श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ४०६ | श्रीलिङ्गमहापुराण | [ पूर्वभाग |
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| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| सर्ववेलामतिक्रम्य नक्तभोजनमुत्तमम्।<br>हविष्यभोजनं स्नानं सत्यमाहारलाघवम्॥ १२<br><br>अग्निकार्यमधःशय्यां नक्तभोजी समाचरेत्।<br>प्रतिमासं प्रवक्ष्यामि शिवव्रतमनुत्तमम्॥ १३ | होता है, किन्तु सभी कालोंका अतिक्रमण करके रातमें किया गया भोजन उत्तम होता है। रातमें भोजन करनेवालेको हविष्यान्न ग्रहण करना चाहिये, स्नान करना चाहिये, सत्यका पालन करना चाहिये, कम खाना चाहिये, अग्निहोत्र करना चाहिये और भूमिपर शयन करना चाहिये॥ ११-१२१/२॥ |
| धर्मकामार्थमोक्षार्थं सर्वपापविशुद्धये।<br>पुष्यमासे च सम्पूज्य यः कुर्यान्नक्तभोजनम्॥ १४<br><br>सत्यवादी जितक्रोधः शालिगोधूमगोरसैः।<br>पक्षयोरष्टमीं यत्नादुपवासेन वर्तयेत्॥ १५<br><br>भूमिशय्यां च मासान्ते पौर्णमास्यां घृतादिभिः।<br>स्नाप्य रुद्रं महादेवं सम्पूज्य विधिपूर्वकम्॥ १६<br><br>यावकं चौदनं दत्त्वा सक्षीरं सघृतं द्विजाः।<br>भोजयेद् ब्राह्मणाञ्छिष्टाञ्जपेच्छान्तिं विशेषतः॥ १७<br><br>तथा गोमिथुनं चैव कपिलं विनिवेदयेत्।<br>भवाय देवदेवाय शिवाय परमेष्ठिने॥ १८<br><br>स याति मुनिशार्दूल वाह्नेयं लोकमुत्तमम्।<br>भुक्त्वा स विपुलान् लोकान् तत्रैव स विमुच्यते॥ १९ | अब मैं प्रत्येक महीनेमें किये जानेवाले उत्तम शिवव्रतका वर्णन करूँगा, जो धर्म-काम-अर्थ-मोक्षके लिये और सभी पापोंकी शुद्धिके लिये होता है। जो [मनुष्य] सत्यवादी तथा जितक्रोध (क्रोधको वशमें किया हुआ) होकर पुष्य (पौष) मासमें [शिवका] विधिवत् पूजन करके चावल, गेहूँ और गोदुग्धसे बने हुए भोजनको केवल रातमें ग्रहण करता है; दोनों पक्षोंकी अष्टमी तिथिमें यत्नपूर्वक उपवास करता है तथा भूमिपर शयन करता है और हे द्विजो! मासके अन्तमें पूर्णिमाके दिन घृत आदिसे महादेवको स्नान कराकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दुग्ध तथा घृतमिश्रित पके हुए यव तथा चावलका भोजन कराता है एवं विशेषरूपसे शान्तिमन्त्रोंका जप करता है और देवदेव परमेश्वर भव शिवजीको कपिल वर्णका गोमिथुन (गाय तथा वृषभ) समर्पित करता है—<br>हे श्रेष्ठ मुनियो! वह [मनुष्य] उत्तम अग्निलोकको जाता है और अनेक लोकोंके सुखोंका भोग करके वहींपर मुक्त हो जाता है॥ १३-१९॥ |
| माघमासे तु सम्पूज्य यः कुर्यान्नक्तभोजनम्।<br>कृशरं घृतसंयुक्तं भुञ्जानः संयतेन्द्रियः॥ २०<br><br>सोपवासं चतुर्दश्यां भवेदुभयपक्षयोः।<br>रुद्राय पौर्णमास्यां तु दद्याद्वै घृतकम्बलम्॥ २१<br><br>कृष्णं गोमिथुनं दद्यात्पूजयेच्चैव शङ्करम्।<br>भोजयेद् ब्राह्मणांश्चैव यथाविभवविस्तरम्॥ २२<br><br>याम्यमासाद्य वै लोकं यमेन सह मोदते।<br>फाल्गुने चैव सम्प्राप्ते कुर्याद्वै नक्तभोजनम्॥ २३ | माघ मासमें जो [मनुष्य] पूजन करके केवल नक्त भोजन करता है, घृतयुक्त कृशरका आहार ग्रहण करता है, इन्द्रियोंको वशमें किये रहता है, दोनों पक्षोंकी चतुर्दशीमें उपवास करता है, पूर्णिमाके दिन रुद्रको घृतकम्बल अर्पित करता है, कृष्ण वर्णका गोमिथुन प्रदान करता है, शिवकी पूजा करता है, [अपने] सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह यमलोक पहुँचकर यमके साथ आनन्द मनाता है॥ २०-२२१/२॥ |
| श्यामाकान्नघृतक्षीरैर्जितक्रोधो जितेन्द्रियः।<br>चतुर्दश्यामथाष्टम्यामुपवासं च कारयेत्॥ २४ | फाल्गुन मास आनेपर जो घी तथा दूधमें पकाये हुए साँवाँकि अन्नका नक्त भोजन करता है, इन्द्रियोंको तथा क्रोधको वशमें किये रहता है, अष्टमी तथा चतुर्दशीके |