श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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अध्याय ८३ ] विभिन्न मासोंमें किये जानेवाले शिवव्रतोंका विधान [ ४०७
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| पौर्णमास्यां महादेवं स्नाप्य सम्पूज्य शङ्करम्।<br>दद्याद् गोमिथुनं वापि ताम्राभं शूलपाणये॥ २५<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा तु प्रार्थयेत्परमेश्वरम्।<br>स याति चन्द्रसायुज्यं नात्र कार्या विचारणा॥ २६ | दिन उपवास करता है, पूर्णिमाके दिन महादेव शंकरको स्नान कराकर उनकी पूजा करके उन शूलपाणि [शिव]-को ताम्रवर्णका गोमिथुन प्रदान करता है और ब्राह्मणोंको भोजन कराकर परमेश्वरसे प्रार्थना करता है, वह चन्द्रमाका सायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ २३-२६॥ |
| चैत्रेऽपि रुद्रमभ्यर्च्य कुर्याद्वै नक्तभोजनम्।<br>शाल्यन्नं पयसा युक्तं घृतेन च यथासुखम्॥ २७<br>गोष्ठशायी मुनिश्रेष्ठाः क्षितौ निशि भवं स्मरेत्।<br>पौर्णमास्यां शिवं स्नाप्य दद्याद् गोमिथुनं सितम्॥ २८<br>ब्राह्मणान् भोजयेच्चैव निर्ऋतेः स्थानमाप्नुयात्। | हे श्रेष्ठ मुनियो! जो चैत्र महीनेमें रुद्रकी पूजा करके घी और दूधसे युक्त तथा पके हुए शालि-चावलको अपनी रुचिके अनुसार रात्रिमें ग्रहण करता है, रातमें गोशालामें भूमिपर शयन करता है, शिवजीका स्मरण करता है, पूर्णिमासीके दिन शिवको स्नान कराकर श्वेतवर्णका गोमिथुन प्रदान करता है और ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह निर्ऋतितिलोकको प्राप्त करता है॥ २७-२८ १/२॥ |
| वैशाखे च तथा मासे कृत्वा वै नक्तभोजनम्॥ २९<br>पौर्णमास्यां भवं स्नाप्य पञ्चगव्यघृतादिभिः।<br>श्वेतं गोमिथुनं दत्त्वा सोऽश्वमेधफलं लभेत्॥ ३० | वैशाख महीनेमें नक्तभोजन करके पूर्णमासी तिथिमें पंचगव्य, घृत आदिसे शिवजीको स्नान कराकर श्वेतवर्णका गोमिथुन अर्पित करके वह [मनुष्य] अश्वमेध यज्ञका फल प्राप्त करता है॥ २९-३०॥ |
| ज्येष्ठे मासे च देवेशं भवं शर्वमुमापतिम्।<br>सम्पूज्य श्रद्धया भक्त्या कृत्वा वै नक्तभोजनम्॥ ३१<br>रक्तशाल्यन्नमध्वा च अद्भिः पूतं घृतादिभिः।<br>वीरासनी निशार्धं च गवां शुश्रूषणे रतः॥ ३२<br>पौर्णमास्यां तु सम्पूज्य देवदेवमुमापतिम्।<br>स्नाप्य भक्त्या यथान्यायं चरुं दद्याच्च शूलिने॥ ३३<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च यथाविभवविस्तरम्।<br>धूम्रं गोमिथुनं दत्त्वा वायुलोके महीयते॥ ३४ | ज्येष्ठ मासमें देवेश, भव, शर्व, उमापतिकी श्रद्धापूर्वक पूजा करके मधु-जल-घृतमिश्रित पवित्र शालिचावलका केवल रातमें आहार ग्रहण करके वीर आसनमें स्थित होकर आधी रातमें गायोंकी सेवामें तत्पर रहकर पूर्णिमाके दिन देवदेव उमापतिको स्नान कराकर उनकी पूजा करके विधानपूर्वक शिवजीको चरु अर्पित करके पुनः अपने सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर धूम्रवर्णका गोमिथुन [शिवजीको] अर्पित करनेसे वह वायुलोकमें प्रतिष्ठा प्राप्त करता है॥ ३१-३४॥ |
| आषाढे मासि चाप्येवं नक्तभोजनतत्परः।<br>भूरिखण्डाज्यसम्मिश्रं सक्तुभिश्चैव गोरसम्॥ ३५<br>पौर्णमास्यां घृताद्यैस्तु स्नाप्य पूज्य यथाविधि।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च श्रोत्रियान् वेदपारगान्॥ ३६<br>दद्याद् गोमिथुनं गौरं वारुणं लोकमाप्नुयात्। | इसी प्रकार आषाढ़ महीनेमें भी चीनी, घृत तथा गोदुग्धमिश्रित सत्तूके नक्त-भोजनमें तत्पर रहते हुए पूर्णिमाके दिन घृत आदिसे [शिवजीको] स्नान कराकर विधिपूर्वक पूजन करके वेदमें पारंगत श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको भोजन कराकर जो गौरवर्णका गोमिथुन अर्पित करता है, वह वरुणलोक प्राप्त करता है॥ ३५-३६ १/२॥ |
| श्रावणे च द्विजा मासे कृत्वा वै नक्तभोजनम्॥ ३७<br>क्षीरषष्टिकभक्तेन सम्पूज्य वृषभध्वजम्।<br>पौर्णमास्यां घृताद्यैस्तु स्नाप्य पूज्य यथाविधि॥ ३८ | हे द्विजो! सावन महीनेमें दूधमिश्रित षष्टिक (साठ दिनमें उत्पन्न होनेवाले शालिचावल)-के भातका नक्तभोजन करके वृषभध्वजकी पूजा करके [अन्तमें] |