श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 418, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ें| ४१६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
|---|
| सर्वं प्रकृतिमापन्नं त्वया प्रलयमेष्यति।<br>एकोऽहं संस्थितो देवि न द्वितीयोऽस्ति कुत्रचित्॥ ८<br><br>तस्मिन् वेदाश्च शास्त्राणि मन्त्रे पञ्चाक्षरे स्थिताः।<br>ते नाशं नैव सम्प्राप्ता मच्छक्त्या ह्यनुपालिताः॥ ९ | चराचर जगत्, देवता तथा असुर, नाग एवं राक्षस नष्ट हो जाते हैं और आपसहित सभी पदार्थ प्रकृतिमें लीन होकर प्रलयको प्राप्त हो जाते हैं, उस समय एकमात्र मैं रह जाता हूँ; दूसरा कुछ भी नहीं रह जाता है। उस समय सभी वेद तथा शास्त्र उसी पंचाक्षरमन्त्रमें स्थित रहते हैं; मेरी शक्तिसे अनुपालित होनेके कारण वे नष्ट नहीं होते हैं॥७-९॥ | | अहमेको द्विधाप्यासं प्रकृत्यात्मप्रभेदतः।<br>स तु नारायणः शेते देवो मायामयीं तनुम्॥ १०<br><br>आस्थाय योगपर्यङ्कशयने तोयमध्यगः।<br>तन्नाभिपङ्कजाज्जातः पञ्चवक्त्रः पितामहः॥ ११<br><br>सिसृक्षमाणो लोकान् वै त्रीनशक्तोऽसहायवान्।<br>दश ब्रह्मा ससर्जादौ मानसानमितौजसः॥ १२ | मैं एक होता हुआ भी उस समय प्रकृति तथा आत्माके भेदसे दो रूपोंमें रहता हूँ। वे भगवान् नारायण मायामय शरीर धारणकर जलके मध्यमें योगरूपी पर्यंकपर शयन करते हैं। उनके नाभिकमलसे पाँच मुखवाले ब्रह्मा उत्पन्न हुए; तीनों लोकोंका सृजन करनेकी इच्छावाले उन ब्रह्माने [इस कार्यमें] असमर्थ तथा सहायकविहीन होनेके कारण प्रारम्भमें अमित तेजवाले दस मानस पुत्रोंको उत्पन्न किया॥१०-१२॥ | | तेषां सृष्टिप्रसिद्ध्यर्थं मां प्रोवाच पितामहः।<br>मत्पुत्राणां महादेव शक्तिं देहि महेश्वर॥ १३<br><br>इति तेन समादिष्टः पञ्चवक्त्रधरो ह्यहम्।<br>पञ्चाक्षरान् पञ्चमुखैः प्रोक्तवान् पद्मयोनये॥ १४<br><br>तान् पञ्चवदनैर्गृह्णन् ब्रह्मा लोकपितामहः।<br>वाच्यवाचकभावेन ज्ञातवान् परमेश्वरम्॥ १५<br><br>वाच्यः पञ्चाक्षरैर्देवि शिवस्त्रैलोक्यपूजितः।<br>वाचकः परमो मन्त्रस्तस्य पञ्चाक्षरः स्थितः॥ १६ | उनकी सृष्टिकी वृद्धिके लिये ब्रह्माने मुझसे कहा—'हे महादेव! हे महेश्वर! मेरे पुत्रोंको शक्ति प्रदान कीजिये।' उनके ऐसा कहनेपर पाँच मुख धारण करनेवाले मैंने कमल्योनि (ब्रह्मा)-के लिये [अपने] पाँचमुखोंसे पाँच अक्षरोंका उच्चारण किया। अपने पाँच मुखोंसे उन [अक्षरों]-को ग्रहण करते हुए लोकपितामह ब्रह्माने वाच्यवाचक भावसे परमेश्वरको जान लिया। हे देवि! तीनों लोकोंमें पूजित शिव पंचाक्षरोंसे वाच्य हैं और [यह] परम पंचाक्षरमन्त्र उनके वाचकके रूपमें स्थित है॥१३-१६॥ | | ज्ञात्वा प्रयोगं विधिना च सिद्धिं<br>लब्ध्वा तथा पञ्चमुखो महात्मा।<br>प्रोवाच पुत्रेषु जगद्धिताय<br>मन्त्रं महार्थं किल पञ्चवर्णम्॥ १७ | पाँच मुखवाले महात्मा ब्रह्माने विधिपूर्वक इसके प्रयोगको जानकर तथा सिद्धि प्राप्त करके जगत्के कल्याणके लिये अपने पुत्रोंको महान् अर्थवाले इस पंचाक्षरमन्त्रका उपदेश किया॥१७॥ | | ते लब्ध्वा मन्त्ररत्नं तु साक्षाल्लोकपितामहात्।<br>तमाराधयितुं देवं परात्परतरं शिवम्॥ १८ | तदनन्तर साक्षात् लोकपितामहसे इस मन्त्ररत्नको प्राप्तकर वे उन परात्पर देव शिवकी आराधना करनेमें तत्पर हो गये॥१८॥ | | ततस्तुतोष भगवान् त्रिमूर्तीनां परः शिवः।<br>दत्तवानखिलं ज्ञानमणिमादिगुणाष्टकम्॥ १९ | तब त्रिदेवोंमें श्रेष्ठ भगवान् शिव प्रसन्न हो गये और उन्होंने उन्हें सम्पूर्ण ज्ञान तथा अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ प्रदान कीं॥१९॥ |