श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
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| ४१८ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वाच्यवाचकभावेन स्थितः साक्षात्स्वभावतः।<br>वाच्यः शिवः प्रमेयत्वान्मन्त्रस्तद्वाचकः स्मृतः॥ ३४<br>वाच्यवाचकभावोऽयमनादिः संस्थितस्तयोः।<br>वेदे शिवागमे वापि यत्र यत्र षडक्षरः॥ ३५<br>मन्त्रः स्थितः सदा मुख्यो लोके पञ्चाक्षरो मतः।<br>किं तस्य बहुभिर्मन्त्रैः शास्त्रैर्वा बहुविस्तृतैः॥ ३६<br>यस्यैवं हृदि संस्थोऽयं मन्त्रः स्यात्पारमेश्वरः।<br>तेनाधीतं श्रुतं तेन तेन सर्वमनुष्ठितम्॥ ३७<br>यो विद्वान् वै जपेत्सम्यगधीत्यैव विधानतः।<br>एतावद्धि शिवज्ञानमेतावत्परमं पदम्॥ ३८<br>एतावद् ब्रह्मविद्या च तस्मान्नित्यं जपेद् बुधः।<br>पञ्चाक्षरैः सप्रणवो मन्त्रोऽयं हृदयं मम॥ ३९<br>गुह्याद् गुह्यतरं साक्षान्मोक्षज्ञानमनुत्तमम्। | शिव इसमें स्थित रहते हैं। पाँच अक्षररूपी शरीरवाले शिव स्वभावसे ही सूक्ष्म षडक्षर (छः अक्षरोंवाले)-मन्त्रमें वाच्य-वाचक भावसे विराजमान हैं। प्रमेयत्वके कारण शिव वाच्य हैं तथा मन्त्र उनका वाचक कहा गया है। यह वाच्य-वाचक भाव (सम्बन्ध) उन दोनोंमें अनादि है। वेद अथवा शिवागममें षडक्षरमन्त्र स्थित है; किंतु लोकमें पंचाक्षरमन्त्रको मुख्य माना गया है। जिसके हृदयमें परमेश्वररूप यह मन्त्र स्थित है उसे बहुत मन्त्रों अथवा अतिविस्तृत शास्त्रोंसे क्या प्रयोजन! जो विद्वान् विधानपूर्वक इसका ज्ञान प्राप्तकर इसे ठीक-ठीक जपता है, उसने मानो वेदोंका अध्ययन कर लिया और सबकुछ अनुष्ठित कर लिया। मात्र यही शिवज्ञान है, यही परम पद है और यही ब्रह्मविद्या है; अतः विद्वान्को नित्य इसका जप करना चाहिये। प्रणव (ॐ)-सहित पाँच अक्षरोंसे युक्त यह मन्त्र [ॐ नमः शिवाय] मेरा हृदय है। यह गूढ़से भी गूढ़ है और साक्षात् सर्वोत्तम मोक्षज्ञान है॥ ३३-३९ १/२॥ |
| अस्य मन्त्रस्य वक्ष्यामि ऋषिच्छन्दोऽधिदैवतम्॥ ४०<br>बीजं शक्तिं स्वरं वर्णं स्थानं चैवाक्षरं प्रति।<br>वामदेवो नाम ऋषिः पङ्क्तिश्छन्द उदाहृतः॥ ४१<br>देवता शिव एवाहं मन्त्रस्यास्य वरानने।<br>नकारादीनि बीजानि पञ्चभूतात्मकानि च॥ ४२<br>आत्मानं प्रणवं विद्धि सर्वव्यापिनमव्ययम्।<br>शक्तिस्त्वमेव देवेशि सर्वदेवनमस्कृते॥ ४३<br>त्वदीयं प्रणवं किञ्चिन्मदीयं प्रणवं तथा।<br>त्वदीयं देवि मन्त्राणां शक्तिभूतं न संशयः॥ ४४<br>अकारोकारमकारा मदीये प्रणवे स्थिताः। | [हे देवि!] अब मैं इस मन्त्रके और प्रत्येक अक्षरके ऋषि, छन्द, देवता, बीज, शक्ति, स्वर, वर्ण तथा स्थानका वर्णन करूँगा। इस मन्त्रके ऋषि वामदेव तथा छन्द पंक्ति कहा गया है। हे वरानने! इस मन्त्रका देवता [स्वयं] मैं शिव ही हूँ। पंचभूतस्वरूप 'न'कार आदि इसके बीज हैं। प्रणवको सर्वव्यापी तथा शाश्वत आत्मा समझो। हे सभी देवताओंसे नमस्कृत देवेशि! [स्वयं] तुम ही इसकी शक्ति हो। कुछ प्रणव तुम्हारा है और कुछ प्रणव हमारा है। हे देवि! तुम्हारा प्रणव सभी मन्त्रोंका शक्तिस्वरूप है; इसमें संशय नहीं है॥ ४०-४४॥ |
| उकारं च मकारं च अकारं च क्रमेण वै॥ ४५<br>त्वदीयं प्रणवं विद्धि त्रिमात्रं प्लुतमुत्तमम्।<br>ओङ्कारस्य स्वरोदात्त ऋषिर्ब्रह्मा सितं वपुः॥ ४६<br>छन्दो देवी च गायत्री परमात्माधिदेवता।<br>उदात्तः प्रथमस्तद्वच्चतुर्थश्च द्वितीयकः॥ ४७<br>पञ्चमः स्वरितश्चैव मध्यमो निषधः स्मृतः।<br>नकारः पीतवर्णश्च स्थानं पूर्वमुखं स्मृतम्॥ ४८ | हे देवि! 'अ', 'उ', 'म' मेरे प्रणवमें स्थित हैं। क्रमसे 'उ', 'म', 'अ' तुम्हारे प्रणवके हैं; तुम इस उत्तम प्रणवको प्लुत तीन मात्राओंवाला जानो। ओंकारका स्वर उदात्त है, इसके ऋषि ब्रह्मा हैं, इसका शरीर श्वेत है, छन्द देवी गायत्री हैं और इसके अधिदेवता परमात्मा हैं। इसका पहला, दूसरा तथा चौथा वर्ण उदात्त; पाँचवाँ वर्ण स्वरित और मध्यम वर्ण निषध [निषादस्वर] कहा गया है॥ ४५-४७ १/२॥ |