भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 416, कुल 834 में से

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| ४१४ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग | | :--- | :--- |

| वामे पाशं भवान्याश्च कमलं हेमभूषितम्।<br>विष्णोश्च शङ्खं चक्रं च गदामब्जं प्रयत्नतः ॥ ५९<br>ब्रह्मणश्चाक्षसूत्रं च कमण्डलुमनुत्तमम्।<br>इन्द्रस्य वज्रमग्नेश्च शक्त्याख्यं परमायुधम् ॥ ६०<br>यमस्य दण्डं निर्ऋतेः खड्गं निशिचरस्य तु।<br>वरुणस्य महापाशं नागाख्यं रुद्रमद्भुतम् ॥ ६१<br>वायोर्यष्टिं कुबेरस्य गदां लोकप्रपूजिताम्।<br>टङ्कं चेशानदेवस्य निवेद्यैवं क्रमेण च ॥ ६२<br>शिवस्य महतीं पूजां कृत्वा चरुसमन्विताम्।<br>पूजयेत्सर्वदेवांश्च यथाविभवविस्तरम् ॥ ६३<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च पूजां कृत्वा प्रयत्नतः।<br>महामेरुव्रतं कृत्वा महादेवाय दापयेत् ॥ ६४<br>महामेरुमनुप्राप्य महादेव्या प्रमोद्ते।<br>चिरं सायुज्यमाप्नोति महादेव्या न संशयः ॥ ६५ | हाथमें हेमभूषित कमल, विष्णुके हाथोंमें शंख-चक्र-गदा-पद्म, ब्रह्माके हाथोंमें अक्षमाला तथा उत्तम कमण्डलु, इन्द्रके हाथमें वज्र, अग्निके हाथमें शक्ति नामक महान् आयुध, यमके हाथमें दण्ड, निशिचर निर्ऋतिके हाथमें खड्ग, वरुणके हाथमें नाग नामक भयंकर तथा अद्भुत महापाश, वायुदेवके हाथमें यष्टि (छड़ी), कुबेरके हाथमें लोकपूजित गदा और ईशान देवके हाथमें टंक—इस प्रकार क्रमसे निवेदित करके शिवकी चरुसमन्वित महान् पूजा करके अपने सामर्थ्यके अनुसार सभी देवताओंकी पूजा करे। इसके बाद ब्राह्मणोंको भोजन कराकर प्रयत्नपूर्वक उनका सम्मान करके महामेरुव्रत सम्पन्नकर महादेवको समर्पित कर दे। ऐसा करनेवाली स्त्री महामेरुपर्वत पहुँचकर महादेवीके साथ आनन्द करती है और चिरकालतक महादेवीका सायुज्य प्राप्त किये रहती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ ५०-६५॥ | | कार्तिक्यामपि या नारी कृत्वा देवीमुमां शुभाम्।<br>सर्वाभरणसम्पूर्णां सर्वलक्षणलक्षिताम् ॥ ६६<br>हेमताम्रादिभिश्चैव प्रतिष्ठाप्य विधानतः।<br>देवं च कृत्वा देवेशं सर्वलक्षणसंयुतम् ॥ ६७<br>तयोरग्रे हुताशं च स्रुवहस्तं पितामहम्।<br>नारायणं च दातारं सर्वाभरणभूषितम् ॥ ६८<br>लोकपालैस्तथा सिद्धैः संवृतं स्थाप्य यत्नतः।<br>रुद्रालये व्रतं तस्मै दापयेद्भक्तिपूर्वकम् ॥ ६९ | जो स्त्री कार्तिक मासमें सोने अथवा ताँबेकी सभी आभरणोंसे युक्त तथा सभी लक्षणोंसे समन्वित देवी उमाकी सुन्दर प्रतिमा बनाकर; साथ ही देवेश महादेवकी भी सभी लक्षणोंसे युक्त मूर्ति बनाकर विधानपूर्वक उनकी प्रतिष्ठा करके उन दोनोंके सम्मुख अग्निको, हाथमें स्रुव लिये हुए ब्रह्माको और लोकपालों तथा सिद्धोंसे घिरे हुए एवं सभी आभूषणोंसे विभूषित कन्या-दाता नारायणको यत्नपूर्वक स्थापित करके भक्तिपूर्वक इस व्रतको रुद्रालयमें उन [शिव]-को समर्पित करती है, वह भवानीका स्वरूप प्राप्त करके शिवके साथ आनन्द करती है॥ ६६-६९ १/२ ॥ | | सा भवान्यास्तनुं गत्वा भवेन सह मोदते।<br>एकभक्तव्रतं पुण्यं प्रतिमासमनुक्रमात् ॥ ७०<br>मार्गशीर्षकमासादिकार्तिकान्तं प्रवर्तितम्।<br>नरनार्यादिजन्तूनां हिताय मुनिसत्तमाः ॥ ७१<br>नरः कृत्वा व्रतं चैव शिवसायुज्यमाप्नुयात्।<br>नारी देव्या न सन्देहः शिवेन परिभाषितम् ॥ ७२ | एक बार भोजन करके प्रत्येक मासके पुण्यप्रद व्रतको क्रमसे करे; हे श्रेष्ठ मुनियो! नर, नारी आदि प्राणियोंके कल्याणके लिये मार्गशीर्षसे आरम्भ करके कार्तिकतक किये जानेवाले इस व्रतको प्रवर्तित किया गया है। शिवके द्वारा बताये गये इस व्रतको करके पुरुष शिवका सायुज्य प्राप्त करता है और नारी देवी [पार्वती]-का सायुज्य प्राप्त करती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ ७०-७२ ॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे उमामहेश्वरव्रतं नाम चतुरशीतितमोऽध्यायः ॥ ८४ ॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'उमामहेश्वरव्रत' नामक चौरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८४ ॥

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