श्रीलिंगमहापुराण

श्रीलिंगमहापुराण
Linga MahaPurana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| अध्याय ८५ ] | पंचाक्षरीविद्या (पंचाक्षरमन्त्र), जपविधान तथा उसकी महिमा | ४२१ | | :--- | :--- |
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
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| वाकारो नेत्रमस्त्रं तु यकारः परिकीर्तितः।<br>इत्थमङ्गानि विन्यस्य ततो वै बन्धयेद्दिशः॥ ७६<br>विघ्नेशो मातरो दुर्गा क्षेत्रज्ञो देवता दिशः।<br>आग्नेयादिषु कोणेषु चतुर्ष्वपि यथाक्रमम्॥ ७७<br>अङ्गुष्ठतर्जन्यग्राभ्यां संस्थाप्य सुमुखं शुभम्।<br>रक्षध्वमिति चोक्त्वा तु नमस्कुर्यात्पृथक् पृथक्॥ ७८ | कहा गया है, 'वा' को नेत्र और 'य' को अस्त्र कहा गया है। इस प्रकार अंगोंका न्यास करनेके अनन्तर दिशाओंको बाँधना चाहिये। आग्नेय आदि चारों कोणोंमें क्रमशः विघ्नेश, माताएँ, दुर्गा तथा क्षेत्रज्ञ दिशाओंके देवता हैं। अंगुष्ठ तथा तर्जनीके अग्रभागोंसे कल्याणप्रद तथा सुन्दर मुखवाले गणेश आदिको दिशाओंमें स्थापित करके 'रक्षा कीजिये'—ऐसा कहकर इन्हें पृथक्-पृथक् नमस्कार करना चाहिये॥ ७५-७८॥ |
| गले मध्ये तथाङ्गुष्ठे तर्जन्याद्यङ्गुलीषु च।<br>अङ्गुष्ठेन करन्यासं कुर्यादेव विचक्षणः॥ ७९<br>एवं न्यासमिमं प्रोक्तं सर्वपापहरं शुभम्॥<br>सर्वसिद्धिकरं पुण्यं सर्वरक्षाकरं शिवम्॥ ८०<br>न्यस्ते मन्त्रेऽथ सुभगे शङ्करप्रतिमो भवेत्।<br>जन्मान्तरकृतं पापमपि नश्यति तत्क्षणात्॥ ८१<br>एवं विन्यस्य मेधावी शुद्धकायो दृढव्रतः।<br>जपेत्पञ्चाक्षरं मन्त्रं लब्ध्वाचार्यप्रसादतः॥ ८२ | बुद्धिमान्को चाहिये कि कण्ठमें, मध्यमें, अँगूठेमें, तर्जनी आदि अँगुलियोंमें अँगूठेसे ही करन्यास करे। इस प्रकार यह न्यास सभी पापोंको हरनेवाला, शुभ, सभी सिद्धियाँ देनेवाला, पुण्यप्रद, सबकी रक्षा करनेवाला तथा कल्याणकारी कहा गया है। हे सुभगे! मन्त्रका न्यास कर लेनेपर साधक शिवतुल्य हो जाता है और उसके द्वारा पूर्व जन्ममें किया गया पाप भी उसी क्षण नष्ट हो जाता है। इस प्रकार न्यास करके मेधावीको शुद्ध शरीरवाला तथा दृढव्रती होकर आचार्यकी कृपासे ग्रहण करके पंचाक्षर-मन्त्रका जप करना चाहिये॥ ७९-८२॥ |
| अतः परं प्रवक्ष्यामि मन्त्रसङ्ग्रहणं शुभे।<br>यं विना निष्फलं नित्यं येन वा सफलं भवेत्॥ ८३<br>आज्ञाहीनं क्रियाहीनं श्रद्धाहीनममानसम्।<br>आज्ञप्तं दक्षिणाहीनं सदा जप्तं च निष्फलम्॥ ८४<br>आज्ञासिद्धं क्रियासिद्धं श्रद्धासिद्धं सुमानसम्।<br>एवं च दक्षिणासिद्धं मन्त्रं सिद्धं यतस्ततः॥ ८५ | हे शुभे! अब मैं इस मन्त्रको ग्रहण करनेकी विधि बताऊँगा, जिसके बिना यह निष्फल हो जाता है और जिसके द्वारा यह सफल होता है। आज्ञाहीन, क्रियाहीन, श्रद्धाहीन, ध्यानहीन, आज्ञप्त तथा दक्षिणाहीन मन्त्र जपे जानेपर सदा निष्फल होता है। आज्ञासिद्ध, क्रियासिद्ध, श्रद्धासिद्ध, सुमानस (पूर्ण ध्यानयुक्त) तथा दक्षिणासिद्ध मन्त्र सदा सफल होता है॥ ८३-८५॥ |
| उपगम्य गुरुं विप्रं मन्त्रतत्त्वार्थवेदिनम्।<br>ज्ञानिनं सद्गुणोपेतं ध्यानयोगपरायणम्॥ ८६<br>तोषयेत्तं प्रयत्नेन भावशुद्धिसमन्वितः।<br>वाचा च मनसा चैव कायेन द्रविणेन च॥ ८७<br>आचार्यं पूजयेच्छिष्यः सर्वदातिप्रयत्नतः।<br>हस्त्यश्वरथरत्नानि क्षेत्राणि च गृहाणि च॥ ८८<br>भूषणानि च वासांसि धान्यानि विविधानि च।<br>एतानि गुरवे दद्याद्भक्त्या च विभवे सति॥ ८९<br>वित्तशाठ्यं न कुर्वीत यदिच्छेद्सिद्धिमात्मनः।<br>पश्चान्निवेदयेद्देवि आत्मानं सपरिच्छदम्॥ ९० | शिष्यको चाहिये कि मन्त्रके वास्तविक अर्थके ज्ञाता, ज्ञानसम्पन्न, सद्गुणोंसे युक्त तथा ध्यानयोगपरायण ब्राह्मण गुरुके पास जाकर भावशुद्धिसे युक्त हो मन-वचन-शरीर तथा धनसे उन्हें प्रयत्नपूर्वक सन्तुष्ट करे और बड़े प्रयत्नके साथ उन आचार्यकी सर्वदा पूजा करे। वैभव रहनेपर हाथी, घोड़े, रथ, रत्न, क्षेत्र, गृह, आभूषण, वस्त्र तथा विविध धान्य—ये सब गुरुको भक्तिपूर्वक देना चाहिये। यदि वह अपनी सिद्धि चाहता हो तो धनकी कृपणता नहीं करनी चाहिये। हे देवि! |