भारतकोश
श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण

Linga MahaPurana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished833 पृष्ठ

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४१०श्रीलिङ्गमहापुराण[ पूर्वभाग
मूल श्लोकहिन्दी अनुवाद
ब्राह्मणान् भोजयित्वा च दत्त्वा शक्त्या च दक्षिणाम्।<br>रथाद्यैर्वापि देवेशं नीत्वा रुद्रालयं प्रति॥ ४<br><br>सर्वातिशयसंयुक्तैश्छत्रचामरभूषणैः ।<br>निवेदयेद् व्रतं चैव शिवाय परमेष्ठिने॥ ५<br><br>स याति शिवसायुज्यं नारी देव्या यदि प्रभो।प्रतिमा बनाकर वर्षके अन्तमें विधिपूर्वक उसकी प्रतिष्ठा करके ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उन्हें यथाशक्ति दक्षिणा प्रदान करके पूर्ण सौन्दर्ययुक्त तथा छत्र-चामर-आभूषणोंसे अलंकृत रथ आदिसे देवेश [शिव]-को शिवालयमें ले जाकर इस व्रतको परमेश्वर शिवको निवेदित करता है, वह शिवसायुज्य प्राप्त करता है और यदि नारी हो, तो वह भगवती उमाका सायुज्य प्राप्त करती है॥ ३–५ १/२॥
अष्टम्यां च चतुर्दश्यां नियता ब्रह्मचारिणी॥ ६<br><br>वर्षमेकं न भुञ्जीत कन्या वा विधवापि वा।<br>वर्षान्ते प्रतिमां कृत्वा पूर्वोक्तविधिना ततः॥ ७<br><br>प्रतिष्ठाप्य यथान्यायं दत्त्वा रुद्रालये पुनः।<br>ब्राह्मणान् भोजयित्वा च भवान्या सह मोदते॥ ८<br><br>या नार्येवं चरेदब्दं कृष्णामेकां चतुर्दशीम्।<br>वर्षान्ते प्रतिमां कृत्वा येन केनापि वा द्विजाः॥ ९<br><br>पूर्वोक्तमखिलं कृत्वा भवान्या सह मोदते।कन्या हो अथवा विधवा हो—वह एक वर्षतक अष्टमी तथा चतुर्दशीको नियमपूर्वक ब्रह्मचारिणी रहकर भोजन न करे; वर्षके अन्तमें पूर्वोक्त विधिसे प्रतिमा बनाकर विधानके अनुसार उसकी प्रतिष्ठा करके उसे रुद्रालयमें प्रदान करके पुनः ब्राह्मणोंको भोजन कराकर वह भवानी (पार्वती)-के साथ आनन्द मनाती है। हे द्विजो! जो स्त्री वर्षपर्यन्त केवल कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको यह व्रत करती है और वर्षके अन्तमें जिस किसी पदार्थसे प्रतिमा बनाकर पूर्वोक्त समस्त विधान सम्पन्न करती है, वह भवानीके साथ आनन्द मनाती है॥ ६–९ १/२॥
अमावास्यां निराहारा भवेदब्दं सुयन्त्रिता॥ १०<br><br>शूलं च विधिना कृत्वा वर्षान्ते विनिवेदयेत्।<br>स्नाप्येशानं यजेद् भक्त्या सहस्रैः कमलैः सितैः॥ ११<br><br>रजतं कमलं चैव जाम्बूनदसुकर्णिकम्।<br>दत्त्वा भवाय विप्रेभ्यः प्रदद्याद्दक्षिणामपि॥ १२<br><br>कामतौऽपि कृतं पापं भ्रूणहत्यादिकं च यत्।<br>तत्सर्वं शूलदानेन भिन्द्यान्नारी न संशयः॥ १३<br><br>सायुज्यं चैवमाप्नोति भवान्या द्विजसत्तमाः।<br>कुर्याद्यद्वा नरः सोऽपि रुद्रसायुज्यमाप्नुयात्॥ १४स्त्रीको चाहिये कि वर्षपर्यन्त नियन्त्रित रहती हुई अमावस्याके दिन आहार ग्रहण न करे और वर्षके अन्तमें विधिपूर्वक त्रिशूल बनवाकर शिवको निवेदित करे तथा ईशानको स्नान कराकर हजार श्वेत कमलोंसे भक्तिपूर्वक उनका पूजन करे और सुवर्णमयी कर्णिकासे युक्त चाँदीका कमल शिवजीको समर्पित करके ब्राह्मणोंको दक्षिणा भी प्रदान करे। वह स्त्री [शिवजीके निमित्त] त्रिशूलके दानसे जानबूझकर भ्रूणहत्या आदि जो भी पाप होता है, उन सबको ध्वस्त कर डालती है; इसमें सन्देह नहीं है और हे श्रेष्ठ द्विजो! वह भवानीका सायुज्य प्राप्त कर लेती है। यदि [कोई] मनुष्य इसे करता है, तो वह भी रुद्रसायुज्य प्राप्त कर लेता है॥ १०–१४॥
पौर्णमास्याममावास्यां वर्षमेकमतन्द्रिता।<br>उपवासरता नारी नरोऽपि द्विजसत्तमाः॥ १५<br><br>नियोगादेव तत्कार्यं भर्तॄणां द्विजसत्तमाः।<br>जपं दानं तपः सर्वमस्वतन्त्राः यतः स्त्रियः॥ १६हे श्रेष्ठ द्विजो! पूरे एक वर्षभर पूर्णमासी तथा अमावस्याको आलस्यरहित तथा उपवासपरायण होकर नारीको तथा नरको भी इसे करना चाहिये। हे श्रेष्ठ द्विजो! पतिकी आज्ञासे ही स्त्रियोंको यह व्रत, जप, दान, तप—सब कुछ करना चाहिये; क्योंकि स्त्रियाँ स्वतन्त्र नहीं हैं। हे सुव्रतो! वर्षके अन्तमें सभी प्रकारके गन्धोंसे युक्त उस