श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
४०४ श्रीलिङ्गमहापुराण [ पूर्वभाग अनेन देवं स्तुत्वा तु चान्ते सर्वं समापयेत्। प्रणम्य शिरसा भूमौ प्रतिमासे द्विजोत्तमाः ॥ १११ व्यपोहनस्तवं दिव्यं यः पठेच्छृणुयादपि। विधूय सर्वपापानि रुद्रलोके महीयते ॥ ११२ कन्यार्थी लभते कन्यां जयकामो जयं लभेत्। अर्थकामो लभेदर्थं पुत्रकामो बहून् सुतान् ॥ ११३ विद्यार्थी लभते विद्यां भोगार्थी भोगमाप्नुयात्। यान् यान् प्रार्थयते कामान् मानवः श्रवणादिह ॥ ११४ तान् सर्वान् शीघ्रमाप्नोति देवानां च प्रियो भवेत्। पठ्यमानमिदं पुण्यं यमुद्दिश्य तु पठ्यते ॥ ११५ तस्य रोगा न बाधन्ते वातपित्तादिसम्भवाः। नाकाले मरणं तस्य न सर्पैरपि दंश्यते ॥ ११६ यत्पुण्यं चैव तीर्थानां यज्ञानां चैव यत्फलम्। दानानां चैव यत्पुण्यं व्रतानां च विशेषतः ॥ ११७ तत्पुण्यं कोटिगुणितं जप्त्वा चाप्नोति मानवः। गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च वीरहा ब्रह्महा भवेत् ॥ ११८ शरणागतघाती च मित्रविश्वासघातकः। दुष्टः पापसमाचारो मातृहा पितृहा तथा ॥ ११९ व्यपोह्य सर्वपापानि शिवलोके महीयते ॥ १२० कूष्माण्ड हैं—वे समाहितचित्त होकर [मेरे] पापको दूर करें॥१०९-११०॥ हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! प्रत्येक महीनेमें इस [व्यपोहनस्तव]- से शिवकी स्तुति करके भूमिपर मस्तक टेककर प्रणाम करके अन्तमें सम्पूर्ण अनुष्ठानका समापन करना चाहिये॥१११॥ जो [इस] दिव्य व्यपोहनस्तवको पढ़ता अथवा सुनता है, वह समस्त पापोंको ध्वस्त करके रुद्रलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥११२॥ कन्याकी अभिलाषा रखनेवाला कन्या प्राप्त करता है, विजयकी कामना करनेवाला विजय प्राप्त करता है, धनकी इच्छा रखनेवाला धन प्राप्त करता है, पुत्रकी कामना करनेवाला अनेक पुत्र प्राप्त करता है, विद्या चाहनेवाला विद्या प्राप्त करता है और सुख चाहनेवाला सुख प्राप्त करता है; मनुष्य जिन-जिन कामनाओंकी प्रार्थना करता है, इसके श्रवणसे इस लोकमें उन सबको शीघ्र प्राप्त कर लेता है और देवताओंका प्रिय हो जाता है। जिस किसीके निमित्त इस पवित्र स्तवको पढ़ा जाता है, उसे वात, पित्त आदिसे होनेवाले रोग पीड़ित नहीं करते हैं, असमयमें उसकी मृत्यु नहीं होती है और उसे सर्प नहीं डँसते हैं॥११३-११६॥ जो पुण्य तीर्थोंकी यात्रा करनेसे, जो फल यज्ञोंके करनेसे, जो पुण्य दान करनेसे और जो पुण्य विशेषरूपसे व्रतोंके करनेसे होता है; उससे करोड़ों गुना फल इसे जप करके मनुष्य प्राप्त करता है। जो गायकी हत्या करनेवाला, कृतघ्न, वीरघाती, ब्रह्महत्यारा, शरणागतका वध करनेवाला, मित्रके साथ विश्वासघात करनेवाला, दुष्ट, पापमय आचरणवाला और माता-पिताका वध करनेवाला होता है, वह भी [इसके पाठसे] सभी पापोंसे मुक्त होकर शिवलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥११७-१२०॥ ॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे व्यपोहनस्तवनिरूपणं नाम द्व्यशीतितमोऽध्यायः ॥८२॥ ॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'व्यपोहनस्तवनिरूपण' नामक बयासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८२ ॥
८३- विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान
अध्याय ८३ ] विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान ४०५
तिरासीवाँ अध्याय
विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ऋषय ऊचुः<br>व्यपोहनस्तवं पुण्यं श्रुतमस्माभिरादरात्।<br>प्रसङ्गाल्लिङ्गदानस्य व्रतान्यपि वदस्व नः॥ १ | ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] हम लोगोंने आदरपूर्वक पवित्र व्यपोहनस्तवको सुन लिया; अब आप प्रसंगसे लिङ्गदानके व्रतोंको भी हमलोगोंको बताइये ॥ १ ॥ |
| सूत उवाच<br>व्रतानि वः प्रवक्ष्यामि शुभानि मुनिसत्तमाः।<br>नन्दिना कथितानीह ब्रह्मपुत्राय धीमते ॥ २<br><br>तानि व्यासादुपश्रुत्य युष्माकं प्रवदाम्यहम्।<br>अष्टम्यां च चतुर्दश्यां पक्षयोरुभयोरपि ॥ ३ | **सूतजी बोले—**हे श्रेष्ठ मुनियो! मैं आप लोगोंको शुभ व्रत बताऊँगा; नन्दीने बुद्धिमान् ब्रह्मापुत्र सनत्कुमारको उन्हें बताया था, उन्हीं [व्रतों]-को व्यासजीसे सुनकर मैं आप लोगोंको बता रहा हूँ॥ २ १/२ ॥ |
| वर्षमेकं तु भुञ्जानो नक्तं यः पूजयेच्छिवम्।<br>सर्वयज्ञफलं प्राप्य स याति परमां गतिम्॥ ४<br><br>पृथिवीं भाजनं कृत्वा भुक्त्वा पर्वसु मानवः।<br>अहोरात्रेण चैकेन त्रिरात्रफलमश्नुते ॥ ५ | एक वर्षतक दोनों पक्षोंकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको केवल रात्रिमें आहार ग्रहण करता हुआ जो [मनुष्य] शिवकी पूजा करता है, वह समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त करके परमगति प्राप्त करता है। पर्वोंपर एक दिन-रात इस व्रतको करके और पृथिवीको पात्र बनाकर भोजन करनेसे मनुष्य तीन रात्रियोंका फल प्राप्त करता है॥ ३–५॥ |
| द्वयोर्मासस्य पञ्चम्योर्द्वयोः प्रतिपदोर्नरः।<br>क्षीरधाराव्रतं कुर्यात्सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ ६<br><br>कृष्णाष्टम्यां तु नक्तेन यावत्कृष्णचतुर्दशी।<br>भुञ्जन् भोगानवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ ७ | जो मनुष्य महीनेकी दोनों पंचमी तथा प्रतिपदा तिथियोंमें क्षीरधाराव्रत करता है अर्थात् केवल दुग्धके आहारपर रहता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करता है। कृष्णपक्षकी अष्टमीसे कृष्णपक्षकी चतुर्दशीतक [केवल] रातमें भोजन करनेवाला भोगोंको प्राप्त करता है और [अन्तमें] ब्रह्मलोक जाता है ॥ ६-७ ॥ |
| योऽब्दमेकं प्रकुर्वीत नक्तं पर्वसु पर्वसु।<br>ब्रह्मचारी जितक्रोधः शिवध्यानपरायणः ॥ ८<br><br>संवत्सरान्ते विप्रेन्द्रान् भोजयेद्विधिपूर्वकम्।<br>स याति शाङ्करं लोकं नात्र कार्या विचारणा ॥ ९ | जो [मनुष्य] ब्रह्मचर्यमें स्थित रहकर, क्रोधको वशमें करके तथा शिवध्यानपरायण होकर एक वर्षतक सभी पर्वोंमें नक्तव्रत करता है और वर्षके अन्तमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक भोजन कराता है, वह शिवलोक जाता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ८-९ ॥ |
| उपवासात्परं भैक्ष्यं भैक्ष्यात्परमयाचितम्।<br>अयाचितात्परं नक्तं तस्मान्नक्तेन वर्तयेत् ॥ १० | उपवासकी अपेक्षा भिक्षा श्रेष्ठ है, भिक्षाकी अपेक्षा बिना माँगे प्राप्त भोजन श्रेष्ठ है और बिना माँगे प्राप्त भोजनकी अपेक्षा नक्तव्रत श्रेष्ठ है; अतः नक्तव्रत करना चाहिये ॥ १० ॥ |
| देवैर्भुक्तं तु पूर्वाह्णे मध्याह्ने ऋषिभिस्तथा।<br>अपराह्ने च पितृभिः सन्ध्यायां गुह्यकादिभिः ॥ ११ | पूर्वाह्नमें किया गया भोजन देवताओंका, मध्याह्नमें ऋषियोंका, अपराह्नमें पितरोंका और सन्ध्यामें गुह्यकोंका |
| ४०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सर्ववेलामतिक्रम्य नक्तभोजनमुत्तमम्।<br>हविष्यभोजनं स्नानं सत्यमाहारलाघवम्॥ १२<br><br>अग्निकार्यमधःशय्यां नक्तभोजी समाचरेत्।<br>प्रतिमासं प्रवक्ष्यामि शिवव्रतमनुत्तमम्॥ १३ | होता है, किन्तु सभी कालोंका अतिक्रमण करके रातमें किया गया भोजन उत्तम होता है। रातमें भोजन करनेवालेको हविष्यान्न ग्रहण करना चाहिये, स्नान करना चाहिये, सत्यका पालन करना चाहिये, कम खाना चाहिये, अग्निहोत्र करना चाहिये और भूमिपर शयन करना चाहिये॥ ११-१२१/२॥ |
| धर्मकामार्थमोक्षार्थं सर्वपापविशुद्धये।<br>पुष्यमासे च सम्पूज्य यः कुर्यान्नक्तभोजनम्॥ १४<br><br>सत्यवादी जितक्रोधः शालिगोधूमगोरसैः।<br>पक्षयोरष्टमीं यत्नादुपवासेन वर्तयेत्॥ १५<br><br>भूमिशय्यां च मासान्ते पौर्णमास्यां घृतादिभिः।<br>स्नाप्य रुद्रं महादेवं सम्पूज्य विधिपूर्वकम्॥ १६<br><br>यावकं चौदनं दत्त्वा सक्षीरं सघृतं द्विजाः।<br>भोजयेद् ब्राह्मणाञ्छिष्टाञ्जपेच्छान्तिं विशेषतः॥ १७<br><br>तथा गोमिथुनं चैव कपिलं विनिवेदयेत्।<br>भवाय देवदेवाय शिवाय परमेष्ठिने॥ १८<br><br>स याति मुनिशार्दूल वाह्नेयं लोकमुत्तमम्।<br>भुक्त्वा स विपुलान् लोकान् तत्रैव स विमुच्यते॥ १९ | अब मैं प्रत्येक महीनेमें किये जानेवाले उत्तम शिवव्रतका वर्णन करूँगा, जो धर्म-काम-अर्थ-मोक्षके लिये और सभी पापोंकी शुद्धिके लिये होता है। जो [मनुष्य] सत्यवादी तथा जितक्रोध (क्रोधको वशमें किया हुआ) होकर पुष्य (पौष) मासमें [शिवका] विधिवत् पूजन करके चावल, गेहूँ और गोदुग्धसे बने हुए भोजनको केवल रातमें ग्रहण करता है; दोनों पक्षोंकी अष्टमी तिथिमें यत्नपूर्वक उपवास करता है तथा भूमिपर शयन करता है और हे द्विजो! मासके अन्तमें पूर्णिमाके दिन घृत आदिसे महादेवको स्नान कराकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दुग्ध तथा घृतमिश्रित पके हुए यव तथा चावलका भोजन कराता है एवं विशेषरूपसे शान्तिमन्त्रोंका जप करता है और देवदेव परमेश्वर भव शिवजीको कपिल वर्णका गोमिथुन (गाय तथा वृषभ) समर्पित करता है—<br>हे श्रेष्ठ मुनियो! वह [मनुष्य] उत्तम अग्निलोकको जाता है और अनेक लोकोंके सुखोंका भोग करके वहींपर मुक्त हो जाता है॥ १३-१९॥ |
| माघमासे तु सम्पूज्य यः कुर्यान्नक्तभोजनम्।<br>कृशरं घृतसंयुक्तं भुञ्जानः संयतेन्द्रियः॥ २०<br><br>सोपवासं चतुर्दश्यां भवेदुभयपक्षयोः।<br>रुद्राय पौर्णमास्यां तु दद्याद्वै घृतकम्बलम्॥ २१<br><br>कृष्णं गोमिथुनं दद्यात्पूजयेच्चैव शङ्करम्।<br>भोजयेद् ब्राह्मणांश्चैव यथाविभवविस्तरम्॥ २२<br><br>याम्यमासाद्य वै लोकं यमेन सह मोदते।<br>फाल्गुने चैव सम्प्राप्ते कुर्याद्वै नक्तभोजनम्॥ २३ | माघ मासमें जो [मनुष्य] पूजन करके केवल नक्त भोजन करता है, घृतयुक्त कृशरका आहार ग्रहण करता है, इन्द्रियोंको वशमें किये रहता है, दोनों पक्षोंकी चतुर्दशीमें उपवास करता है, पूर्णिमाके दिन रुद्रको घृतकम्बल अर्पित करता है, कृष्ण वर्णका गोमिथुन प्रदान करता है, शिवकी पूजा करता है, [अपने] सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह यमलोक पहुँचकर यमके साथ आनन्द मनाता है॥ २०-२२१/२॥ |
| श्यामाकान्नघृतक्षीरैर्जितक्रोधो जितेन्द्रियः।<br>चतुर्दश्यामथाष्टम्यामुपवासं च कारयेत्॥ २४ | फाल्गुन मास आनेपर जो घी तथा दूधमें पकाये हुए साँवाँकि अन्नका नक्त भोजन करता है, इन्द्रियोंको तथा क्रोधको वशमें किये रहता है, अष्टमी तथा चतुर्दशीके |
अध्याय ८३ ] विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान [ ४०७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पौर्णमास्यां महादेवं स्नाप्य सम्पूज्य शङ्करम्।<br>दद्याद् गोमिथुनं वापि ताम्राभं शूलपाणये॥ २५<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु प्रार्थयेत्परमेश्वरम्।<br>स याति चन्द्रसायुज्यं नात्र कार्या विचारणा॥ २६ | दिन उपवास करता है, पूर्णिमाके दिन महादेव शंकरको स्नान कराकर उनकी पूजा करके उन शूलपाणि [शिव]-को ताम्रवर्णका गोमिथुन प्रदान करता है और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर परमेश्वरसे प्रार्थना करता है, वह चन्द्रमाका सायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ २३-२६॥ |
| चैत्रेऽपि रुद्रमभ्यर्च्य कुर्याद्वै नक्तभोजनम्।<br>शाल्यन्नं पयसा युक्तं घृतेन च यथासुखम्॥ २७<br>गोष्ठशायी मुनिश्रेष्ठाः क्षितौ निशि भवं स्मरेत्।<br>पौर्णमास्यां शिवं स्नाप्य दद्याद् गोमिथुनं सितम्॥ २८<br>ब्राह्मणान् भोजयेच्चैव निर्ऋतेः स्थानमाप्नुयात्। | हे श्रेष्ठ मुनियो! जो चैत्र महीनेमें रुद्रकी पूजा करके घी और दूधसे युक्त तथा पके हुए शालि-चावलको अपनी रुचिके अनुसार रात्रिमें ग्रहण करता है, रातमें गोशालामें भूमिपर शयन करता है, शिवजीका स्मरण करता है, पूर्णिमासीके दिन शिवको स्नान कराकर श्वेतवर्णका गोमिथुन प्रदान करता है और ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह निर्ऋतितिलोकको प्राप्त करता है॥ २७-२८ १/२॥ |
| वैशाखे च तथा मासे कृत्वा वै नक्तभोजनम्॥ २९<br>पौर्णमास्यां भवं स्नाप्य पञ्चगव्यघृतादिभिः।<br>श्वेतं गोमिथुनं दत्त्वा सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ ३० | वैशाख महीनेमें नक्तभोजन करके पूर्णमासी तिथिमें पंचगव्य, घृत आदिसे शिवजीको स्नान कराकर श्वेतवर्णका गोमिथुन अर्पित करके वह [मनुष्य] अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करता है॥ २९-३०॥ |
| ज्येष्ठे मासे च देवेशं भवं शर्वमुमापतिम्।<br>सम्पूज्य श्रद्धया भक्त्या कृत्वा वै नक्तभोजनम्॥ ३१<br>रक्तशाल्यन्नमध्वा च अद्भिः पूतं घृतादिभिः।<br>वीरासनी निशार्धं च गवां शुश्रूषणे रतः॥ ३२<br>पौर्णमास्यां तु सम्पूज्य देवदेवमुमापतिम्।<br>स्नाप्य भक्त्या यथान्यायं चरुं दद्याच्च शूलिने॥ ३३<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च यथाविभवविस्तरम्।<br>धूम्रं गोमिथुनं दत्त्वा वायुलोके महीयते॥ ३४ | ज्येष्ठ मासमें देवेश, भव, शर्व, उमापतिकी श्रद्धापूर्वक पूजा करके मधु-जल-घृतमिश्रित पवित्र शालिचावलका केवल रातमें आहार ग्रहण करके वीर आसनमें स्थित होकर आधी रातमें गायोंकी सेवामें तत्पर रहकर पूर्णिमाके दिन देवदेव उमापतिको स्नान कराकर उनकी पूजा करके विधानपूर्वक शिवजीको चरु अर्पित करके पुनः अपने सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर धूम्रवर्णका गोमिथुन [शिवजीको] अर्पित करनेसे वह वायुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ३१-३४॥ |
| आषाढे मासि चाप्येवं नक्तभोजनतत्परः।<br>भूरिखण्डाज्यसम्मिश्रं सक्तुभिश्चैव गोरसम्॥ ३५<br>पौर्णमास्यां घृताद्यैस्तु स्नाप्य पूज्य यथाविधि।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च श्रोत्रियान् वेदपारगान्॥ ३६<br>दद्याद् गोमिथुनं गौरं वारुणं लोकमाप्नुयात्। | इसी प्रकार आषाढ़ महीनेमें भी चीनी, घृत तथा गोदुग्धमिश्रित सत्तूके नक्त-भोजनमें तत्पर रहते हुए पूर्णिमाके दिन घृत आदिसे [शिवजीको] स्नान कराकर विधिपूर्वक पूजन करके वेदमें पारंगत श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको भोजन कराकर जो गौरवर्णका गोमिथुन अर्पित करता है, वह वरुणलोक प्राप्त करता है॥ ३५-३६ १/२॥ |
| श्रावणे च द्विजा मासे कृत्वा वै नक्तभोजनम्॥ ३७<br>क्षीरषष्टिकभक्तेन सम्पूज्य वृषभध्वजम्।<br>पौर्णमास्यां घृताद्यैस्तु स्नाप्य पूज्य यथाविधि॥ ३८ | हे द्विजो! सावन महीनेमें दूधमिश्रित षष्टिक (साठ दिनमें उत्पन्न होनेवाले शालिचावल)-के भातका नक्तभोजन करके वृषभध्वजकी पूजा करके [अन्तमें] |
| ४०८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मूल संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्राह्मणान् भोजयित्वा च श्रोत्रियान् वेदपारगान्।<br>श्वेताग्रपादं पौण्ड्रं च दद्याद् गोमिथुनं पुनः॥ ३९<br><br>स याति वायुसायुज्यं वायुवत्सर्वगो भवेत्।<br>प्राप्ते भाद्रपदे मासे कृत्वैवं नक्तभोजनम्॥ ४० | पूर्णिमाके दिन घृत आदिसे स्नान कराकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके वेदमें पारंगत श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको भोजन कराकर जो [मनुष्य] सफेद खुरवाला तथा चितकबरा गोमिथुन शिवजीको अर्पित करता है, वह वायुदेवका सायुज्य प्राप्त करता है और वायुके समान सर्वगामी हो जाता है॥ ३७–३९१/२॥ |
| हुतशेषं च विप्रेन्द्रान् वृक्षमूलाश्रितो दिवा।<br>पौर्णमास्यां तु देवेशं स्नाप्य सम्पूज्य शङ्करम्॥ ४१<br><br>नीलस्कन्धं वृषं गां च दत्त्वा भक्त्या यथाविधि।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च वेदवेदाङ्गपारगान्॥ ४२<br><br>यक्षलोकमनुप्राप्य यक्षराजो भवेन्नरः।<br>ततश्चाश्वयुजे मासि कृत्वैवं नक्तभोजनम्॥ ४३ | हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इसी प्रकार भाद्रपद महीना आनेपर हवनसे बची हुई सामग्रीका नक्तभोजन करके दिनमें वृक्षके मूलका आश्रय लेकर विश्राम करते हुए [अन्तमें] पूर्णिमाके दिन देवेश शंकरको स्नान कराकर [उनकी] पूजा करके भक्तिपूर्वक विधिके अनुसार नीलवर्णके स्कन्धवाला वृषभ तथा एक गाय शिवजीको अर्पित करके वेद-वेदांगमें पारंगत ब्राह्मणोंको भोजन कराकर मनुष्य यक्षलोक प्राप्त करके यक्षोंका राजा हो जाता है॥ ४०–४२१/२॥ |
| सघृतं शङ्करं पूज्य पौर्णमास्यां च पूर्ववत्।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च शिवभक्तान् सदा शुचीन्॥ ४४<br><br>वृषभं नीलवर्णाभमुरोदेशसमुन्नतम्।<br>गां च दत्त्वा यथान्यायमैशानं लोकमाप्नुयात्॥ ४५ | इसके बाद इसी तरह आश्विन (क्वार) मासमें केवल रातमें घीसे बना हुआ भोजन करके पूर्णिमा तिथिमें पूर्वकी भाँति शंकरकी पूजा करके ब्राह्मणों तथा सर्वदा पवित्र रहनेवाले शिवभक्तोंको भोजन कराकर नीलवर्णकी आभावाले तथा उन्नत उरुदेशवाले एक वृषभ और एक गायका विधिपूर्वक दान करके मनुष्य ईशानलोक प्राप्त करता है॥ ४३–४५॥ |
| कार्तिके च तथा मासे कृत्वा वै नक्तभोजनम्।<br>क्षीरोदनेन साज्येन सम्पूज्य च भवं प्रभुम्॥ ४६<br><br>पौर्णमास्यां च विधिवत्स्नाप्य दत्त्वा चरुं पुनः।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च यथाविभवविस्तरम्॥ ४७<br><br>दत्त्वा गोमिथुनं चैव कापिलं पूर्ववद् द्विजाः।<br>सूर्यसायुज्यमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥ ४८ | हे द्विजो! कार्तिक मासमें रात्रिमें घृतयुक्त दुग्धोदनका भोजन करके भगवान् शिवका पूजनकर [अन्तमें] पूर्णिमा तिथिमें विधिपूर्वक [शिवजीको] स्नान कराकर पुनः उन्हें चरुका नैवेद्य अर्पित करके अपने सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर पूर्वकी भाँति कपिल वर्णका गोमिथुन शिवजीको समर्पित करके मनुष्य सूर्यसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ४६–४८॥ |
| मार्गशीर्षे च मासेऽपि कृत्वैवं नक्तभोजनम्।<br>यवान्नेन यथान्यायमाज्यक्षीरादिभिः समम्॥ ४९<br><br>पौर्णमास्यां च पूर्वोक्तं कृत्वा शर्वाय शम्भवे।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च दरिद्रान् वेदपारगान्॥ ५०<br><br>दत्त्वा गोमिथुनं चैव पाण्डुरं विधिपूर्वकम्।<br>सोमलोकमनुप्राप्य सोमेन सह मोदते॥ ५१ | मार्गशीर्ष (अगहन) महीनेमें भी विधिपूर्वक दूध तथा घीमें पकाये हुए जौका रात्रिमें भोजन करके [अन्तमें] पूर्णिमाके दिन पूर्वकी भाँति शर्व शम्भुको स्नान कराकर उनकी पूजा करके वेदमें पारंगत निर्धन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर तथा विधिपूर्वक पाण्डुरवर्णका |
८४- उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान
अध्याय ८४] उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान ४०९
| अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं क्षमा दया।<br>त्रिःस्नानं चाग्निहोत्रं च भूशय्या नक्तभोजनम्॥ ५२<br><br>पक्षयोरुपवासं च चतुर्दश्यष्टमीषु च।<br>इत्येतदखिलं प्रोक्तं प्रतिमासं शिवव्रतम्॥ ५३<br><br>कुर्याद्वर्षं क्रमेणैव व्युत्क्रमेणापि वा द्विजाः।<br>स याति शिवसायुज्यं ज्ञानयोगमवाप्नुयात्॥ ५४ | गोमिथुन [शिवजीको] समर्पित करके मनुष्य सोमलोक प्राप्त करके [वहाँपर] सोमके साथ आनन्द प्राप्त करता है॥ ४९–५१॥<br><br>अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य, क्षमा, दया, तीनों कालमें स्नान, अग्निहोत्र, पृथ्वीपर शयन, रात्रिभोजन और दोनों पक्षोंकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको उपवास—इन सबको तथा प्रत्येक महीनेके शिवव्रतको मैंने कह दिया; हे द्विजो! जो [मनुष्य] क्रमसे अथवा विपरीत क्रमसे वर्षभर इसे करता है, वह शिवसायुज्य तथा ज्ञानयोग प्राप्त करता है॥ ५२–५४॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवव्रतकथनं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः॥ ८३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवव्रतकथन' नामक तिरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८३॥
चौरासीवाँ अध्याय
उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान
| सूत उवाच<br>उमामहेश्वरं वक्ष्ये व्रतमीश्वरभाषितम्।<br>नरनार्यादिजन्तूनां हिताय मुनिसत्तमाः॥ १<br><br>पौर्णमास्याममावास्यां चतुर्दश्यष्टमीषु च।<br>नक्तमब्दं प्रकुर्वीत हविष्यं पूजयेद्भवम्॥ २ | **सूतजी बोले—**हे श्रेष्ठ मुनियो! अब मैं नर, नारी आदि प्राणियोंके हितके लिये [स्वयं] शिवजीद्वारा कहे गये उमामहेश्वरव्रतको बताऊँगा। वर्षभर अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या तथा पूर्णिमाको रातमें हविष्य ग्रहण करना चाहिये और शिवजीकी पूजा करनी चाहिये॥ १-२॥ | | उमामहेशप्रतिमां हेम्ना कृत्वा सुशोभनाम्।<br>राजतीं वाथ वर्षान्ते प्रतिष्ठाप्य यथाविधि॥ ३ | [शैलादि बोले—] हे प्रभो [सनत्कुमार]! जो [मनुष्य] सुवर्ण अथवा चाँदीकी उमा-महेशकी परम सुन्दर |
| ४१० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| मूल श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| ब्राह्मणान् भोजयित्वा च दत्त्वा शक्त्या च दक्षिणाम्।<br>रथाद्यैर्वापि देवेशं नीत्वा रुद्रालयं प्रति॥ ४<br><br>सर्वातिशयसंयुक्तैश्छत्रचामरभूषणैः ।<br>निवेदयेद् व्रतं चैव शिवाय परमेष्ठिने॥ ५<br><br>स याति शिवसायुज्यं नारी देव्या यदि प्रभो। | प्रतिमा बनाकर वर्षके अन्तमें विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करके पूर्ण सौन्दर्ययुक्त तथा छत्र-चामर-आभूषणोंसे अलंकृत रथ आदिसे देवेश [शिव]-को शिवालयमें ले जाकर इस व्रतको परमेश्वर शिवको निवेदित करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है और यदि नारी हो, तो वह भगवती उमाका सायुज्य प्राप्त करती है॥ ३–५ १/२॥ |
| अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नियता ब्रह्मचारिणी॥ ६<br><br>वर्षमेकं न भुञ्जीत कन्या वा विधवापि वा।<br>वर्षान्ते प्रतिमां कृत्वा पूर्वोक्तविधिना ततः॥ ७<br><br>प्रतिष्ठाप्य यथान्यायं दत्त्वा रुद्रालये पुनः।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च भवान्या सह मोदते॥ ८<br><br>या नार्येवं चरेदब्दं कृष्णामेकां चतुर्दशीम्।<br>वर्षान्ते प्रतिमां कृत्वा येन केनापि वा द्विजाः॥ ९<br><br>पूर्वोक्तमखिलं कृत्वा भवान्या सह मोदते। | कन्या हो अथवा विधवा हो—वह एक वर्षतक अष्टमी तथा चतुर्दशीको नियमपूर्वक ब्रह्मचारिणी रहकर भोजन न करे; वर्षके अन्तमें पूर्वोक्त विधिसे प्रतिमा बनाकर विधानके अनुसार उसकी प्रतिष्ठा करके उसे रुद्रालयमें प्रदान करके पुनः ब्राह्मणोंको भोजन कराकर वह भवानी (पार्वती)-के साथ आनन्द मनाती है। हे द्विजो! जो स्त्री वर्षपर्यन्त केवल कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको यह व्रत करती है और वर्षके अन्तमें जिस किसी पदार्थसे प्रतिमा बनाकर पूर्वोक्त समस्त विधान सम्पन्न करती है, वह भवानीके साथ आनन्द मनाती है॥ ६–९ १/२॥ |
| अमावास्यां निराहारा भवेदब्दं सुयन्त्रिता॥ १०<br><br>शूलं च विधिना कृत्वा वर्षान्ते विनिवेदयेत्।<br>स्नाप्येशानं यजेद् भक्त्या सहस्रैः कमलैः सितैः॥ ११<br><br>रजतं कमलं चैव जाम्बूनदसुकर्णिकम्।<br>दत्त्वा भवाय विप्रेभ्यः प्रदद्याद्दक्षिणामपि॥ १२<br><br>कामतौऽपि कृतं पापं भ्रूणहत्यादिकं च यत्।<br>तत्सर्वं शूलदानेन भिन्द्यान्नारी न संशयः॥ १३<br><br>सायुज्यं चैवमाप्नोति भवान्या द्विजसत्तमाः।<br>कुर्याद्यद्वा नरः सोऽपि रुद्रसायुज्यमाप्नुयात्॥ १४ | स्त्रीको चाहिये कि वर्षपर्यन्त नियन्त्रित रहती हुई अमावस्याके दिन आहार ग्रहण न करे और वर्षके अन्तमें विधिपूर्वक त्रिशूल बनवाकर शिवको निवेदित करे तथा ईशानको स्नान कराकर हजार श्वेत कमलोंसे भक्तिपूर्वक उनका पूजन करे और सुवर्णमयी कर्णिकासे युक्त चाँदीका कमल शिवजीको समर्पित करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा भी प्रदान करे। वह स्त्री [शिवजीके निमित्त] त्रिशूलके दानसे जानबूझकर भ्रूणहत्या आदि जो भी पाप होता है, उन सबको ध्वस्त कर डालती है; इसमें सन्देह नहीं है और हे श्रेष्ठ द्विजो! वह भवानीका सायुज्य प्राप्त कर लेती है। यदि [कोई] मनुष्य इसे करता है, तो वह भी रुद्रसायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ १०–१४॥ |
| पौर्णमास्याममावास्यां वर्षमेकमतन्द्रिता।<br>उपवासरता नारी नरोऽपि द्विजसत्तमाः॥ १५<br><br>नियोगादेव तत्कार्यं भर्तॄणां द्विजसत्तमाः।<br>जपं दानं तपः सर्वमस्वतन्त्राः यतः स्त्रियः॥ १६ | हे श्रेष्ठ द्विजो! पूरे एक वर्षभर पूर्णमासी तथा अमावस्याको आलस्यरहित तथा उपवासपरायण होकर नारीको तथा नरको भी इसे करना चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो! पतिकी आज्ञासे ही स्त्रियोंको यह व्रत, जप, दान, तप—सब कुछ करना चाहिये; क्योंकि स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं हैं। हे सुव्रतो! वर्षके अन्तमें सभी प्रकारके गन्धोंसे युक्त उस |
अध्याय ८४] उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान ४११
| वर्षान्ते सर्वगन्धाढ्यां प्रतिमां सन्निवेदयेत्।<br>सा भवान्याश्च सायुज्यं सारूप्यं चापि सुव्रता ॥ १७<br><br>लभते नात्र सन्देहः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।<br>कार्तिक्यां वा तु या नारी एकभक्तेन वर्तते ॥ १८ | प्रतिमाको शिवको निवेदित कर देना चाहिये; वह सुव्रता [स्त्री] भवानीका सायुज्य तथा सारूप्य प्राप्त कर लेती है; इसमें सन्देह नहीं है, मैं यह पूर्णतः सत्य कह रहा हूँ॥ १५-१७ १/२ ॥ |
|---|---|
| क्षमाहिंसादिनियमैः संयुक्ता ब्रह्मचारिणी।<br>दद्यात्कृष्णतिलानां च भारमेकममन्द्रिता ॥ १९<br><br>सघृतं सगुडं चैव ओदनं परमेष्ठिने।<br>दत्त्वा च ब्राह्मणेभ्यश्च यथाविभवविस्तरम् ॥ २०<br><br>अष्टम्यां च चतुर्दश्यामुपवासरता च सा।<br>भवान्या मोदते सार्धं सारूप्यं प्राप्य सुव्रता ॥ २१ | जो स्त्री कार्तिक मासमें एक बार भोजन करती है, क्षमा-अहिंसा आदि नियमोंसे युक्त रहती है, ब्रह्मचर्यका पालन करती है, आलस्यरहित होकर एक भार* काला तिल तथा घृत-गुड़ मिलाकर पकाया भात परमेश्वरको निवेदित करती है, ब्राह्मणोंको अपने सामर्थ्यके अनुसार दान देती है और अष्टमी तथा चतुर्दशीको उपवास करती है—वह उत्तम व्रतवाली [स्त्री] भवानीका सारूप्य प्राप्त करके उनके साथ आनन्द मनाती है ॥ १८—२१ ॥ |
| क्षमा सत्यं दया दानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।<br>सर्वव्रतेष्वयं धर्मः सामान्यो रुद्रपूजनम्॥ २२ | समस्त व्रतोंमें क्षमा, सत्य, दया, दान, शुद्धि तथा इन्द्रियोंका निग्रह और रुद्रपूजन—यह सामान्य धर्म है॥ २२॥ |
| समासात्तुः प्रवक्ष्यामि प्रतिमासमनुक्रमात्।<br>मार्गशीर्षकमासादि कार्तिक्यान्तं यथाक्रमम् ॥ २३ | अब मैं संक्षेपमें क्रमसे मार्गशीर्षसे प्रारम्भ करके कार्तिकतक प्रत्येक महीनेके व्रतको बताऊँगा; इस परम पुण्यप्रद व्रतको [स्वयं] नन्दीने कहा था॥ २३ १/२ ॥ |
| व्रतं सुविपुलं पुण्यं नन्दिना परिभाषितम्।<br>मार्गशीर्षकमासेऽथ वृषं पूर्णाङ्गममुत्तमम् ॥ २४<br><br>अलङ्कृत्य यथान्यायं शिवाय विनिवेदयेत्।<br>सा च सार्धं भवान्या वै मोदते नात्र संशयः ॥ २५ | जो [स्त्री] मार्गशीर्ष मासमें पूर्ण अंगोंवाले उत्तम वृषभको अलंकृत करके विधिपूर्वक शिवको निवेदित करती है, वह भवानीके साथ आनन्दित रहती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २४-२५ ॥ |
| पुष्यमासे तु वै शूलं प्रतिष्ठाप्य निवेदयेत्।<br>पूर्वोक्तमखिलं कृत्वा भवान्या सह मोदते ॥ २६ | जो पौष मासमें पूर्वोक्त विधिके अनुसार सम्पूर्ण कृत्य करके त्रिशूलकी स्थापनाकर उसे [शिवको] समर्पित करती है, वह भवानीके साथ आनन्द मनाती है ॥ २६ ॥ |
| माघमासे रथं कृत्वा सर्वलक्षणलक्षितम्।<br>दद्यात्सम्पूज्य देवेशं ब्राह्मणांश्चैव भोजयेत् ॥ २७ | हे महाभाग मुनियो! जो माघ महीनेमें सभी लक्षणोंसे युक्त रथ बनाकर देवेशकी पूजा करके उसे शिवको समर्पित करती है और ब्राह्मणोंको भोजन कराती है, वह देवी [पार्वती]-के साथ आनन्द करती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २७ १/२ ॥ |
| सा च देव्या महाभागा मोदते नात्र संशयः।<br>फाल्गुने प्रतिमां कृत्वा हिरण्येन यथाविधि ॥ २८ | जो फाल्गुन मासमें अपने सामर्थ्यके अनुसार विधिपूर्वक सोने, चाँदी अथवा ताँबेकी प्रतिमा बनाकर |
* भारका परिमाण इस प्रकार है—
चतुर्भिर्व्रीहिभिर्गुञ्जं गुञ्जापञ्च पणं पलम्।
अष्टौ धरणमष्टौ च कर्ष तांश्चतुरः पलम्। तुलां पलशतं प्राहुर्भारं स्याद्विंशतिस्तुलाः॥
अर्थात् 'चार व्रीहि (धान)-की एक गुंजा, पाँच गुंजाका एक पण, आठ पणका एक धरण, आठ धरणका एक कर्ष, चार कर्षका एक पल, सौ पलकी एक तुला और बीस तुलाका एक भार कहलाता है।'
| ४१२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| श्लोक (मूल संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| राजतेनापि ताम्रेण यथाविभवविस्तरम्।<br>प्रतिष्ठाप्य समभ्यर्च्य स्थापयेच्छङ्करालये॥ २९<br>सा च सार्धं महादेव्या मोदते नात्र संशयः। | उसकी प्रतिष्ठा तथा पूजा करके शिवालयमें स्थापित करती है, वह महादेवके साथ आनन्दित रहती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २८-२९१/२ ॥ |
| चैत्रे भवं कुमारं च भवानीं च यथाविधि॥ ३०<br>ताम्राद्यैर्विधिवत्कृत्वा प्रतिष्ठाप्य यथाविधि।<br>भवान्या मोदते सार्धं दत्त्वा रुद्राय शम्भवे॥ ३१ | चैत्र मासमें ताँबे आदिसे शिव, कुमार (कार्तिकेय) तथा भवानीकी मूर्तियाँ यथाविधि बनाकर विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके उन्हें रुद्र शम्भुको अर्पण करनेसे स्त्री भवानीके साथ आनन्दित रहती है॥ ३०-३१॥ |
| कृत्वलयं हि कौबेरं रजतं रजतेन वै।<br>ईश्वरोमासमायुक्तं गणैशैश्च समन्ततः॥ ३२<br>सर्वरत्नसमायुक्तं प्रतिष्ठाप्य यथाविधि।<br>स्थापयेत्परमेशस्य भवस्यायतने शुभे॥ ३३<br>वैशाखे वै चरेदेवं कैलासाख्यं व्रतोत्तमम्।<br>कैलासपर्वतं प्राप्य भवान्या सह मोदते॥ ३४ | कुबेरका रजतमय कैलास आलय बनाकर उसे चारों ओरसे सभी रत्नोंसे युक्त करके उसमें शिव, उमा तथा गणेश्वरोंकी रजतमय मूर्ति रखकर उसकी यथाविधि प्रतिष्ठा करके उसे परमेश्वर शिवके सुन्दर मन्दिरमें स्थापित करना चाहिये; जो [स्त्री] वैशाख मासमें इस प्रकार कैलास नामक उत्तम व्रतको करती है, वह कैलासपर्वत पहुँचकर भवानीके साथ आनन्द करती है॥ ३२-३४॥ |
| ज्येष्ठे मासि महादेवं लिङ्गमूर्तिमुमापतिम्।<br>कृताञ्जलिपुटैनैव ब्रह्मणा विष्णुना तथा॥ ३५<br>मध्ये भवेन संयुक्तं लिङ्गमूर्तिं द्विजोत्तमाः।<br>हंसेन च वराहेण कृत्वा ताम्रादिभिः शुभाम्॥ ३६<br>प्रतिष्ठाप्य यथान्यायं ब्राह्मणान् भोजयेत्ततः।<br>शिवाय शिवमासाद्य शिवस्थाने यथाविधि॥ ३७ | हे उत्तम ब्राह्मणो ! ज्येष्ठ मासमें उमापति महादेवकी ताम्र आदिसे एक शुभ्र लिङ्गमूर्ति बनवाये, जो हाथ जोड़े हुए हंसपर सवार ब्रह्मा तथा वाराहपर सवार विष्णुसे संयुक्त हो और मध्यमें भव (महेश्वर) विराजमान हों—ऐसी लिङ्गमूर्ति बनवाकर विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करनेके अनन्तर ब्राह्मणोंको भोजन कराये और अपने कल्याणके लिये शिवको प्रसन्न करके ब्राह्मणोंको साथ लेकर शिवालयमें उसे विधिपूर्वक स्थापित करके वह देवीका सायुज्य प्राप्त कर लेती है॥ ३५-३७॥ |
| ब्राह्मणैः सहितां स्थाप्य देव्याः सायुज्यमाप्नुयात्।<br>आषाढे च शुभे मासे गृहं कृत्वा सुशोभनम्॥ ३८<br>पक्वेष्टकाभिर्विधिवद्यथाविभवविस्तरम् ।<br>सर्वबीजरसैश्चापि सम्पूर्णं सर्वशोभनैः॥ ३९<br>गृहोपकरणैश्चैव मुसलोलूखलादिभिः।<br>दासीदासादिभिश्चैव शयनैरशनादिभिः॥ ४०<br>सम्पूर्णंश्च गृहं वस्त्रैराच्छाद्य च समन्ततः।<br>देवं घृतादिभिः स्नाप्य महादेवमुमापतिम्॥ ४१<br>ब्राह्मणानां सहस्त्रं च भोजयित्वा यथाविधि।<br>विद्याविनयसम्पन्नं ब्राह्मणं वेदपारगम्॥ ४२<br>प्रथमाश्रमिणं भक्त्या सम्पूज्य च यथाविधि।<br>कन्यां सुमध्यमां यावत्कालजीवनसंयुताम्॥ ४३<br>क्षेत्रं गोमिथुनं चैव तद्गृहे च निवेदयेत्।<br>सायनैर्विविधैर्दिव्यैर्मेरुपर्वतसन्निभैः ॥ ४४ | जो स्त्री शुभ आषाढ़ महीनेमें अपने सामर्थ्यके अनुसार पके हुए ईंटोंसे विधिवत् गृह बनवाकर उसे सभी बीजरसोंसे, परम सुन्दर मूसल-उलूखल आदि गृहोपयोगी सामग्रियोंसे, दास-दासी आदिसे, [पलंग-विस्तर आदि] शयन-वस्तुओंसे, [अन्न आदि] खाद्य पदार्थोंसे युक्त करके उस गृहको सभी ओरसे पूर्ण वस्त्रोंसे ढँककर उमापति प्रभु महादेवको घृत आदिसे स्नान कराकर विधिपूर्वक एक हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर विद्या-विनयसे सम्पन्न तथा वेदमें पारंगत ब्रह्मचारी ब्राह्मणकी भक्तिपूर्वक यथाविधि पूजा करके पूर्ण जीवनभरके लिये एक परम सुन्दरी कन्या, क्षेत्र (खेत), गोमिथुन और मेरुपर्वतके समान महाराशिवाले अनेक प्रकारके दिव्य सामानोंसहित |
अध्याय ८४] उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान ४१३
| श्लोक | अर्थ |
|---|---|
| गोलोकं समनुप्राप्य भवान्या सह मोदते।<br>भवान्या सदृशी भूत्वा सर्वकल्पेषु साव्यया॥ ४५<br><br>भवान्याश्चैव सायुज्यं लभते नात्र संशयः।<br>सर्वधातुसमाकीर्णं विचित्रध्वजशोभितम्॥ ४६ | वह गृह [शिवको] समर्पित करती है; वह गोलोक प्राप्त करके भवानीके साथ आनन्द करती है, भवानीके सदृश होकर सभी कल्पोंमें अव्यय (शाश्वत) बनी रहती है और [अन्तमें] भवानीका सायुज्य प्राप्त करती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३८—४५ १/२ ॥ |
| निवेदयीत शर्वाय श्रावणे तिलपर्वतम्।<br>वितानध्वजवस्त्राद्यैर्धातुभिश्च निवेदयेत्॥ ४७<br><br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च पूर्वोक्तमखिलं भवेत्।<br>कृत्वा भाद्रपदे मासि शोभनं शालिपर्वतम्॥ ४८ | सावन महीनेमें सभी धातुओंसे युक्त तथा विचित्र ध्वजोंसे सुशोभित तिलपर्वत शिवको समर्पित करना चाहिये। जो [स्त्री] वितान, ध्वज, वस्त्र, धातु आदि सहित तिलपर्वत निवेदित करती है और [अन्तमें] ब्राह्मणोंको भोजन कराती है, उसे पूर्वमें कहा गया सबकुछ प्राप्त हो जाता है॥ ४६-४७ १/२ ॥ |
| वितानध्वजवस्त्राद्यैर्धातुभिश्च निवेदयेत्।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च दापयेच्च यथाविधि॥ ४९<br><br>सा च सूर्यांशुसङ्काशा भवान्या सह मोदते।<br>कृत्वा चाश्वयुजे मासि विपुलं धान्यपर्वतम्॥ ५० | जो भाद्रपद मासमें वितान, ध्वज, वस्त्र, धातु आदिसहित शालि चावलका सुन्दर पर्वत बनाकर उसे शिवको समर्पित करती है और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर विधिपूर्वक उसका दान करती है, वह सूर्यकी किरणोंके समान होकर भवानीके साथ आनन्द करती है॥ ४८-४९ १/२ ॥ |
| सुवर्णवस्त्रसंयुक्तं दत्त्वा सम्पूज्य शङ्करम्।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च पूर्वोक्तमखिलं भवेत्॥ ५१<br><br>सर्वधान्यसमायुक्तं सर्वबीजरसादिभिः।<br>सर्वधातुसमायुक्तं सर्वरत्नोपशोभितम्॥ ५२<br><br>शृङ्गैश्चतुर्भिः संयुक्तं वितानच्छत्रशोभितम्।<br>गन्धमाल्यैस्तथा धूपैश्चित्रैश्चापि सुशोभितम्॥ ५३<br><br>विचित्रैर्नृत्यगेयैश्च शङ्खवीणादिभिस्तथा।<br>ब्रह्मघोषैर्महापुण्यं मङ्गलैश्च विशेषतः॥ ५४<br><br>महाध्वजाष्टसंयुक्तं विचित्रकुसु्मोज्ज्वलम्।<br>नगेन्द्रं मेरुनामानं त्रैलोक्याधारमुत्तमम्॥ ५५<br><br>तस्य मूर्ध्नि शिवं कुर्यान्मध्यतो धातुनैव तु।<br>दक्षिणे च यथान्यायं ब्रह्माणं च चतुर्मुखम्॥ ५६<br><br>उत्तरे देवदेवेशं नारायणमनामयम्।<br>इन्द्रादिलोकपालांश्च कृत्वा भक्त्या यथाविधि॥ ५७<br><br>प्रतिष्ठाप्य ततः स्नाप्य समभ्यर्च्य महेश्वरम्।<br>देवस्य दक्षिणे हस्ते शूलं त्रिदशपूजितम्॥ ५८ | आश्विन महीनेमें सुवर्ण तथा वस्त्रसे युक्त एक विशाल धान्यपर्वत बनाकर उसे शिवको अर्पण करके शंकरकी विधिवत् पूजा करके ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे पूर्वमें कहा गया सबकुछ प्राप्त हो जाता है। तीनों लोकोंके आधारस्वरूप मेरु नामक उत्तम पर्वतराजका निर्माण करे, जो सभी धान्योंसे युक्त हो, सभी बीजों तथा रसोंसे परिपूर्ण हो, सभी धातुओंसे संयुक्त हो, सभी रत्नोंसे सुशोभित हो, चार शृंगों (शिखर)-से युक्त हो, वितान तथा छत्रसे सुशोभित हो, गन्ध-पुष्प एवं अद्भुत धूपोंसे सुशोभित हो, विचित्र नृत्य-गानोंसे शोभायमान हो, शंख-वीणाकी ध्वनियोंसे युक्त हो, वेदध्वनियोंसे और विशेषकर मंगलसूचक प्रार्थना आदिसे अत्यन्त पवित्र हो, आठ बड़ी ध्वजाओंसे युक्त हो और विचित्र पुष्पोंसे सुशोभित हो। उस [पर्वत]-के शिखरपर मध्यमें धातुनिर्मित शिवको विराजमान करे। दक्षिणमें चतुर्मुख ब्रह्मा, उत्तरमें निर्विकार देवदेवेश नारायण, इन्द्र आदि लोकपालोंको भक्तिपूर्वक यथाविधि विराजमान करके उनकी प्रतिष्ठा करनेके अनन्तर स्नान कराकर महेश्वरकी पूजा करके महादेवके दाहिने हाथमें देवपूजित त्रिशूल तथा बायें हाथमें पाश, भवानीके |
| ४१४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |
| वामे पाशं भवान्याश्च कमलं हेमभूषितम्।<br>विष्णोश्च शङ्खं चक्रं च गदामब्जं प्रयत्नतः ॥ ५९<br>ब्रह्मणश्चाक्षसूत्रं च कमण्डलुमनुत्तमम्।<br>इन्द्रस्य वज्रमग्नेश्च शक्त्याख्यं परमायुधम् ॥ ६०<br>यमस्य दण्डं निर्ऋतेः खड्गं निशिचरस्य तु।<br>वरुणस्य महापाशं नागाख्यं रुद्रमद्भुतम् ॥ ६१<br>वायोर्यष्टिं कुबेरस्य गदां लोकप्रपूजिताम्।<br>टङ्कं चेशानदेवस्य निवेद्यैवं क्रमेण च ॥ ६२<br>शिवस्य महतीं पूजां कृत्वा चरुसमन्विताम्।<br>पूजयेत्सर्वदेवांश्च यथाविभवविस्तरम् ॥ ६३<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च पूजां कृत्वा प्रयत्नतः।<br>महामेरुव्रतं कृत्वा महादेवाय दापयेत् ॥ ६४<br>महामेरुमनुप्राप्य महादेव्या प्रमोद्ते।<br>चिरं सायुज्यमाप्नोति महादेव्या न संशयः ॥ ६५ | हाथमें हेमभूषित कमल, विष्णुके हाथोंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म, ब्रह्माके हाथोंमें अक्षमाला तथा उत्तम कमण्डलु, इन्द्रके हाथमें वज्र, अग्निके हाथमें शक्ति नामक महान् आयुध, यमके हाथमें दण्ड, निशिचर निर्ऋतिके हाथमें खड्ग, वरुणके हाथमें नाग नामक भयंकर तथा अद्भुत महापाश, वायुदेवके हाथमें यष्टि (छड़ी), कुबेरके हाथमें लोकपूजित गदा और ईशान देवके हाथमें टंक—इस प्रकार क्रमसे निवेदित करके शिवकी चरुसमन्वित महान् पूजा करके अपने सामर्थ्यके अनुसार सभी देवताओंकी पूजा करे। इसके बाद ब्राह्मणोंको भोजन कराकर प्रयत्नपूर्वक उनका सम्मान करके महामेरुव्रत सम्पन्नकर महादेवको समर्पित कर दे। ऐसा करनेवाली स्त्री महामेरुपर्वत पहुँचकर महादेवीके साथ आनन्द करती है और चिरकालतक महादेवीका सायुज्य प्राप्त किये रहती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५०-६५॥ | | कार्तिक्यामपि या नारी कृत्वा देवीमुमां शुभाम्।<br>सर्वाभरणसम्पूर्णां सर्वलक्षणलक्षिताम् ॥ ६६<br>हेमताम्रादिभिश्चैव प्रतिष्ठाप्य विधानतः।<br>देवं च कृत्वा देवेशं सर्वलक्षणसंयुतम् ॥ ६७<br>तयोरग्रे हुताशं च स्रुवहस्तं पितामहम्।<br>नारायणं च दातारं सर्वाभरणभूषितम् ॥ ६८<br>लोकपालैस्तथा सिद्धैः संवृतं स्थाप्य यत्नतः।<br>रुद्रालये व्रतं तस्मै दापयेद्भक्तिपूर्वकम् ॥ ६९ | जो स्त्री कार्तिक मासमें सोने अथवा ताँबेकी सभी आभरणोंसे युक्त तथा सभी लक्षणोंसे समन्वित देवी उमाकी सुन्दर प्रतिमा बनाकर; साथ ही देवेश महादेवकी भी सभी लक्षणोंसे युक्त मूर्ति बनाकर विधानपूर्वक उनकी प्रतिष्ठा करके उन दोनोंके सम्मुख अग्निको, हाथमें स्रुव लिये हुए ब्रह्माको और लोकपालों तथा सिद्धोंसे घिरे हुए एवं सभी आभूषणोंसे विभूषित कन्या-दाता नारायणको यत्नपूर्वक स्थापित करके भक्तिपूर्वक इस व्रतको रुद्रालयमें उन [शिव]-को समर्पित करती है, वह भवानीका स्वरूप प्राप्त करके शिवके साथ आनन्द करती है॥ ६६-६९ १/२ ॥ | | सा भवान्यास्तनुं गत्वा भवेन सह मोदते।<br>एकभक्तव्रतं पुण्यं प्रतिमासमनुक्रमात् ॥ ७०<br>मार्गशीर्षकमासादिकार्तिकान्तं प्रवर्तितम्।<br>नरनार्यादिजन्तूनां हिताय मुनिसत्तमाः ॥ ७१<br>नरः कृत्वा व्रतं चैव शिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>नारी देव्या न सन्देहः शिवेन परिभाषितम् ॥ ७२ | एक बार भोजन करके प्रत्येक मासके पुण्यप्रद व्रतको क्रमसे करे; हे श्रेष्ठ मुनियो! नर, नारी आदि प्राणियोंके कल्याणके लिये मार्गशीर्षसे आरम्भ करके कार्तिकतक किये जानेवाले इस व्रतको प्रवर्तित किया गया है। शिवके द्वारा बताये गये इस व्रतको करके पुरुष शिवका सायुज्य प्राप्त करता है और नारी देवी [पार्वती]-का सायुज्य प्राप्त करती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७०-७२ ॥ |
॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उमामहेश्वरव्रतं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उमामहेश्वरव्रत' नामक चौरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८४ ॥
८५- पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा
अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४१५
पचासीवाँ अध्याय
पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>सर्वव्रतेषु सम्पूज्य देवदेवमुमापतिम्।<br>जपेत्पञ्चाक्षरीं विद्यां विधिनैव द्विजोत्तमाः॥ १<br><br>जपादेव न सन्देहो व्रतानां वै विशेषतः।<br>समाप्तिर्नान्यथा तस्माज्जपेत्पञ्चाक्षरीं शुभाम्॥ २ | सूतजी बोले— हे श्रेष्ठ द्विजो! समस्त व्रतोंमें देवदेव उमापतिकी पूजा करके विधिपूर्वक पंचाक्षरीविद्या (मन्त्र)-का जप करना चाहिये। जपसे ही विशेषकर व्रतोंकी पूर्णता होती है, अन्यथा नहीं; इसमें सन्देह नहीं है। अतः उत्तम पंचाक्षरीविद्याका जप [अवश्य] करना चाहिये॥ १-२॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>कथं पञ्चाक्षरी विद्या प्रभावो वा कथं वद।<br>क्रमोपायं महाभाग श्रोतुं कौतूहलं हि नः॥ ३ | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] पंचाक्षरीविद्या क्या है और इसका प्रभाव कैसा होता है? हे महाभाग! क्रमसे इसकी विधि बताइये; इसे सुननेकी हमलोगोंकी [बड़ी] उत्सुकता है॥ ३॥ |
| सूत उवाच<br>पुरा देवेन रुद्रेण देवदेवेन शम्भुना।<br>पार्वत्याः कथितं पुण्यं प्रवदामि समासतः॥ ४ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] पूर्वकालमें देवदेव रुद्र भगवान् शम्भुके द्वारा पार्वतीसे कहे गये इस पुण्यप्रद मन्त्रको मैं संक्षेपमें बता रहा हूँ॥ ४॥ |
| श्रीदेव्युवाच<br>भगवन् देवदेवेश सर्वलोकमहेश्वर।<br>पञ्चाक्षरस्य माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥ ५ | श्रीदेवी बोलीं— हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे सर्वलोक-महेश्वर! मैं यथार्थरूपसे पंचाक्षरमन्त्रका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ॥ ५॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>पञ्चाक्षरस्य माहात्म्यं वर्षकोटिशतैरपि।<br>न शक्यं कथितुं देवि तस्मात्सङ्क्षेपतः शृणु॥ ६ | श्रीभगवान् बोले— हे देवि! सौ करोड़ वर्षोंमें भी पंचाक्षरमन्त्रका माहात्म्य नहीं कहा जा सकता है; अतः इसे संक्षेपमें सुनिये॥ ६॥ |
| प्रलये समनुप्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>नष्टे देवासुरे चैव नष्टे चोरगराक्षसे॥ ७ | हे देवि! प्रलयके उपस्थित होनेपर जब समस्त |
| ४१६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| सर्वं प्रकृतिमापन्नं त्वया प्रलयमेष्यति।<br>एकोऽहं संस्थितो देवि न द्वितीयोऽस्ति कुत्रचित्॥ ८<br><br>तस्मिन् वेदाश्च शास्त्राणि मन्त्रे पञ्चाक्षरे स्थिताः।<br>ते नाशं नैव सम्प्राप्ता मच्छक्त्या ह्यनुपालिताः॥ ९ | चराचर जगत्, देवता तथा असुर, नाग एवं राक्षस नष्ट हो जाते हैं और आपसहित सभी पदार्थ प्रकृतिमें लीन होकर प्रलयको प्राप्त हो जाते हैं, उस समय एकमात्र मैं रह जाता हूँ; दूसरा कुछ भी नहीं रह जाता है। उस समय सभी वेद तथा शास्त्र उसी पंचाक्षरमन्त्रमें स्थित रहते हैं; मेरी शक्तिसे अनुपालित होनेके कारण वे नष्ट नहीं होते हैं॥७-९॥ | | अहमेको द्विधाप्यासं प्रकृत्यात्मप्रभेदतः।<br>स तु नारायणः शेते देवो मायामयीं तनुम्॥ १०<br><br>आस्थाय योगपर्यङ्कशयने तोयमध्यगः।<br>तन्नाभिपङ्कजाज्जातः पञ्चवक्त्रः पितामहः॥ ११<br><br>सिसृक्षमाणो लोकान् वै त्रीनशक्तोऽसहायवान्।<br>दश ब्रह्मा ससर्जादौ मानसानमितौजसः॥ १२ | मैं एक होता हुआ भी उस समय प्रकृति तथा आत्माके भेदसे दो रूपोंमें रहता हूँ। वे भगवान् नारायण मायामय शरीर धारणकर जलके मध्यमें योगरूपी पर्यंकपर शयन करते हैं। उनके नाभिकमलसे पाँच मुखवाले ब्रह्मा उत्पन्न हुए; तीनों लोकोंका सृजन करनेकी इच्छावाले उन ब्रह्माने [इस कार्यमें] असमर्थ तथा सहायकविहीन होनेके कारण प्रारम्भमें अमित तेजवाले दस मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया॥१०-१२॥ | | तेषां सृष्टिप्रसिद्ध्यर्थं मां प्रोवाच पितामहः।<br>मत्पुत्राणां महादेव शक्तिं देहि महेश्वर॥ १३<br><br>इति तेन समादिष्टः पञ्चवक्त्रधरो ह्यहम्।<br>पञ्चाक्षरान् पञ्चमुखैः प्रोक्तवान् पद्मयोनये॥ १४<br><br>तान् पञ्चवदनैर्गृह्णन् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>वाच्यवाचकभावेन ज्ञातवान् परमेश्वरम्॥ १५<br><br>वाच्यः पञ्चाक्षरैर्देवि शिवस्त्रैलोक्यपूजितः।<br>वाचकः परमो मन्त्रस्तस्य पञ्चाक्षरः स्थितः॥ १६ | उनकी सृष्टिकी वृद्धिके लिये ब्रह्माने मुझसे कहा—'हे महादेव! हे महेश्वर! मेरे पुत्रोंको शक्ति प्रदान कीजिये।' उनके ऐसा कहनेपर पाँच मुख धारण करनेवाले मैंने कमल्योनि (ब्रह्मा)-के लिये [अपने] पाँचमुखोंसे पाँच अक्षरोंका उच्चारण किया। अपने पाँच मुखोंसे उन [अक्षरों]-को ग्रहण करते हुए लोकपितामह ब्रह्माने वाच्यवाचक भावसे परमेश्वरको जान लिया। हे देवि! तीनों लोकोंमें पूजित शिव पंचाक्षरोंसे वाच्य हैं और [यह] परम पंचाक्षरमन्त्र उनके वाचकके रूपमें स्थित है॥१३-१६॥ | | ज्ञात्वा प्रयोगं विधिना च सिद्धिं<br>लब्ध्वा तथा पञ्चमुखो महात्मा।<br>प्रोवाच पुत्रेषु जगद्धिताय<br>मन्त्रं महार्थं किल पञ्चवर्णम्॥ १७ | पाँच मुखवाले महात्मा ब्रह्माने विधिपूर्वक इसके प्रयोगको जानकर तथा सिद्धि प्राप्त करके जगत्के कल्याणके लिये अपने पुत्रोंको महान् अर्थवाले इस पंचाक्षरमन्त्रका उपदेश किया॥१७॥ | | ते लब्ध्वा मन्त्ररत्नं तु साक्षाल्लोकपितामहात्।<br>तमाराधयितुं देवं परात्परतरं शिवम्॥ १८ | तदनन्तर साक्षात् लोकपितामहसे इस मन्त्ररत्नको प्राप्तकर वे उन परात्पर देव शिवकी आराधना करनेमें तत्पर हो गये॥१८॥ | | ततस्तुतोष भगवान् त्रिमूर्तीनां परः शिवः।<br>दत्तवानखिलं ज्ञानमणिमादिगुणाष्टकम्॥ १९ | तब त्रिदेवोंमें श्रेष्ठ भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और उन्होंने उन्हें सम्पूर्ण ज्ञान तथा अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ प्रदान कीं॥१९॥ |
अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४१७
| श्लोक (संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेऽपि लब्ध्वा वरान् विप्रास्तदाराधनकाङ्क्षिणः।<br>मेरोस्तु शिखरे रम्ये मुञ्जवान्नाम पर्वतः॥ २०<br><br>मत्प्रियः सततं श्रीमान् मद्भूतैः परिरक्षितः।<br>तस्याभ्याशे तपस्तीव्रं लोकसृष्टिसमुत्सुकाः॥ २१<br><br>दिव्यवर्षसहस्रं तु वायुभक्षाः समाचरन्।<br>तिष्ठन्तोऽनुग्रहार्थाय देवि ते ऋषयः पुरा॥ २२ | तत्पश्चात् [उन] वरोंको प्राप्तकर वे विप्र [मेरी] आराधनाकी आकांक्षा करने लगे। मेरुके रम्य शिखरपर मुंजवान् नामक पर्वत है। शोभासम्पन्न यह पर्वत मुझे प्रिय है और मेरे भूतोंके द्वारा भलीभाँति रक्षित है। हे देवि! पूर्वकालमें उस [पर्वत]-के समीप स्थित रहते हुए लोकसृष्टिके इच्छुक उन ऋषियोंने मेरे अनुग्रहहेतु वायुके आहारपर रहकर हजार दिव्य वर्षोंतक कठोर तप किया॥ २०–२२॥ |
| तेषां भक्तिमहं दृष्ट्वा सद्यः प्रत्यक्षतामियाम्।<br>पञ्चाक्षरमृषिच्छन्दो दैवतं शक्तिबीजवत्॥ २३<br><br>न्यासं षडङ्गं दिग्बन्धं विनियोगमशेषतः।<br>प्रोक्तवानहमार्याणां लोकानां हितकाम्यया॥ २४ | [हे देवि!] उनकी भक्ति देखकर मैं शीघ्र ही उनके समक्ष प्रकट हो गया और मैंने लोकोंके कल्याणकी इच्छासे उन महात्माओंको पंचाक्षरमन्त्र, उसके ऋषि, छन्द, देवता, शक्ति, बीजसहित षडंग न्यास, दिग्बन्ध तथा विनियोग पूर्ण रूपसे बता दिया॥ २३-२४॥ |
| तच्छ्रुत्वा मन्त्रमाहात्म्यमृषयस्ते तपोधनाः।<br>मन्त्रस्य विनियोगं च कृत्वा सर्वमनुष्ठिताः॥ २५<br><br>तन्माहात्म्यात्तदा लोकान् सदेवासुरमानुषान्।<br>वर्णान् वर्णविभागांश्च सर्वधर्मांश्च शोभनान्॥ २६<br><br>पूर्वकल्पसमुद्भूताञ्छ्रुतवन्तो यथा पुरा।<br>पञ्चाक्षरप्रभावाच्च लोका वेदा महर्षयः॥ २७<br><br>तिष्ठन्ति शाश्वता धर्मा देवाः सर्वमिदं जगत्।<br>तदिदानीं प्रवक्ष्यामि शृणु चावहिताखिलम्॥ २८ | उस मन्त्रका माहात्म्य सुनकर उन तपोधन ऋषियोंने मन्त्रका विनियोग करके सभी अनुष्ठान पूर्ण किये। उसके बाद उन्होंने उस मन्त्रकी महिमासे लोकों, देवताओं, असुरों, मनुष्यों, वर्णों, वर्णविभागों तथा समस्त उत्तम धर्मोंको जो पूर्व कल्पमें उत्पन्न हुए थे—उन सबका श्रवण किया। पंचाक्षरमन्त्रके प्रभावसे ही लोक, वेद, महर्षिगण, शाश्वत धर्म, देवता तथा यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है। अब मैं उसके विषयमें सब कुछ बताऊँगा; सावधान होकर सुनिये॥ २५–२८॥ |
| अल्पाक्षरं महार्थं च वेदसारं विमुक्तिदम्।<br>आज्ञासिद्धमसन्दिग्धं वाक्यमेतच्छिवात्मकम्॥ २९ | यह मन्त्र अल्प अक्षरोंवाला, महान् अर्थोंवाला, वेदोंका सार, मुक्तिप्रद, आज्ञासिद्ध, असन्दिग्ध तथा शिवस्वरूप है॥ २९॥ |
| नानासिद्धियुतं दिव्यं लोकचित्तानुरञ्जकम्।<br>सुनिश्चितार्थं गम्भीरं वाक्यं मे पारमेश्वरम्॥ ३० | यह मेरा मन्त्र अनेक सिद्धियोंसे युक्त, अलौकिक, लोगोंके चित्तको आनन्दित करनेवाला, सुनिश्चित अर्थोंवाला, गम्भीर तथा परमेश्वरस्वरूप है॥ ३०॥ |
| मन्त्रं मुखसुखोच्चार्यमशेषार्थप्रसाधकम्।<br>तद्बीजं सर्वविद्यानां मन्त्रमाद्यं सुशोभनम्॥ ३१<br><br>अतिसूक्ष्मं महार्थं च ज्ञेयं तद्वटबीजवत्।<br>वेदः स त्रिगुणातीतः सर्वज्ञः सर्वकृत्प्रभुः॥ ३२ | यह मन्त्र मुखसे सुखपूर्वक उच्चारणयोग्य, सम्पूर्ण प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाला, सभी विद्याओंका बीजस्वरूप, आद्य (सबसे पहला) मन्त्र, परम सुन्दर, अति सूक्ष्म एवं महान् अर्थोंवाला है। इसे वटवृक्षके बीजकी भाँति समझना चाहिये। यह वेदस्वरूप, तीनों गुणोंसे परे, सर्वज्ञ, सब कुछ करनेवाला तथा सर्वसमर्थ है॥ ३१-३२॥ |
| ओमित्येकाक्षरं मन्त्रं स्थितः सर्वगतः शिवः।<br>मन्त्रे षडक्षरे सूक्ष्मे पञ्चाक्षरतनूः शिवः॥ ३३ | ॐ—यह एक अक्षरवाला मन्त्र है; सर्वव्यापी |
| ४१८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वाच्यवाचकभावेन स्थितः साक्षात्स्वभावतः।<br>वाच्यः शिवः प्रमेयत्वान्मन्त्रस्तद्वाचकः स्मृतः॥ ३४<br>वाच्यवाचकभावोऽयमनादिः संस्थितस्तयोः।<br>वेदे शिवागमे वापि यत्र यत्र षडक्षरः॥ ३५<br>मन्त्रः स्थितः सदा मुख्यो लोके पञ्चाक्षरो मतः।<br>किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः शास्त्रैर्वा बहुविस्तृतैः॥ ३६<br>यस्यैवं हृदि संस्थोऽयं मन्त्रः स्यात्पारमेश्वरः।<br>तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम्॥ ३७<br>यो विद्वान् वै जपेत्सम्यगधीत्यैव विधानतः।<br>एतावद्धि शिवज्ञानमेतावत्परमं पदम्॥ ३८<br>एतावद् ब्रह्मविद्या च तस्मान्नित्यं जपेद् बुधः।<br>पञ्चाक्षरैः सप्रणवो मन्त्रोऽयं हृदयं मम॥ ३९<br>गुह्याद् गुह्यतरं साक्षान्मोक्षज्ञानमनुत्तमम्। | शिव इसमें स्थित रहते हैं। पाँच अक्षररूपी शरीरवाले शिव स्वभावसे ही सूक्ष्म षडक्षर (छः अक्षरोंवाले)-मन्त्रमें वाच्य-वाचक भावसे विराजमान हैं। प्रमेयत्वके कारण शिव वाच्य हैं तथा मन्त्र उनका वाचक कहा गया है। यह वाच्य-वाचक भाव (सम्बन्ध) उन दोनोंमें अनादि है। वेद अथवा शिवागममें षडक्षरमन्त्र स्थित है; किंतु लोकमें पंचाक्षरमन्त्रको मुख्य माना गया है। जिसके हृदयमें परमेश्वररूप यह मन्त्र स्थित है उसे बहुत मन्त्रों अथवा अतिविस्तृत शास्त्रोंसे क्या प्रयोजन! जो विद्वान् विधानपूर्वक इसका ज्ञान प्राप्तकर इसे ठीक-ठीक जपता है, उसने मानो वेदोंका अध्ययन कर लिया और सबकुछ अनुष्ठित कर लिया। मात्र यही शिवज्ञान है, यही परम पद है और यही ब्रह्मविद्या है; अतः विद्वान्को नित्य इसका जप करना चाहिये। प्रणव (ॐ)-सहित पाँच अक्षरोंसे युक्त यह मन्त्र [ॐ नमः शिवाय] मेरा हृदय है। यह गूढ़से भी गूढ़ है और साक्षात् सर्वोत्तम मोक्षज्ञान है॥ ३३-३९ १/२॥ |
| अस्य मन्त्रस्य वक्ष्यामि ऋषिच्छन्दोऽधिदैवतम्॥ ४०<br>बीजं शक्तिं स्वरं वर्णं स्थानं चैवाक्षरं प्रति।<br>वामदेवो नाम ऋषिः पङ्क्तिश्छन्द उदाहृतः॥ ४१<br>देवता शिव एवाहं मन्त्रस्यास्य वरानने।<br>नकारादीनि बीजानि पञ्चभूतात्मकानि च॥ ४२<br>आत्मानं प्रणवं विद्धि सर्वव्यापिनमव्ययम्।<br>शक्तिस्त्वमेव देवेशि सर्वदेवनमस्कृते॥ ४३<br>त्वदीयं प्रणवं किञ्चिन्मदीयं प्रणवं तथा।<br>त्वदीयं देवि मन्त्राणां शक्तिभूतं न संशयः॥ ४४<br>अकारोकारमकारा मदीये प्रणवे स्थिताः। | [हे देवि!] अब मैं इस मन्त्रके और प्रत्येक अक्षरके ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति, स्वर, वर्ण तथा स्थानका वर्णन करूँगा। इस मन्त्रके ऋषि वामदेव तथा छन्द पंक्ति कहा गया है। हे वरानने! इस मन्त्रका देवता [स्वयं] मैं शिव ही हूँ। पंचभूतस्वरूप 'न'कार आदि इसके बीज हैं। प्रणवको सर्वव्यापी तथा शाश्वत आत्मा समझो। हे सभी देवताओंसे नमस्कृत देवेशि! [स्वयं] तुम ही इसकी शक्ति हो। कुछ प्रणव तुम्हारा है और कुछ प्रणव हमारा है। हे देवि! तुम्हारा प्रणव सभी मन्त्रोंका शक्तिस्वरूप है; इसमें संशय नहीं है॥ ४०-४४॥ |
| उकारं च मकारं च अकारं च क्रमेण वै॥ ४५<br>त्वदीयं प्रणवं विद्धि त्रिमात्रं प्लुतमुत्तमम्।<br>ओङ्कारस्य स्वरोदात्त ऋषिर्ब्रह्मा सितं वपुः॥ ४६<br>छन्दो देवी च गायत्री परमात्माधिदेवता।<br>उदात्तः प्रथमस्तद्वच्चतुर्थश्च द्वितीयकः॥ ४७<br>पञ्चमः स्वरितश्चैव मध्यमो निषधः स्मृतः।<br>नकारः पीतवर्णश्च स्थानं पूर्वमुखं स्मृतम्॥ ४८ | हे देवि! 'अ', 'उ', 'म' मेरे प्रणवमें स्थित हैं। क्रमसे 'उ', 'म', 'अ' तुम्हारे प्रणवके हैं; तुम इस उत्तम प्रणवको प्लुत तीन मात्राओंवाला जानो। ओंकारका स्वर उदात्त है, इसके ऋषि ब्रह्मा हैं, इसका शरीर श्वेत है, छन्द देवी गायत्री हैं और इसके अधिदेवता परमात्मा हैं। इसका पहला, दूसरा तथा चौथा वर्ण उदात्त; पाँचवाँ वर्ण स्वरित और मध्यम वर्ण निषध [निषादस्वर] कहा गया है॥ ४५-४७ १/२॥ |
अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४१९
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| इन्द्रोऽधिदैवतं छन्दो गायत्री गौतमो ऋषिः।<br>मकारः कृष्णवर्णोऽस्य स्थानं वै दक्षिणामुखम्॥ ४९<br><br>छन्दोऽनुष्टुप् ऋषिश्चात्री रुद्रो दैवतमुच्यते।<br>शिकारो धूम्रवर्णोऽस्य स्थानं वै पश्चिमं मुखम्॥ ५०<br><br>विश्वामित्र ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्दो विष्णुस्तु दैवतम्।<br>वाकारो हेमवर्णोऽस्य स्थानं चैवोत्तरं मुखम्॥ ५१<br><br>ब्रह्माधिदैवतं छन्दो बृहती चाङ्गिरा ऋषिः।<br>यकारो रक्तवर्णश्च स्थानमूर्ध्वं मुखं विराट्॥ ५२<br><br>छन्दो ऋषिर्भरद्वाजः स्कन्दो दैवतमुच्यते।<br>न्यासमस्य प्रवक्ष्यामि सर्वसिद्धिकरं शुभम्॥ ५३ | ‘न’ पीले रंगका है और स्थान पूर्वमुख (पूरबकी ओर मुखवाला) कहा गया है। इसके अधिदेवता इन्द्र हैं, इसका छन्द गायत्री है और इसके ऋषि गौतम हैं। ‘म’ कृष्ण वर्णवाला है, इसका स्थान दक्षिणमुख है, इसका छन्द अनुष्टुप् है, इसके ऋषि अत्रि हैं और इसके अधिदेवता रुद्र कहे जाते हैं। ‘शि’ धूम्र वर्णवाला है, इसका स्थान पश्चिममुख है, इसके ऋषि विश्वामित्र हैं, इसका छन्द त्रिष्टुप् है और इसके देवता विष्णु हैं। ‘वा’ हेम वर्णवाला है, इसका स्थान उत्तरमुख है, इसके अधिदेवता ब्रह्मा हैं, इसका छन्द बृहती है और इसके ऋषि अंगिरा हैं। ‘य’ लाल रंगवाला है, इसका स्थान ऊर्ध्वमुख है, इसका छन्द विराट् है, इसके ऋषि भरद्वाज हैं और इसके देवता स्कन्द कहे जाते हैं॥ ४८—५२ १/२॥ |
| सर्वपापहरं चैव त्रिविधो न्यास उच्यते।<br>उत्पत्तिस्थितिसंहारभेदतस्त्रिविधः स्मृतः॥ ५४<br><br>ब्रह्मचारिगृहस्थानां यतीनां क्रमशो भवेत्।<br>उत्पत्तिर्ब्रह्मचारीणां गृहस्थानां स्थितिः सदा॥ ५५<br><br>यतीनां संहृतिन्यासः सिद्धिर्भवति नान्यथा।<br>अङ्गन्यासः करन्यासो देहन्यास इति त्रिधा॥ ५६ | [हे देवि!] अब मैं सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले, मंगलमय तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाले इसके न्यासको बताऊँगा। न्यास तीन प्रकारका कहा जाता है। उत्पत्ति, स्थिति (पालन) तथा संहारके भेदसे यह तीन प्रकारका कहा गया है; यह क्रमशः ब्रह्मचारियों, गृहस्थों तथा यतियोंके लिये होता है। उत्पत्ति [न्यास] ब्रह्मचारियोंका, स्थिति [न्यास] गृहस्थोंका और संहृति (संहार) न्यास यतियोंका होता है; अन्यथा सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकती॥ ५३—५५ १/२॥ |
| उत्पत्त्यादित्रिभेदेन वक्ष्यते ते वरानने।<br>न्यसेत्पूर्वं करन्यासं देहन्यासमनन्तरम्॥ ५७<br><br>अङ्गन्यासं ततः पश्चादक्षराणां विधिक्रमात्।<br>मूर्धादिपादपर्यन्तमुत्पत्तिन्यास उच्यते॥ ५८<br><br>पादादिमूर्धपर्यन्तं संहारो भवति प्रिये।<br>हृदयास्यगलन्यासः स्थितिन्यास उदाहृतः॥ ५९<br><br>ब्रह्मचारिगृहस्थानां यतीनां चैव शोभने।<br>सशिरस्कं ततो देहं सर्वमन्त्रेण संस्पृशेत्॥ ६० | अंगन्यास, करन्यास, देहन्यास—यह तीन प्रकारका न्यास होता है; हे वरानने! अब मैं उत्पत्ति आदि तीन भेदोंसे इन्हें भी आपको बताऊँगा। सबसे पहले करन्यास उसके बाद देहन्यास पुनः अंगन्यास मन्त्रके अक्षरोंके क्रमसे करना चाहिये। सिरसे प्रारम्भ होकर पैरोंतकका न्यास उत्पत्तिन्यास कहा जाता है। हे प्रिये! पैरोंसे प्रारम्भ होकर सिरतकका न्यास संहारन्यास होता है। हृदय, मुख और कण्ठका न्यास स्थितिन्यास कहा गया है। हे शोभने! यह न्यास [क्रमशः] ब्रह्मचारियों, गृहस्थों तथा यतियोंके लिये है॥ ५६—५९ १/२॥ |
| स देहन्यास इत्युक्तः सर्वेषां सम एव सः।<br>दक्षिणाङ्गुष्ठमारभ्य वामाङ्गुष्ठान्त एव हि॥ ६१ | तत्पश्चात् सम्पूर्ण मन्त्रसे सिरसहित देहका स्पर्श करना चाहिये। वह देहन्यास कहा गया है; वह सबके |
| ४२० | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| न्यस्यते यत्तदुत्पत्तिर्विपरीतं तु संहृतिः।<br>अङ्गुष्ठादिकनिष्ठान्तं न्यस्यते हस्तयोर्द्वयोः॥ ६२<br>अतीव भोगदो देवि स्थितिन्यासः कुटुम्बिनाम्।<br>करन्यासं पुरा कृत्वा देहन्यासमनन्तरम्॥ ६३ | लिये समान है। दाहिने हाथके अँगूठेसे प्रारम्भ करके बायें हाथके अँगूठेतक जो न्यास किया जाता है, वह उत्पत्तिन्यास है और इसके विपरीत करना संहृति (संहार) न्यास है। दोनों हाथोंमें अँगूठेसे प्रारम्भ करके कनिष्ठातक जो न्यास किया जाता है, वह स्थितिन्यास होता है; हे देवि! वह [न्यास] गृहस्थोंको परम सुख प्रदान करनेवाला है। सर्वप्रथम करन्यास करके देहन्यास करना चाहिये और उसके बाद अंगन्यास करना चाहिये; यह सामान्य विधि है॥ ६०-६३ १/२॥ |
| अङ्गन्यासं न्यसेत्पश्चादेष साधारणो विधिः।<br>ओङ्कारं सम्पुटीकृत्य सर्वाङ्गेषु च विन्यसेत्॥ ६४<br>करयोरुभयोश्चैव दशाग्राङ्गुलिषु क्रमात्।<br>प्रक्षाल्य पादावाचम्य शुचिर्भूत्वा समाहितः॥ ६५ | प्रत्येक मन्त्रको ओंकारसे सम्पुटित करके सभी अंगोंमें, दोनों हाथोंमें तथा दसों अँगुलियोंके अग्रभागमें क्रमसे न्यास करना चाहिये। दोनों पैर धोकर आचमन करके शुद्ध होकर समाहित चित्त होकर पूर्वकी ओर अथवा उत्तरकी ओर मुख करके न्यासकर्म करना चाहिये॥ ६४-६५ १/२॥ |
| प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि न्यासकर्म समाचरेत्।<br>स्मरेत्पूर्वमृषिं छन्दो दैवतं बीजमेव च॥ ६६<br>शक्तिं च परमात्मानं गुरुं चैव वरानने।<br>मन्त्रेण पाणी सम्मृज्य तलयोः प्रणवं न्यसेत्॥ ६७<br>अङ्गुलीनां च सर्वेषां तथा चाद्यन्तपर्वसु।<br>सबिन्दुकानि बीजानि पञ्चमध्यमपर्वसु॥ ६८<br>उत्पत्त्यादित्रिभेदेन न्यसेदाश्रमतः क्रमात्।<br>उभाभ्यामेव पाणिभ्यामापादतलमस्तकम्॥ ६९<br>मन्त्रेण संस्पृशेद्देहं प्रणवेनैव सम्पुटम्।<br>मूर्ध्नि वक्त्रे च कण्ठे च हृदये गुह्यके तथा॥ ७०<br>पादयोरुभयोश्चैव गुह्ये च हृदये तथा।<br>कण्ठे च मुखमध्ये च मूर्ध्नि च प्रणवादिकम्॥ ७१<br>हृदये गुह्यके चैव पादयोर्मूर्ध्नि वाचि वा।<br>कण्ठे चैव न्यसेदेव प्रणवादित्रिभेदतः॥ ७२<br>कृत्वाऽङ्गन्यासमेवं हि मुखानि परिकल्पयेत्।<br>पूर्वादि चोर्ध्वपर्यन्तं नकारादि यथाक्रमम्॥ ७३<br>षडङ्गानि न्यसेत्पश्चाद्यथास्थानं च शोभनम्।<br>नमः स्वाहा वषड् हुं च वौषट्फट्कारकैः सह॥ ७४ | हे वरानने! प्रारम्भमें ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति, परमात्मा तथा गुरुका स्मरण करना चाहिये। मन्त्रके उच्चारणके साथ दोनों हाथोंको धोकर दोनों करतलोंमें प्रणवका न्यास करना चाहिये। सभी अँगुलियोंके आदि-अन्त पर्वोपर और पाँचों मध्यम पर्वोंपर बिन्दुयुक्त पाँच बीजोंका उत्पत्ति आदि तीन भेदोंसे तथा ब्रह्मचर्य आदिके क्रमसे न्यास करना चाहिये। दोनों हाथोंसे मस्तकसे लेकर पैरतक प्रणवके द्वारा सम्पुटित मन्त्रसे देहका स्पर्श करना चाहिये। प्रणवयुक्त मन्त्रसे सिर, मुख, कण्ठ, हृदय, गुह्यस्थान एवं दोनों पैरोंमें; गुह्यस्थान, हृदय, कण्ठ, मुख तथा सिरमें; पुनः हृदय, गुह्यस्थान, दोनों पैरों, सिर, मुख तथा कण्ठमें तीन प्रकारका न्यास करना चाहिये। इस प्रकार अंगन्यास करके प्रणवसहित नकारसे प्रारम्भ होकर यकारपर पूर्ण होनेवाले इन नकार आदि वर्णोंकी क्रमशः अपने शरीरमें भावना करे। इसके बाद मन्त्रमें नमः, स्वाहा, वषट्, हुम्, वौषट् तथा फट्के साथ यथास्थान छहों अंगोंमें उत्तम रीतिसे न्यास करना चाहिये॥ ६६-७४॥ |
| प्रणवं हृदयं विद्यान्नकारः शिर उच्यते।<br>शिखा मकार आख्यातः शिकारः कवचं तथा॥ ७५ | प्रणवको हृदय जानना चाहिये, 'न' को सिर कहा जाता है, 'म' को शिखा कहा गया है, 'शि' को कवच |
| अध्याय ८५ ] | पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा | ४२१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| वाकारो नेत्रमस्त्रं तु यकारः परिकीर्तितः।<br>इत्थमङ्गानि विन्यस्य ततो वै बन्धयेद्दिशः॥ ७६<br>विघ्नेशो मातरो दुर्गा क्षेत्रज्ञो देवता दिशः।<br>आग्नेयादिषु कोणेषु चतुर्ष्वपि यथाक्रमम्॥ ७७<br>अङ्गुष्ठतर्जन्यग्राभ्यां संस्थाप्य सुमुखं शुभम्।<br>रक्षध्वमिति चोक्त्वा तु नमस्कुर्यात्पृथक् पृथक्॥ ७८ | कहा गया है, 'वा' को नेत्र और 'य' को अस्त्र कहा गया है। इस प्रकार अंगोंका न्यास करनेके अनन्तर दिशाओंको बाँधना चाहिये। आग्नेय आदि चारों कोणोंमें क्रमशः विघ्नेश, माताएँ, दुर्गा तथा क्षेत्रज्ञ दिशाओंके देवता हैं। अंगुष्ठ तथा तर्जनीके अग्रभागोंसे कल्याणप्रद तथा सुन्दर मुखवाले गणेश आदिको दिशाओंमें स्थापित करके 'रक्षा कीजिये'—ऐसा कहकर इन्हें पृथक्-पृथक् नमस्कार करना चाहिये॥ ७५-७८॥ |
| गले मध्ये तथाङ्गुष्ठे तर्जन्याद्यङ्गुलीषु च।<br>अङ्गुष्ठेन करन्यासं कुर्यादेव विचक्षणः॥ ७९<br>एवं न्यासमिमं प्रोक्तं सर्वपापहरं शुभम्॥<br>सर्वसिद्धिकरं पुण्यं सर्वरक्षाकरं शिवम्॥ ८०<br>न्यस्ते मन्त्रेऽथ सुभगे शङ्करप्रतिमो भवेत्।<br>जन्मान्तरकृतं पापमपि नश्यति तत्क्षणात्॥ ८१<br>एवं विन्यस्य मेधावी शुद्धकायो दृढव्रतः।<br>जपेत्पञ्चाक्षरं मन्त्रं लब्ध्वाचार्यप्रसादतः॥ ८२ | बुद्धिमान्को चाहिये कि कण्ठमें, मध्यमें, अँगूठेमें, तर्जनी आदि अँगुलियोंमें अँगूठेसे ही करन्यास करे। इस प्रकार यह न्यास सभी पापोंको हरनेवाला, शुभ, सभी सिद्धियाँ देनेवाला, पुण्यप्रद, सबकी रक्षा करनेवाला तथा कल्याणकारी कहा गया है। हे सुभगे! मन्त्रका न्यास कर लेनेपर साधक शिवतुल्य हो जाता है और उसके द्वारा पूर्व जन्ममें किया गया पाप भी उसी क्षण नष्ट हो जाता है। इस प्रकार न्यास करके मेधावीको शुद्ध शरीरवाला तथा दृढव्रती होकर आचार्यकी कृपासे ग्रहण करके पंचाक्षर-मन्त्रका जप करना चाहिये॥ ७९-८२॥ |
| अतः परं प्रवक्ष्यामि मन्त्रसङ्ग्रहणं शुभे।<br>यं विना निष्फलं नित्यं येन वा सफलं भवेत्॥ ८३<br>आज्ञाहीनं क्रियाहीनं श्रद्धाहीनममानसम्।<br>आज्ञप्तं दक्षिणाहीनं सदा जप्तं च निष्फलम्॥ ८४<br>आज्ञासिद्धं क्रियासिद्धं श्रद्धासिद्धं सुमानसम्।<br>एवं च दक्षिणासिद्धं मन्त्रं सिद्धं यतस्ततः॥ ८५ | हे शुभे! अब मैं इस मन्त्रको ग्रहण करनेकी विधि बताऊँगा, जिसके बिना यह निष्फल हो जाता है और जिसके द्वारा यह सफल होता है। आज्ञाहीन, क्रियाहीन, श्रद्धाहीन, ध्यानहीन, आज्ञप्त तथा दक्षिणाहीन मन्त्र जपे जानेपर सदा निष्फल होता है। आज्ञासिद्ध, क्रियासिद्ध, श्रद्धासिद्ध, सुमानस (पूर्ण ध्यानयुक्त) तथा दक्षिणासिद्ध मन्त्र सदा सफल होता है॥ ८३-८५॥ |
| उपगम्य गुरुं विप्रं मन्त्रतत्त्वार्थवेदिनम्।<br>ज्ञानिनं सद्गुणोपेतं ध्यानयोगपरायणम्॥ ८६<br>तोषयेत्तं प्रयत्नेन भावशुद्धिसमन्वितः।<br>वाचा च मनसा चैव कायेन द्रविणेन च॥ ८७<br>आचार्यं पूजयेच्छिष्यः सर्वदातिप्रयत्नतः।<br>हस्त्यश्वरथरत्नानि क्षेत्राणि च गृहाणि च॥ ८८<br>भूषणानि च वासांसि धान्यानि विविधानि च।<br>एतानि गुरवे दद्याद्भक्त्या च विभवे सति॥ ८९<br>वित्तशाठ्यं न कुर्वीत यदिच्छेद्सिद्धिमात्मनः।<br>पश्चान्निवेदयेद्देवि आत्मानं सपरिच्छदम्॥ ९० | शिष्यको चाहिये कि मन्त्रके वास्तविक अर्थके ज्ञाता, ज्ञानसम्पन्न, सद्गुणोंसे युक्त तथा ध्यानयोगपरायण ब्राह्मण गुरुके पास जाकर भावशुद्धिसे युक्त हो मन-वचन-शरीर तथा धनसे उन्हें प्रयत्नपूर्वक सन्तुष्ट करे और बड़े प्रयत्नके साथ उन आचार्यकी सर्वदा पूजा करे। वैभव रहनेपर हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, क्षेत्र, गृह, आभूषण, वस्त्र तथा विविध धान्य—ये सब गुरुको भक्तिपूर्वक देना चाहिये। यदि वह अपनी सिद्धि चाहता हो तो धनकी कृपणता नहीं करनी चाहिये। हे देवि! |
| ४२२ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| एवं सम्पूज्य विधिवद्यथाशक्ति त्ववञ्चयन्।<br>आददीत गुरोर्मन्त्रं ज्ञानं चैव क्रमेण तु॥ ९१<br><br>एवं तुष्टो गुरुः शिष्यं पूजितं वत्सरोषितम्।<br>शुश्रूषमनहङ्कारमुपवासकृशं शुचिम्॥ ९२ | इसके बाद सेवक आदि सहित अपने आपको भी समर्पित कर देना चाहिये। इस प्रकार विधिपूर्वक यथाशक्ति [गुरुकी] पूजा करके निष्कपट भाव रखते हुए [शिष्यको] गुरुसे क्रमपूर्वक मन्त्र तथा ज्ञान ग्रहण करना चाहिये॥ ८६—९१॥ |
| स्नापयित्वा तु शिष्याय ब्राह्मणानपि पूज्य च।<br>समुद्रतीरे नद्यां च गोष्ठे देवालयेऽपि वा॥ ९३<br><br>शुचौ देशे गृहे वापि काले सिद्धिकरे तिथौ।<br>नक्षत्रे शुभयोगे च सर्वदा दोषवर्जिते॥ ९४<br><br>अनुगृह्य ततो दद्याच्छिवज्ञानमनुत्तमम्।<br>स्वरेणोच्चारयेत्सम्येगकान्तेऽपि प्रसन्नधीः॥ ९५<br><br>उच्चार्योच्चारयित्वा तु आचार्यः सिद्धिदः स्वयम्।<br>शिवं चास्तु शुभं चास्तु शोभनोऽस्तु प्रियोऽस्त्विति॥ ९६ | इस प्रकार सन्तुष्ट गुरु वर्षपर्यन्त पास रहकर सेवामें परायण, अहंकाररहित, उपवाससे दुर्बल शरीरवाले तथा शुद्धियुक्त पूजित शिष्यको स्नान कराकर ब्राह्मणोंकी पूजा करके [किसी] समुद्रतटपर, नदीतटपर, गोशालामें, देवालयमें, पवित्र स्थानमें अथवा घरमें ही सिद्धिकारक समयमें, उत्तम तिथिमें तथा दोषरहित नक्षत्र एवं शुभयोगमें शिष्यपर अनुग्रह करके उसे अत्युत्तम शिवज्ञान प्रदान करे; साथ ही प्रसन्नचित्त होकर एकान्तमें स्वरसे सम्यक् उच्चारण करे। स्वयं उच्चारणकर तथा उच्चारण कराकर मन्त्रदाता आचार्य बोले—[तुम्हारा] कल्याण हो, शुभ हो, कुशल हो, प्रिय हो॥ ९२—९६॥ |
| एवं लब्ध्वा परं मन्त्रं ज्ञानं चैव गुरोस्ततः।<br>जपेन्नित्यं ससङ्कल्पं पुरश्चरणमेव च॥ ९७<br><br>यावज्जीवं जपेन्नित्यमष्टोत्तरसहस्रकम्।<br>अनश्नंस्तत्परो भूत्वा स याति परमां गतिम्॥ ९८ | इस प्रकार गुरुसे श्रेष्ठ मन्त्र तथा ज्ञान प्राप्त करके नित्य इसका ससंकल्प जप करना चाहिये और पुरश्चरण भी करना चाहिये। जो बिना भोजन किये तत्पर होकर आजीवन नित्य इसका एक हजार आठ बार जप करता है, वह परम गति प्राप्त करता है॥ ९७-९८॥ |
| जपेदक्षरलक्षं वै चतुर्गुणितमादरात्।<br>नक्ताशी संयमी यश्च पौरश्चरणिकः स्मृतः॥ ९९<br><br>पुरश्चरणजापी वा अपि वा नित्यजापकः।<br>अचिरात्सिद्धिकाङ्क्षी तु तयोरन्यतरो भवेत्॥ १०० | नक्तव्रत करते हुए तथा नियमोंका पालन करते हुए जो श्रद्धापूर्वक मन्त्रकी अक्षरसंख्याका चार लाख गुना जप करता है, उसे पुरश्चरणकर्ता कहा गया है। पुरश्चरणजप करनेवाला अथवा नित्य जप करनेवाला शीघ्र ही सिद्धि प्राप्त कर लेता है। दोनोंमें किसी एकको अवश्य करना चाहिये॥ ९९-१००॥ |
| यः पुरश्चरणं कृत्वा नित्यजापी भवेन्नरः।<br>तस्य नास्ति समो लोके स सिद्धः सिद्धिदो वशी॥ १०१ | जो मनुष्य पुरश्चरण करके इसका नित्य जप करनेवाला है, उसके समान लोकमें कोई नहीं है; वह सिद्ध, सिद्धिदाता तथा इन्द्रियजित् होता है॥ १०१॥ |
| आसनं रुचिरं बद्ध्वा मौनी चैकाग्रमानसः।<br>प्राङ्मुखोदङ्मुखो वापि जपेन्मन्त्रमनुत्तमम्॥ १०२ | सुखदायक आसन लगाकर मौन तथा एकाग्रचित्त होकर पूर्वकी ओर अथवा उत्तरकी ओर मुख करके [इस] सर्वोत्तम मन्त्रका जप करना चाहिये॥ १०२॥ |
| आद्यन्तयोर्जपस्यापि कुर्याद्वै प्राणसंयमान्।<br>तथा चान्ते जपेद्बीजं शतमष्टोत्तरं शुभम्॥ १०३ | जपके प्रारम्भ और अन्तमें [तीन-तीन] प्राणायाम करना चाहिये और अन्तमें एक सौ आठ बार बीजमन्त्रका |
अध्याय ८५ ] पञ्चाक्षरीविद्या ( पञ्चाक्षरमन्त्र ), जपविधान तथा उसकी महिमा [ ४२३
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| चत्वारिंशत्समावृत्ति प्राणानायम्य संस्मरेत्।<br>पञ्चाक्षरस्य मन्त्रस्य प्राणायाम उदाहृतः ॥ १०४<br><br>प्राणायामाद्भवेत्क्षिप्रं सर्वपापपरिक्षयः।<br>इन्द्रियाणां वशित्वं च तस्मात्प्राणांश्च संयमेत् ॥ १०५ | जप करना चाहिये। श्वास रोककर चालीस बार जप करना चाहिये। यह पञ्चाक्षरमन्त्रका प्राणायाम कहा गया है। प्राणायामसे शीघ्र ही सभी पापोंका नाश और इन्द्रियोंका निग्रह हो जाता है, अतः प्राणायाम [अवश्य] करना चाहिये॥ १०३-१०५॥ |
| गृहे जपः समं विद्याद् गोष्ठे शतगुणं भवेत्।<br>नद्यां शतसहस्रं तु अनन्तः शिवसन्निधौ ॥ १०६<br><br>समुद्रतीरे देवह्रदे गिरौ देवालयेषु च।<br>पुण्याश्रमेषु सर्वेषु जपः कोटिगुणो भवेत् ॥ १०७<br><br>शिवस्य सन्निधाने च सूर्यस्याग्रे गुरोरपि।<br>दीपस्य गोर्जलेस्यापि जपकर्म प्रशस्यते ॥ १०८ | घरमें किये गये जपको सामान्य फलवाला जानना चाहिये। गोशालामें किया गया जप उससे सौ गुना फलदायक होता है। नदीके तटपर किया गया जप लाख गुना और शिवके सान्निध्यमें किया गया जप अनन्त गुना फलदायक होता है। समुद्रके तटपर, देवसरोवरोंमें, पर्वतपर, देवालयमें अथवा सभी पवित्र आश्रमोंमें किया गया जप करोड़ गुना फलदायक होता है। शिवकी सन्निधिमें, सूर्य, गुरु, दीपक, गौ अथवा जलके समक्ष जपकर्म श्रेष्ठ माना जाता है॥ १०६-१०८॥ |
| अङ्गुलीजपसंख्यानमेकमेकं शुभानने।<br>रेखैरष्टगुणं प्रोक्तं पुत्रजीवफलैर्दश ॥ १०९<br><br>शतं वै शङ्खमणिभिः प्रवालैश्च सहस्रकम्।<br>स्फाटिकैर्दशसाहस्रं मौक्तिकैर्लक्षमुच्यते ॥ ११०<br><br>पद्माक्षैर्दशलक्षं तु सौवर्णैः कोटिरुच्यते।<br>कुशाग्रन्ध्या च रुद्राक्षैरनन्तगुणमुच्यते ॥ १११ | हे शुभानने! एक-एक करके अँगुलीसे जपकी गणना करनेपर वह सामान्य फल प्रदान करता है; रेखाओंसे करनेपर वह आठ गुना फलदायक कहा गया है। पुत्रजीव-फलोंसे जप करनेपर दस गुना, शंखमणियोंसे करनेपर सौ गुना, प्रवालों (मूँगा)-से करनेपर हजार गुना, स्फटिकोंसे करनेपर दस हजार गुना और मोतियोंसे करनेपर लाख गुना फलदायक कहा जाता है। कमलके बीजसे करनेपर दस लाख गुना और सोनेके सुवर्णखण्डोंसे करनेपर जप करोड़ गुना फलदायक कहा जाता है। कुशाकी ग्रन्थिसे तथा रुद्राक्षोंसे गणना करनेपर जप अनन्त गुना फलदायक होता है॥ १०९-१११॥ |
| पञ्चविंशति मोक्षार्थं सप्तविंशति पौष्टिकम्।<br>त्रिंशच्च धनसम्पत्त्यै पञ्चाशच्चाभिचारिकम् ॥ ११२<br><br>तत्पूर्वाभिमुखं वश्यं दक्षिणं चाभिचारिकम्।<br>पश्चिमं धनदं विद्यादुत्तरं शान्तिकं भवेत् ॥ ११३ | पचीस मणियोंकी माला मोक्षके लिये, सत्ताईसकी [माला] पुष्टिके लिये, तीसकी धन-सम्पदाके लिये और पचासकी अभिचार कर्मके लिये होती है। पूर्वकी ओर मुख करके किया गया जप वशीकरणकी शक्ति देनेवाला और दक्षिणकी ओर मुख करके किया गया जप अभिचारकर्मकी शक्ति देनेवाला होता है। पश्चिमकी ओर मुख करके किये गये जपको धन प्रदान करनेवाला जानना चाहिये। उत्तरकी ओर मुख करके किया गया जप शान्ति प्रदान करनेवाला होता है॥ ११२-११३॥ |
| अङ्गुष्ठं मोक्षदं विद्यात्तर्जनी शत्रुनाशनी।<br>मध्यमा धनदा शान्तिं करोत्येषा ह्यनामिका ॥ ११४ | अँगुठेको मोक्ष देनेवाला जानना चाहिये। तर्जनी |