श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished833 पृष्ठ
पृष्ठ 413, कुल 834 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 413
अध्याय ८४] उमामहेश्वरव्रतका वर्णन तथा पूजाविधान ४११
| वर्षान्ते सर्वगन्धाढ्यां प्रतिमां सन्निवेदयेत्।<br>सा भवान्याश्च सायुज्यं सारूप्यं चापि सुव्रता ॥ १७<br><br>लभते नात्र सन्देहः सत्यं सत्यं वदाम्यहम्।<br>कार्तिक्यां वा तु या नारी एकभक्तेन वर्तते ॥ १८ | प्रतिमाको शिवको निवेदित कर देना चाहिये; वह सुव्रता [स्त्री] भवानीका सायुज्य तथा सारूप्य प्राप्त कर लेती है; इसमें सन्देह नहीं है, मैं यह पूर्णतः सत्य कह रहा हूँ॥ १५-१७ १/२ ॥ |
|---|---|
| क्षमाहिंसादिनियमैः संयुक्ता ब्रह्मचारिणी।<br>दद्यात्कृष्णतिलानां च भारमेकममन्द्रिता ॥ १९<br><br>सघृतं सगुडं चैव ओदनं परमेष्ठिने।<br>दत्त्वा च ब्राह्मणेभ्यश्च यथाविभवविस्तरम् ॥ २०<br><br>अष्टम्यां च चतुर्दश्यामुपवासरता च सा।<br>भवान्या मोदते सार्धं सारूप्यं प्राप्य सुव्रता ॥ २१ | जो स्त्री कार्तिक मासमें एक बार भोजन करती है, क्षमा-अहिंसा आदि नियमोंसे युक्त रहती है, ब्रह्मचर्यका पालन करती है, आलस्यरहित होकर एक भार* काला तिल तथा घृत-गुड़ मिलाकर पकाया भात परमेश्वरको निवेदित करती है, ब्राह्मणोंको अपने सामर्थ्यके अनुसार दान देती है और अष्टमी तथा चतुर्दशीको उपवास करती है—वह उत्तम व्रतवाली [स्त्री] भवानीका सारूप्य प्राप्त करके उनके साथ आनन्द मनाती है ॥ १८—२१ ॥ |
| क्षमा सत्यं दया दानं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।<br>सर्वव्रतेष्वयं धर्मः सामान्यो रुद्रपूजनम्॥ २२ | समस्त व्रतोंमें क्षमा, सत्य, दया, दान, शुद्धि तथा इन्द्रियोंका निग्रह और रुद्रपूजन—यह सामान्य धर्म है॥ २२॥ |
| समासात्तुः प्रवक्ष्यामि प्रतिमासमनुक्रमात्।<br>मार्गशीर्षकमासादि कार्तिक्यान्तं यथाक्रमम् ॥ २३ | अब मैं संक्षेपमें क्रमसे मार्गशीर्षसे प्रारम्भ करके कार्तिकतक प्रत्येक महीनेके व्रतको बताऊँगा; इस परम पुण्यप्रद व्रतको [स्वयं] नन्दीने कहा था॥ २३ १/२ ॥ |
| व्रतं सुविपुलं पुण्यं नन्दिना परिभाषितम्।<br>मार्गशीर्षकमासेऽथ वृषं पूर्णाङ्गममुत्तमम् ॥ २४<br><br>अलङ्कृत्य यथान्यायं शिवाय विनिवेदयेत्।<br>सा च सार्धं भवान्या वै मोदते नात्र संशयः ॥ २५ | जो [स्त्री] मार्गशीर्ष मासमें पूर्ण अंगोंवाले उत्तम वृषभको अलंकृत करके विधिपूर्वक शिवको निवेदित करती है, वह भवानीके साथ आनन्दित रहती है; इसमें सन्देह नहीं है ॥ २४-२५ ॥ |
| पुष्यमासे तु वै शूलं प्रतिष्ठाप्य निवेदयेत्।<br>पूर्वोक्तमखिलं कृत्वा भवान्या सह मोदते ॥ २६ | जो पौष मासमें पूर्वोक्त विधिके अनुसार सम्पूर्ण कृत्य करके त्रिशूलकी स्थापनाकर उसे [शिवको] समर्पित करती है, वह भवानीके साथ आनन्द मनाती है ॥ २६ ॥ |
| माघमासे रथं कृत्वा सर्वलक्षणलक्षितम्।<br>दद्यात्सम्पूज्य देवेशं ब्राह्मणांश्चैव भोजयेत् ॥ २७ | हे महाभाग मुनियो! जो माघ महीनेमें सभी लक्षणोंसे युक्त रथ बनाकर देवेशकी पूजा करके उसे शिवको समर्पित करती है और ब्राह्मणोंको भोजन कराती है, वह देवी [पार्वती]-के साथ आनन्द करती है; इसमें सन्देह नहीं है॥ २७ १/२ ॥ |
| सा च देव्या महाभागा मोदते नात्र संशयः।<br>फाल्गुने प्रतिमां कृत्वा हिरण्येन यथाविधि ॥ २८ | जो फाल्गुन मासमें अपने सामर्थ्यके अनुसार विधिपूर्वक सोने, चाँदी अथवा ताँबेकी प्रतिमा बनाकर |
* भारका परिमाण इस प्रकार है—
चतुर्भिर्व्रीहिभिर्गुञ्जं गुञ्जापञ्च पणं पलम्।
अष्टौ धरणमष्टौ च कर्ष तांश्चतुरः पलम्। तुलां पलशतं प्राहुर्भारं स्याद्विंशतिस्तुलाः॥
अर्थात् 'चार व्रीहि (धान)-की एक गुंजा, पाँच गुंजाका एक पण, आठ पणका एक धरण, आठ धरणका एक कर्ष, चार कर्षका एक पल, सौ पलकी एक तुला और बीस तुलाका एक भार कहलाता है।'