श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८५] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४१७
| श्लोक (संस्कृत) | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तेऽपि लब्ध्वा वरान् विप्रास्तदाराधनकाङ्क्षिणः।<br>मेरोस्तु शिखरे रम्ये मुञ्जवान्नाम पर्वतः॥ २०<br><br>मत्प्रियः सततं श्रीमान् मद्भूतैः परिरक्षितः।<br>तस्याभ्याशे तपस्तीव्रं लोकसृष्टिसमुत्सुकाः॥ २१<br><br>दिव्यवर्षसहस्रं तु वायुभक्षाः समाचरन्।<br>तिष्ठन्तोऽनुग्रहार्थाय देवि ते ऋषयः पुरा॥ २२ | तत्पश्चात् [उन] वरोंको प्राप्तकर वे विप्र [मेरी] आराधनाकी आकांक्षा करने लगे। मेरुके रम्य शिखरपर मुंजवान् नामक पर्वत है। शोभासम्पन्न यह पर्वत मुझे प्रिय है और मेरे भूतोंके द्वारा भलीभाँति रक्षित है। हे देवि! पूर्वकालमें उस [पर्वत]-के समीप स्थित रहते हुए लोकसृष्टिके इच्छुक उन ऋषियोंने मेरे अनुग्रहहेतु वायुके आहारपर रहकर हजार दिव्य वर्षोंतक कठोर तप किया॥ २०–२२॥ |
| तेषां भक्तिमहं दृष्ट्वा सद्यः प्रत्यक्षतामियाम्।<br>पञ्चाक्षरमृषिच्छन्दो दैवतं शक्तिबीजवत्॥ २३<br><br>न्यासं षडङ्गं दिग्बन्धं विनियोगमशेषतः।<br>प्रोक्तवानहमार्याणां लोकानां हितकाम्यया॥ २४ | [हे देवि!] उनकी भक्ति देखकर मैं शीघ्र ही उनके समक्ष प्रकट हो गया और मैंने लोकोंके कल्याणकी इच्छासे उन महात्माओंको पंचाक्षरमन्त्र, उसके ऋषि, छन्द, देवता, शक्ति, बीजसहित षडंग न्यास, दिग्बन्ध तथा विनियोग पूर्ण रूपसे बता दिया॥ २३-२४॥ |
| तच्छ्रुत्वा मन्त्रमाहात्म्यमृषयस्ते तपोधनाः।<br>मन्त्रस्य विनियोगं च कृत्वा सर्वमनुष्ठिताः॥ २५<br><br>तन्माहात्म्यात्तदा लोकान् सदेवासुरमानुषान्।<br>वर्णान् वर्णविभागांश्च सर्वधर्मांश्च शोभनान्॥ २६<br><br>पूर्वकल्पसमुद्भूताञ्छ्रुतवन्तो यथा पुरा।<br>पञ्चाक्षरप्रभावाच्च लोका वेदा महर्षयः॥ २७<br><br>तिष्ठन्ति शाश्वता धर्मा देवाः सर्वमिदं जगत्।<br>तदिदानीं प्रवक्ष्यामि शृणु चावहिताखिलम्॥ २८ | उस मन्त्रका माहात्म्य सुनकर उन तपोधन ऋषियोंने मन्त्रका विनियोग करके सभी अनुष्ठान पूर्ण किये। उसके बाद उन्होंने उस मन्त्रकी महिमासे लोकों, देवताओं, असुरों, मनुष्यों, वर्णों, वर्णविभागों तथा समस्त उत्तम धर्मोंको जो पूर्व कल्पमें उत्पन्न हुए थे—उन सबका श्रवण किया। पंचाक्षरमन्त्रके प्रभावसे ही लोक, वेद, महर्षिगण, शाश्वत धर्म, देवता तथा यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है। अब मैं उसके विषयमें सब कुछ बताऊँगा; सावधान होकर सुनिये॥ २५–२८॥ |
| अल्पाक्षरं महार्थं च वेदसारं विमुक्तिदम्।<br>आज्ञासिद्धमसन्दिग्धं वाक्यमेतच्छिवात्मकम्॥ २९ | यह मन्त्र अल्प अक्षरोंवाला, महान् अर्थोंवाला, वेदोंका सार, मुक्तिप्रद, आज्ञासिद्ध, असन्दिग्ध तथा शिवस्वरूप है॥ २९॥ |
| नानासिद्धियुतं दिव्यं लोकचित्तानुरञ्जकम्।<br>सुनिश्चितार्थं गम्भीरं वाक्यं मे पारमेश्वरम्॥ ३० | यह मेरा मन्त्र अनेक सिद्धियोंसे युक्त, अलौकिक, लोगोंके चित्तको आनन्दित करनेवाला, सुनिश्चित अर्थोंवाला, गम्भीर तथा परमेश्वरस्वरूप है॥ ३०॥ |
| मन्त्रं मुखसुखोच्चार्यमशेषार्थप्रसाधकम्।<br>तद्बीजं सर्वविद्यानां मन्त्रमाद्यं सुशोभनम्॥ ३१<br><br>अतिसूक्ष्मं महार्थं च ज्ञेयं तद्वटबीजवत्।<br>वेदः स त्रिगुणातीतः सर्वज्ञः सर्वकृत्प्रभुः॥ ३२ | यह मन्त्र मुखसे सुखपूर्वक उच्चारणयोग्य, सम्पूर्ण प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाला, सभी विद्याओंका बीजस्वरूप, आद्य (सबसे पहला) मन्त्र, परम सुन्दर, अति सूक्ष्म एवं महान् अर्थोंवाला है। इसे वटवृक्षके बीजकी भाँति समझना चाहिये। यह वेदस्वरूप, तीनों गुणोंसे परे, सर्वज्ञ, सब कुछ करनेवाला तथा सर्वसमर्थ है॥ ३१-३२॥ |
| ओमित्येकाक्षरं मन्त्रं स्थितः सर्वगतः शिवः।<br>मन्त्रे षडक्षरे सूक्ष्मे पञ्चाक्षरतनूः शिवः॥ ३३ | ॐ—यह एक अक्षरवाला मन्त्र है; सर्वव्यापी |