रह्महत्यारा, शरणागतका वध करनेवाला, मित्रके साथ विश्वासघात करनेवाला, दुष्ट, पापमय आचरणवाला और माता-पिताका वध करनेवाला होता है, वह भी [इसके पाठसे] सभी पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥११७-१२०॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे व्यपोहनस्तवनिरूपणं नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥८२॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'व्यपोहनस्तवनिरूपण' नामक बयासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८२ ॥