भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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पृष्ठ 407

अध्याय ८३ ] विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान ४०५

तिरासीवाँ अध्याय

विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ऋषय ऊचुः<br>व्यपोहनस्तवं पुण्यं श्रुतमस्माभिरादरात्।<br>प्रसङ्गाल्लिङ्गदानस्य व्रतान्यपि वदस्व नः॥ १ऋषिगण बोले—[हे सूतजी!] हम लोगोंने आदरपूर्वक पवित्र व्यपोहनस्तवको सुन लिया; अब आप प्रसंगसे लिङ्गदानके व्रतोंको भी हमलोगोंको बताइये ॥ १ ॥
सूत उवाच<br>व्रतानि वः प्रवक्ष्यामि शुभानि मुनिसत्तमाः।<br>नन्दिना कथितानीह ब्रह्मपुत्राय धीमते ॥ २<br><br>तानि व्यासादुपश्रुत्य युष्माकं प्रवदाम्यहम्।<br>अष्टम्यां च चतुर्दश्यां पक्षयोरुभयोरपि ॥ ३**सूतजी बोले—**हे श्रेष्ठ मुनियो! मैं आप लोगोंको शुभ व्रत बताऊँगा; नन्दीने बुद्धिमान् ब्रह्मापुत्र सनत्कुमारको उन्हें बताया था, उन्हीं [व्रतों]-को व्यासजीसे सुनकर मैं आप लोगोंको बता रहा हूँ॥ २ १/२ ॥
वर्षमेकं तु भुञ्जानो नक्तं यः पूजयेच्छिवम्।<br>सर्वयज्ञफलं प्राप्य स याति परमां गतिम्॥ ४<br><br>पृथिवीं भाजनं कृत्वा भुक्त्वा पर्वसु मानवः।<br>अहोरात्रेण चैकेन त्रिरात्रफलमश्नुते ॥ ५एक वर्षतक दोनों पक्षोंकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको केवल रात्रिमें आहार ग्रहण करता हुआ जो [मनुष्य] शिवकी पूजा करता है, वह समस्त यज्ञोंका फल प्राप्त करके परमगति प्राप्त करता है। पर्वोंपर एक दिन-रात इस व्रतको करके और पृथिवीको पात्र बनाकर भोजन करनेसे मनुष्य तीन रात्रियोंका फल प्राप्त करता है॥ ३–५॥
द्वयोर्मासस्य पञ्चम्योर्द्वयोः प्रतिपदोर्नरः।<br>क्षीरधाराव्रतं कुर्यात्सोऽश्वमेधफलं लभेत् ॥ ६<br><br>कृष्णाष्टम्यां तु नक्तेन यावत्कृष्णचतुर्दशी।<br>भुञ्जन् भोगानवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ ७जो मनुष्य महीनेकी दोनों पंचमी तथा प्रतिपदा तिथियोंमें क्षीरधाराव्रत करता है अर्थात् केवल दुग्धके आहारपर रहता है, वह अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करता है। कृष्णपक्षकी अष्टमीसे कृष्णपक्षकी चतुर्दशीतक [केवल] रातमें भोजन करनेवाला भोगोंको प्राप्त करता है और [अन्तमें] ब्रह्मलोक जाता है ॥ ६-७ ॥
योऽब्दमेकं प्रकुर्वीत नक्तं पर्वसु पर्वसु।<br>ब्रह्मचारी जितक्रोधः शिवध्यानपरायणः ॥ ८<br><br>संवत्सरान्ते विप्रेन्द्रान् भोजयेद्विधिपूर्वकम्।<br>स याति शाङ्करं लोकं नात्र कार्या विचारणा ॥ ९जो [मनुष्य] ब्रह्मचर्यमें स्थित रहकर, क्रोधको वशमें करके तथा शिवध्यानपरायण होकर एक वर्षतक सभी पर्वोंमें नक्तव्रत करता है और वर्षके अन्तमें श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक भोजन कराता है, वह शिवलोक जाता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ८-९ ॥
उपवासात्परं भैक्ष्यं भैक्ष्यात्परमयाचितम्।<br>अयाचितात्परं नक्तं तस्मान्नक्तेन वर्तयेत् ॥ १०उपवासकी अपेक्षा भिक्षा श्रेष्ठ है, भिक्षाकी अपेक्षा बिना माँगे प्राप्त भोजन श्रेष्ठ है और बिना माँगे प्राप्त भोजनकी अपेक्षा नक्तव्रत श्रेष्ठ है; अतः नक्तव्रत करना चाहिये ॥ १० ॥
देवैर्भुक्तं तु पूर्वाह्णे मध्याह्ने ऋषिभिस्तथा।<br>अपराह्ने च पितृभिः सन्ध्यायां गुह्यकादिभिः ॥ ११पूर्वाह्नमें किया गया भोजन देवताओंका, मध्याह्नमें ऋषियोंका, अपराह्नमें पितरोंका और सन्ध्यामें गुह्यकोंका