भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय ८४] उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान ४०९


| अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यं क्षमा दया।<br>त्रिःस्नानं चाग्निहोत्रं च भूशय्या नक्तभोजनम्॥ ५२<br><br>पक्षयोरुपवासं च चतुर्दश्यष्टमीषु च।<br>इत्येतदखिलं प्रोक्तं प्रतिमासं शिवव्रतम्॥ ५३<br><br>कुर्याद्वर्षं क्रमेणैव व्युत्क्रमेणापि वा द्विजाः।<br>स याति शिवसायुज्यं ज्ञानयोगमवाप्नुयात्॥ ५४ | गोमिथुन [शिवजीको] समर्पित करके मनुष्य सोमलोक प्राप्त करके [वहाँपर] सोमके साथ आनन्द प्राप्त करता है॥ ४९–५१॥<br><br>अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, ब्रह्मचर्य, क्षमा, दया, तीनों कालमें स्नान, अग्निहोत्र, पृथ्वीपर शयन, रात्रिभोजन और दोनों पक्षोंकी अष्टमी तथा चतुर्दशीको उपवास—इन सबको तथा प्रत्येक महीनेके शिवव्रतको मैंने कह दिया; हे द्विजो! जो [मनुष्य] क्रमसे अथवा विपरीत क्रमसे वर्षभर इसे करता है, वह शिवसायुज्य तथा ज्ञानयोग प्राप्त करता है॥ ५२–५४॥ |

॥ इति श्रीलिङ्गमहापुराणे पूर्वभागे शिवव्रतकथनं नाम त्र्यशीतितमोऽध्यायः॥ ८३॥
॥ इस प्रकार श्रीलिङ्गमहापुराणके अन्तर्गत पूर्वभागमें 'शिवव्रतकथन' नामक तिरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ८३॥


चौरासीवाँ अध्याय

उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान

| सूत उवाच<br>उमामहेश्वरं वक्ष्ये व्रतमीश्वरभाषितम्।<br>नरनार्यादिजन्तूनां हिताय मुनिसत्तमाः॥ १<br><br>पौर्णमास्याममावास्यां चतुर्दश्यष्टमीषु च।<br>नक्तमब्दं प्रकुर्वीत हविष्यं पूजयेद्भवम्॥ २ | **सूतजी बोले—**हे श्रेष्ठ मुनियो! अब मैं नर, नारी आदि प्राणियोंके हितके लिये [स्वयं] शिवजीद्वारा कहे गये उमामहेश्वरव्रतको बताऊँगा। वर्षभर अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या तथा पूर्णिमाको रातमें हविष्य ग्रहण करना चाहिये और शिवजीकी पूजा करनी चाहिये॥ १-२॥ | | उमामहेशप्रतिमां हेम्ना कृत्वा सुशोभनाम्।<br>राजतीं वाथ वर्षान्ते प्रतिष्ठाप्य यथाविधि॥ ३ | [शैलादि बोले—] हे प्रभो [सनत्कुमार]! जो [मनुष्य] सुवर्ण अथवा चाँदीकी उमा-महेशकी परम सुन्दर |