श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 417, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 417
अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४१५
पचासीवाँ अध्याय
पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| सूत उवाच<br>सर्वव्रतेषु सम्पूज्य देवदेवमुमापतिम्।<br>जपेत्पञ्चाक्षरीं विद्यां विधिनैव द्विजोत्तमाः॥ १<br><br>जपादेव न सन्देहो व्रतानां वै विशेषतः।<br>समाप्तिर्नान्यथा तस्माज्जपेत्पञ्चाक्षरीं शुभाम्॥ २ | सूतजी बोले— हे श्रेष्ठ द्विजो! समस्त व्रतोंमें देवदेव उमापतिकी पूजा करके विधिपूर्वक पंचाक्षरीविद्या (मन्त्र)-का जप करना चाहिये। जपसे ही विशेषकर व्रतोंकी पूर्णता होती है, अन्यथा नहीं; इसमें सन्देह नहीं है। अतः उत्तम पंचाक्षरीविद्याका जप [अवश्य] करना चाहिये॥ १-२॥ |
| ऋषय ऊचुः<br>कथं पञ्चाक्षरी विद्या प्रभावो वा कथं वद।<br>क्रमोपायं महाभाग श्रोतुं कौतूहलं हि नः॥ ३ | ऋषिगण बोले— [हे सूतजी!] पंचाक्षरीविद्या क्या है और इसका प्रभाव कैसा होता है? हे महाभाग! क्रमसे इसकी विधि बताइये; इसे सुननेकी हमलोगोंकी [बड़ी] उत्सुकता है॥ ३॥ |
| सूत उवाच<br>पुरा देवेन रुद्रेण देवदेवेन शम्भुना।<br>पार्वत्याः कथितं पुण्यं प्रवदामि समासतः॥ ४ | सूतजी बोले— [हे ऋषियो!] पूर्वकालमें देवदेव रुद्र भगवान् शम्भुके द्वारा पार्वतीसे कहे गये इस पुण्यप्रद मन्त्रको मैं संक्षेपमें बता रहा हूँ॥ ४॥ |
| श्रीदेव्युवाच<br>भगवन् देवदेवेश सर्वलोकमहेश्वर।<br>पञ्चाक्षरस्य माहात्म्यं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः॥ ५ | श्रीदेवी बोलीं— हे भगवन्! हे देवदेवेश! हे सर्वलोक-महेश्वर! मैं यथार्थरूपसे पंचाक्षरमन्त्रका माहात्म्य सुनना चाहती हूँ॥ ५॥ |
| श्रीभगवानुवाच<br>पञ्चाक्षरस्य माहात्म्यं वर्षकोटिशतैरपि।<br>न शक्यं कथितुं देवि तस्मात्सङ्क्षेपतः शृणु॥ ६ | श्रीभगवान् बोले— हे देवि! सौ करोड़ वर्षोंमें भी पंचाक्षरमन्त्रका माहात्म्य नहीं कहा जा सकता है; अतः इसे संक्षेपमें सुनिये॥ ६॥ |
| प्रलये समनुप्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे।<br>नष्टे देवासुरे चैव नष्टे चोरगराक्षसे॥ ७ | हे देवि! प्रलयके उपस्थित होनेपर जब समस्त |