भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ८४] उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान ४१३


श्लोकअर्थ
गोलोकं समनुप्राप्य भवान्या सह मोदते।<br>भवान्या सदृशी भूत्वा सर्वकल्पेषु साव्यया॥ ४५<br><br>भवान्याश्चैव सायुज्यं लभते नात्र संशयः।<br>सर्वधातुसमाकीर्णं विचित्रध्वजशोभितम्॥ ४६वह गृह [शिवको] समर्पित करती है; वह गोलोक प्राप्त करके भवानीके साथ आनन्द करती है, भवानीके सदृश होकर सभी कल्पोंमें अव्यय (शाश्वत) बनी रहती है और [अन्तमें] भवानीका सायुज्य प्राप्त करती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ३८—४५ १/२ ॥
निवेदयीत शर्वाय श्रावणे तिलपर्वतम्।<br>वितानध्वजवस्त्राद्यैर्धातुभिश्च निवेदयेत्॥ ४७<br><br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च पूर्वोक्तमखिलं भवेत्।<br>कृत्वा भाद्रपदे मासि शोभनं शालिपर्वतम्॥ ४८सावन महीनेमें सभी धातुओंसे युक्त तथा विचित्र ध्वजोंसे सुशोभित तिलपर्वत शिवको समर्पित करना चाहिये। जो [स्त्री] वितान, ध्वज, वस्त्र, धातु आदि सहित तिलपर्वत निवेदित करती है और [अन्तमें] ब्राह्मणोंको भोजन कराती है, उसे पूर्वमें कहा गया सबकुछ प्राप्त हो जाता है॥ ४६-४७ १/२ ॥
वितानध्वजवस्त्राद्यैर्धातुभिश्च निवेदयेत्।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च दापयेच्च यथाविधि॥ ४९<br><br>सा च सूर्यांशुसङ्काशा भवान्या सह मोदते।<br>कृत्वा चाश्वयुजे मासि विपुलं धान्यपर्वतम्॥ ५०जो भाद्रपद मासमें वितान, ध्वज, वस्त्र, धातु आदिसहित शालि चावलका सुन्दर पर्वत बनाकर उसे शिवको समर्पित करती है और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर विधिपूर्वक उसका दान करती है, वह सूर्यकी किरणोंके समान होकर भवानीके साथ आनन्द करती है॥ ४८-४९ १/२ ॥
सुवर्णवस्त्रसंयुक्तं दत्त्वा सम्पूज्य शङ्करम्।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च पूर्वोक्तमखिलं भवेत्॥ ५१<br><br>सर्वधान्यसमायुक्तं सर्वबीजरसादिभिः।<br>सर्वधातुसमायुक्तं सर्वरत्नोपशोभितम्॥ ५२<br><br>शृङ्गैश्चतुर्भिः संयुक्तं वितानच्छत्रशोभितम्।<br>गन्धमाल्यैस्तथा धूपैश्चित्रैश्चापि सुशोभितम्॥ ५३<br><br>विचित्रैर्नृत्यगेयैश्च शङ्खवीणादिभिस्तथा।<br>ब्रह्मघोषैर्महापुण्यं मङ्गलैश्च विशेषतः॥ ५४<br><br>महाध्वजाष्टसंयुक्तं विचित्रकुसु्मोज्ज्वलम्।<br>नगेन्द्रं मेरुनामानं त्रैलोक्याधारमुत्तमम्॥ ५५<br><br>तस्य मूर्ध्नि शिवं कुर्यान्मध्यतो धातुनैव तु।<br>दक्षिणे च यथान्यायं ब्रह्माणं च चतुर्मुखम्॥ ५६<br><br>उत्तरे देवदेवेशं नारायणमनामयम्।<br>इन्द्रादिलोकपालांश्च कृत्वा भक्त्या यथाविधि॥ ५७<br><br>प्रतिष्ठाप्य ततः स्नाप्य समभ्यर्च्य महेश्वरम्।<br>देवस्य दक्षिणे हस्ते शूलं त्रिदशपूजितम्॥ ५८आश्विन महीनेमें सुवर्ण तथा वस्त्रसे युक्त एक विशाल धान्यपर्वत बनाकर उसे शिवको अर्पण करके शंकरकी विधिवत् पूजा करके ब्राह्मणोंको भोजन करानेसे पूर्वमें कहा गया सबकुछ प्राप्त हो जाता है। तीनों लोकोंके आधारस्वरूप मेरु नामक उत्तम पर्वतराजका निर्माण करे, जो सभी धान्योंसे युक्त हो, सभी बीजों तथा रसोंसे परिपूर्ण हो, सभी धातुओंसे संयुक्त हो, सभी रत्नोंसे सुशोभित हो, चार शृंगों (शिखर)-से युक्त हो, वितान तथा छत्रसे सुशोभित हो, गन्ध-पुष्प एवं अद्भुत धूपोंसे सुशोभित हो, विचित्र नृत्य-गानोंसे शोभायमान हो, शंख-वीणाकी ध्वनियोंसे युक्त हो, वेदध्वनियोंसे और विशेषकर मंगलसूचक प्रार्थना आदिसे अत्यन्त पवित्र हो, आठ बड़ी ध्वजाओंसे युक्त हो और विचित्र पुष्पोंसे सुशोभित हो। उस [पर्वत]-के शिखरपर मध्यमें धातुनिर्मित शिवको विराजमान करे। दक्षिणमें चतुर्मुख ब्रह्मा, उत्तरमें निर्विकार देवदेवेश नारायण, इन्द्र आदि लोकपालोंको भक्तिपूर्वक यथाविधि विराजमान करके उनकी प्रतिष्ठा करनेके अनन्तर स्नान कराकर महेश्वरकी पूजा करके महादेवके दाहिने हाथमें देवपूजित त्रिशूल तथा बायें हाथमें पाश, भवानीके