भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

पृष्ठ 421, कुल 834 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 421

अध्याय ८५ ] पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा ४१९


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
इन्द्रोऽधिदैवतं छन्दो गायत्री गौतमो ऋषिः।<br>मकारः कृष्णवर्णोऽस्य स्थानं वै दक्षिणामुखम्॥ ४९<br><br>छन्दोऽनुष्टुप् ऋषिश्चात्री रुद्रो दैवतमुच्यते।<br>शिकारो धूम्रवर्णोऽस्य स्थानं वै पश्चिमं मुखम्॥ ५०<br><br>विश्वामित्र ऋषिस्त्रिष्टुप् छन्दो विष्णुस्तु दैवतम्।<br>वाकारो हेमवर्णोऽस्य स्थानं चैवोत्तरं मुखम्॥ ५१<br><br>ब्रह्माधिदैवतं छन्दो बृहती चाङ्गिरा ऋषिः।<br>यकारो रक्तवर्णश्च स्थानमूर्ध्वं मुखं विराट्॥ ५२<br><br>छन्दो ऋषिर्भरद्वाजः स्कन्दो दैवतमुच्यते।<br>न्यासमस्य प्रवक्ष्यामि सर्वसिद्धिकरं शुभम्॥ ५३‘न’ पीले रंगका है और स्थान पूर्वमुख (पूरबकी ओर मुखवाला) कहा गया है। इसके अधिदेवता इन्द्र हैं, इसका छन्द गायत्री है और इसके ऋषि गौतम हैं। ‘म’ कृष्ण वर्णवाला है, इसका स्थान दक्षिणमुख है, इसका छन्द अनुष्टुप् है, इसके ऋषि अत्रि हैं और इसके अधिदेवता रुद्र कहे जाते हैं। ‘शि’ धूम्र वर्णवाला है, इसका स्थान पश्चिममुख है, इसके ऋषि विश्वामित्र हैं, इसका छन्द त्रिष्टुप् है और इसके देवता विष्णु हैं। ‘वा’ हेम वर्णवाला है, इसका स्थान उत्तरमुख है, इसके अधिदेवता ब्रह्मा हैं, इसका छन्द बृहती है और इसके ऋषि अंगिरा हैं। ‘य’ लाल रंगवाला है, इसका स्थान ऊर्ध्वमुख है, इसका छन्द विराट् है, इसके ऋषि भरद्वाज हैं और इसके देवता स्कन्द कहे जाते हैं॥ ४८—५२ १/२॥
सर्वपापहरं चैव त्रिविधो न्यास उच्यते।<br>उत्पत्तिस्थितिसंहारभेदतस्त्रिविधः स्मृतः॥ ५४<br><br>ब्रह्मचारिगृहस्थानां यतीनां क्रमशो भवेत्।<br>उत्पत्तिर्ब्रह्मचारीणां गृहस्थानां स्थितिः सदा॥ ५५<br><br>यतीनां संहृतिन्यासः सिद्धिर्भवति नान्यथा।<br>अङ्गन्यासः करन्यासो देहन्यास इति त्रिधा॥ ५६[हे देवि!] अब मैं सभी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले, मंगलमय तथा समस्त पापोंका नाश करनेवाले इसके न्यासको बताऊँगा। न्यास तीन प्रकारका कहा जाता है। उत्पत्ति, स्थिति (पालन) तथा संहारके भेदसे यह तीन प्रकारका कहा गया है; यह क्रमशः ब्रह्मचारियों, गृहस्थों तथा यतियोंके लिये होता है। उत्पत्ति [न्यास] ब्रह्मचारियोंका, स्थिति [न्यास] गृहस्थोंका और संहृति (संहार) न्यास यतियोंका होता है; अन्यथा सिद्धि नहीं प्राप्त हो सकती॥ ५३—५५ १/२॥
उत्पत्त्यादित्रिभेदेन वक्ष्यते ते वरानने।<br>न्यसेत्पूर्वं करन्यासं देहन्यासमनन्तरम्॥ ५७<br><br>अङ्गन्यासं ततः पश्चादक्षराणां विधिक्रमात्।<br>मूर्धादिपादपर्यन्तमुत्पत्तिन्यास उच्यते॥ ५८<br><br>पादादिमूर्धपर्यन्तं संहारो भवति प्रिये।<br>हृदयास्यगलन्यासः स्थितिन्यास उदाहृतः॥ ५९<br><br>ब्रह्मचारिगृहस्थानां यतीनां चैव शोभने।<br>सशिरस्कं ततो देहं सर्वमन्त्रेण संस्पृशेत्॥ ६०अंगन्यास, करन्यास, देहन्यास—यह तीन प्रकारका न्यास होता है; हे वरानने! अब मैं उत्पत्ति आदि तीन भेदोंसे इन्हें भी आपको बताऊँगा। सबसे पहले करन्यास उसके बाद देहन्यास पुनः अंगन्यास मन्त्रके अक्षरोंके क्रमसे करना चाहिये। सिरसे प्रारम्भ होकर पैरोंतकका न्यास उत्पत्तिन्यास कहा जाता है। हे प्रिये! पैरोंसे प्रारम्भ होकर सिरतकका न्यास संहारन्यास होता है। हृदय, मुख और कण्ठका न्यास स्थितिन्यास कहा गया है। हे शोभने! यह न्यास [क्रमशः] ब्रह्मचारियों, गृहस्थों तथा यतियोंके लिये है॥ ५६—५९ १/२॥
स देहन्यास इत्युक्तः सर्वेषां सम एव सः।<br>दक्षिणाङ्गुष्ठमारभ्य वामाङ्गुष्ठान्त एव हि॥ ६१तत्पश्चात् सम्पूर्ण मन्त्रसे सिरसहित देहका स्पर्श करना चाहिये। वह देहन्यास कहा गया है; वह सबके