भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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४०८श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
मूल संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्राह्मणान् भोजयित्वा च श्रोत्रियान् वेदपारगान्।<br>श्वेताग्रपादं पौण्ड्रं च दद्याद् गोमिथुनं पुनः॥ ३९<br><br>स याति वायुसायुज्यं वायुवत्सर्वगो भवेत्।<br>प्राप्ते भाद्रपदे मासे कृत्वैवं नक्तभोजनम्॥ ४०पूर्णिमाके दिन घृत आदिसे स्नान कराकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करके वेदमें पारंगत श्रोत्रिय ब्राह्मणोंको भोजन कराकर जो [मनुष्य] सफेद खुरवाला तथा चितकबरा गोमिथुन शिवजीको अर्पित करता है, वह वायुदेवका सायुज्य प्राप्त करता है और वायुके समान सर्वगामी हो जाता है॥ ३७–३९१/२॥
हुतशेषं च विप्रेन्द्रान् वृक्षमूलाश्रितो दिवा।<br>पौर्णमास्यां तु देवेशं स्नाप्य सम्पूज्य शङ्करम्॥ ४१<br><br>नीलस्कन्धं वृषं गां च दत्त्वा भक्त्या यथाविधि।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च वेदवेदाङ्गपारगान्॥ ४२<br><br>यक्षलोकमनुप्राप्य यक्षराजो भवेन्नरः।<br>ततश्चाश्वयुजे मासि कृत्वैवं नक्तभोजनम्॥ ४३हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इसी प्रकार भाद्रपद महीना आनेपर हवनसे बची हुई सामग्रीका नक्तभोजन करके दिनमें वृक्षके मूलका आश्रय लेकर विश्राम करते हुए [अन्तमें] पूर्णिमाके दिन देवेश शंकरको स्नान कराकर [उनकी] पूजा करके भक्तिपूर्वक विधिके अनुसार नीलवर्णके स्कन्धवाला वृषभ तथा एक गाय शिवजीको अर्पित करके वेद-वेदांगमें पारंगत ब्राह्मणोंको भोजन कराकर मनुष्य यक्षलोक प्राप्त करके यक्षोंका राजा हो जाता है॥ ४०–४२१/२॥
सघृतं शङ्करं पूज्य पौर्णमास्यां च पूर्ववत्।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च शिवभक्तान् सदा शुचीन्॥ ४४<br><br>वृषभं नीलवर्णाभमुरोदेशसमुन्नतम्।<br>गां च दत्त्वा यथान्यायमैशानं लोकमाप्नुयात्॥ ४५इसके बाद इसी तरह आश्विन (क्वार) मासमें केवल रातमें घीसे बना हुआ भोजन करके पूर्णिमा तिथिमें पूर्वकी भाँति शंकरकी पूजा करके ब्राह्मणों तथा सर्वदा पवित्र रहनेवाले शिवभक्तोंको भोजन कराकर नीलवर्णकी आभावाले तथा उन्नत उरुदेशवाले एक वृषभ और एक गायका विधिपूर्वक दान करके मनुष्य ईशानलोक प्राप्त करता है॥ ४३–४५॥
कार्तिके च तथा मासे कृत्वा वै नक्तभोजनम्।<br>क्षीरोदनेन साज्येन सम्पूज्य च भवं प्रभुम्॥ ४६<br><br>पौर्णमास्यां च विधिवत्स्नाप्य दत्त्वा चरुं पुनः।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च यथाविभवविस्तरम्॥ ४७<br><br>दत्त्वा गोमिथुनं चैव कापिलं पूर्ववद् द्विजाः।<br>सूर्यसायुज्यमाप्नोति नात्र कार्या विचारणा॥ ४८हे द्विजो! कार्तिक मासमें रात्रिमें घृतयुक्त दुग्धोदनका भोजन करके भगवान् शिवका पूजनकर [अन्तमें] पूर्णिमा तिथिमें विधिपूर्वक [शिवजीको] स्नान कराकर पुनः उन्हें चरुका नैवेद्य अर्पित करके अपने सामर्थ्यके अनुसार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर पूर्वकी भाँति कपिल वर्णका गोमिथुन शिवजीको समर्पित करके मनुष्य सूर्यसायुज्य प्राप्त करता है; इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये॥ ४६–४८॥
मार्गशीर्षे च मासेऽपि कृत्वैवं नक्तभोजनम्।<br>यवान्नेन यथान्यायमाज्यक्षीरादिभिः समम्॥ ४९<br><br>पौर्णमास्यां च पूर्वोक्तं कृत्वा शर्वाय शम्भवे।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च दरिद्रान् वेदपारगान्॥ ५०<br><br>दत्त्वा गोमिथुनं चैव पाण्डुरं विधिपूर्वकम्।<br>सोमलोकमनुप्राप्य सोमेन सह मोदते॥ ५१मार्गशीर्ष (अगहन) महीनेमें भी विधिपूर्वक दूध तथा घीमें पकाये हुए जौका रात्रिमें भोजन करके [अन्तमें] पूर्णिमाके दिन पूर्वकी भाँति शर्व शम्भुको स्नान कराकर उनकी पूजा करके वेदमें पारंगत निर्धन ब्राह्मणोंको भोजन कराकर तथा विधिपूर्वक पाण्डुरवर्णका